राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि
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Read in contextध्यान और समाधि ९५
एकमात्र कर्तव्य हो जाता है कि जिसकी जो इच्छा हो वही करे, सब अपना-अपना देखे। तब तो यही कहावत चरितार्थ होने लगती है—'यावन् जीवेत् सुखं जीवेत्, ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्...।' यदि हम लोगों के भविष्य अस्तित्व की आशा ही न रहे, तो मै अपने भाई को क्यो प्यार करूँ, मै उसका गला क्यों न काटूँ? यदि जगत् के अतीत कोई सत्ता न रहे, यदि मुक्ति नामक कोई चीज न हो, यदि कुछ कठोर, अमेद्य, जड़ नियम ही सर्वस्व हो, तब तो हमे इहलोक मे ही सुखी होने की प्राणपण से चेष्टा करनी चाहिए। आजकल बहुत से लोगो के मतानुसार उपयोगितावाद (utility) ही नीति की नींव है, अर्थात् जिससे अधिक लोगो को अधिक परिमाण में सुख-स्वाच्छन्द्य मिले, वही नीति की नींव है। इन लोगो से मै पूछता हूँ, हम इस नींव पर खड़े होकर नीति का पालन क्यो करे? क्यो? यदि अधिक मनुष्यो का अधिक मात्रा में अनिष्ट करने से मेरा मतलब सधता हो, तो मैं वैसा क्यो न करूँ ? उपयोगितावादी इस प्रश्न का क्या जवाब देंगे? कौन अच्छा है और कौन बुरा, यह तुम कैसे जानो? मैं अपनी सुख की वासना से परिचालित होकर उसकी तृप्ति करता हूँ, ऐसा करना मेरा स्वभाव है, मै उससे अधिक कुछ नही जानता। मेरी ये वासनाएँ हैं, और मै उनकी तृप्ति करूँगा ही; तुम्हे उसमें आपत्ति करने का क्या अधिकार है? मानव-जीवन के ये सब महान् सत्य, जैसे—नीति, आत्मा का अमरत्व, ईश्वर, प्रेम, सहानुभूति, साधुत्व और सर्वोपरि, सबसे महान् सत्य निःस्वार्थपरता—ये सब भाव हमे कहाँ से मिले है?
सारा नीतिशास्त्र, मनुष्य के सारे काम, मनुष्य के सारे विचार इस निःस्वार्थपरतारूप एकमात्र भाव (भित्ति) पर स्थापित