भारतकोश
राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा

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२१० राजयोग

पृथक् वस्तु है। प्रकृति एक वस्तु है और आत्मा दूसरी—सम्पूर्ण पृथक् और सर्वदा पृथक्। साङ्ख्याचार्यगण कहते हैं कि ज्ञान एक मिश्र पदार्थ है, उसका ह्रास और वृद्धि दोनो है, वह परिवर्तनशील है, शरीर के समान उसमें भी क्रमश परिणाम होता है, शरीर के जो सब धर्म है, उसके भी प्राय वैसे ही धर्म हैं। नख का शरीर के साथ जैसा सम्बन्ध है, वैसा ही देह का ज्ञान के साथ। नख शरीर का एक अंशविशेष है, उसे सैकडो वार काट डालने पर भी शरीर बचा रहेगा। ठीक इसी प्रकार, यह शरीर सैकडो बार नष्ट होन पर भी ज्ञान युग-युगान्तर तक बचा रहेगा। तो भी यह ज्ञान कभी अविनाशी नही हो सकता, क्योकि वह परिवर्तनशील है, उसका ह्रास है, वृद्धि है। और जो परिवर्तनशील है, वह कभी अविनाशी नही हो सकता। यह ज्ञान एक सृष्ट पदार्थ है, और इसी से यह स्पष्ट है कि इसके ऊपर—इससे श्रेष्ठ एक दूसरा पदार्थ अवश्य है। सृष्ट पदार्थ कभी मुक्तस्वभाव नही हो सकता; भूत के साथ संश्लिष्ट प्रत्येक वस्तु प्रकृति के अन्तर्गत है और इसलिए वह चिरकाल के लिए बद्धभावापन्न है। तो फिर यथार्थ मे मुक्त है कौन? जो कार्य-कारण सम्बध के अतीत है, वही वास्तव में मुक्तस्वभाव है। यदि तुम कहो कि यह मुक्तभाव भ्रमात्मक है, तो मै कहूँगा कि यह बद्धभाव भी भ्रमात्मक है। हमारे ज्ञान मे ये दोनो ही भाव सदैव वर्तमान हैं, वे आपस में एक दूसरे के आश्रित है, एक के न रहने से दूसरा भी नही रह सकता। उनमें से एक भाव यह है कि हम बद्ध हैं। मान लो, हमारी इच्छा हुई कि हम दीवार के बीच में से होकर चले जायें। हम चेष्टा करते हैं और हमारा सिर दीवार से टकरा जाता है, तब हम देख पाते हैं कि हम