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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा

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२१२ राजयोग

इस बुद्धि के भी पीछे पुरुष विद्यमान है। वही एकत्वस्वरूप है। उसी के पास जाकर ये सब अनुभूतियाँ एकीभाव को प्राप्त होती हैं। आत्मा ही वह केन्द्र है, जहाँ समस्त भिन्न-भिन्न इन्द्रिय-अनुभूतियाँ जाकर एकीभूत होती है। यह आत्मा मुक्तस्वभाव है और उसका यह मुक्तस्वभाव ही तुम्हे प्रति क्षण कह रहा है कि तुम मुक्त हो। लेकिन भ्रम में पडकर तुम उस मुक्तस्वभाव को प्रति क्षण बुद्धि और मन के साथ मिला दे रहे हो। तुम उस मुक्तस्वभाव को बुद्धि पर आरोपित करते हो और दूसरे ही क्षण देखते हो कि बुद्धि मुक्तस्वभाव नही है। तुम फिर उस मुक्तस्वभाव को देह पर आरोपित करते हो, और प्रकृति तुम्हे तुरन्त बता देती है कि तुम फिर से भूल रहे हो, मुक्ति देह का धर्म नही है। यही कारण है कि हमारी मुक्ति और बन्धन ये दो प्रकार की अनुभूतियाँ एक ही समय देखने मे आती है। योगी मुक्ति और बन्धन दोनो का विचार करते हैं, और उनका अज्ञानान्धकार दूर हो जाता है। वे जान लेते हैं कि पुरुष मुक्त-स्वभाव है, ज्ञानघन है, वह बुद्धिरूप उपाधि के भीतर से इस सान्त ज्ञान के रूप मे प्रकाशित हो रहा है, बस इसी दृष्टि से वह बद्ध है।

तदर्थ एव दृश्यस्यात्मा ॥२१॥

सूत्रार्थ— (उक्त) दृश्य अर्थात् प्रकृति का स्वरूप (यानी विभिन्न रूपो में परिणाम) उस (द्रष्टा, चिन्मय पुरुष) के ही (भोग तथा मुक्ति के) लिए है।

व्याख्या— प्रकृति की अपनी कोई शक्ति नही है। जब तक पुरुष उसके पास उपस्थित रहता है, तभी तक उसकी शक्ति है ऐसा बोध होता है। चन्द्रमा का प्रकाश जैसे उसका