भारतकोश
राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 7, कुल 534 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 7

प्रतापगढ़ राज्य के इतिहास को हम तीन भागों में विभक्त कर सकते हैं— १—मुग़लों से पूर्व का काल २—मुग़ल-काल ३—ब्रिटिश-काल मुग़लों से पूर्व का इस राज्य के नरेशों का जो इतिहास मिलता है वह इतना कम है कि उससे उनके व्यक्तित्व और कार्यों पर विशेष प्रकाश नहीं पड़ता; पर उससे इतना अवश्य पाया जाता है कि मेवाड़ से अलग हो जाने पर भी उन्होंने उसको अपनी मातृभूमि समझा, वीर-प्रसूता मेवाड़-भूमि का उनके हृदय में बड़ा आदर रहा और वे उसकी रक्षा के लिए सदा प्राणोत्सर्ग करने के लिए तत्पर रहते थे। भारतवर्ष में मुग़लों की प्रभुता स्थापित होने पर कितने ही अन्य राजाओं के समान प्रतापगढ़ राज्य के नरेशों ने भी मुग़लों की अधीनता स्वीकार कर ली और समय- समय पर उन्हें उनकी तरफ़ से उच्च सम्मान और मनसब आदि मिलते रहे। इस बीच मरहठों का आतंक बढ़ने पर प्रतापगढ़ भी उनके प्रभाव से मुक्त न रहा और यहां भी उनकी चौथ लगने लगी। ब्रिटिश-काल शांति, सुव्यवस्था और उन्नति का युग रहा है। ई० स० १८१८ में अंग्रेज़ सरकार के साथ सन्धि होने के बाद बाह्य और आन्तरिक झगड़ों की समाप्ति होकर राज्य उन्नति-पथ पर अग्रसर हुआ। विगत वर्षों में राज्य की राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक स्थिति में बहुत अन्तर हो गया है। बहुत से प्रजा-हित के कार्यों का भी इसी काल में श्रीगणेश हुआ, जो भविष्य में सामूहिक दृष्टि से राज्य के लिए हितकर सिद्ध होंगे, फिर भी इस ओर अभी बहुत गुंजाइश है। प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास तैयार करने में निम्नलिखित चार प्रकार की सामग्री का उपयोग हुआ है— १—प्राचीन शिलालेख, दानपत्र और सिक्के २—बड़वे भाटों आदि की ख्यातें