रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय राम साक्षात् विष्णु के अवतार थे, इसके विरोधी वादों का खण्डन २०५ "सीतां धर्षयता मान्यां त्वया ह्यसदृशं कृतम्। वसुधाया हि वसुधां श्रियाः श्रीं भर्तृवत्सलाम् ॥" (वा० रा० ६।११३।२१) तदनन्तर इन्द्र, कुबेर, यम, वरुण आदि देवताओं के साथ साक्षात् लोकपिता ब्रह्मा ने स्पष्टरूप से राम को परमात्मा, अक्षर, नारायण, पुरुषोत्तम, कर्ता आदि सम्बोधनों से सम्बोधित किया है। यह भी सभी रामायणों के राम-प्रकरण में विस्तार से प्राप्त होता है । बुल्के उपर्युक्त सभी श्लोकों को प्रक्षेप कहने का साहस करते हैं। वे अनुच्छेद १२३ के ( ५ ) में लिखते हैं; "अग्निपरीक्षा के समय देवता आकर राम की विष्णुरूप में स्तुति करते हैं।¹ इस सर्ग के प्रक्षेप होने में कोई सन्देह नहीं है। (दे० आगे अनु० ५६५) इसमें सीता और लक्ष्मी की अभिन्नता का भी उल्लेख है।" परन्तु उनका यह कथन निःसार है, कारण वाल्मीकिरामायण के सभी पाठ प्रामाणिक हैं। पाठ-भेद या समानान्तर में किसी श्लोक का न होना प्रक्षिप्त होने में कारण नहीं कहा जा सकता, ऐसे विभिन्न पाठों के श्लोक समानान्तर में न होने पर भी प्रक्षिप्त नहीं हैं। आश्चर्य तो यह है कि बुल्के पहले युद्धकाण्ड को प्रामाणिक मानते हैं, किन्तु उसमें भी राम के परमात्मा होने के सर्ग और श्लोक मिलते हैं तो वे इन सर्गों और श्लोकों को ही प्रक्षिप्त कह देते हैं । वाल्मीकिरामायण से श्लोक उद्धृत कर मैंने भी यह बताया ही है कि मन्दोदरी ने सीता को श्री की भी श्री कहा है । पुनः बुल्के लिखते हैं, "सीता की अग्निपरीक्षा के प्रक्षिप्त होने में कम सन्देह है। इस प्रसङ्ग में सीता के प्रति राम के प्रेम में जो सहसा परिवर्तन दिखाया गया है, वह अप्रत्याशित ही नहीं सर्वथा अस्वाभाविक भी है। सीताहरण के बाद राम के विरह का बहुत से सर्गों में वर्णन किया गया है। युद्धकाण्ड के प्रारम्भ में राम स्वयं कहते हैं कि मेरा विरहजनित शोक दिनों-दिन बढ़ता जाता है— "शोकश्च किल कालेन गच्छता ह्यपगच्छति । मम चापश्यतः कान्तामह्न्यहनि वर्धते ॥" लङ्कावरोध के बाद भी सीता के लिए राम की अभिलाषा का उल्लेख किया गया है "जगाम मनसा सीतां दूयमानेन चेतसा ।” (वा० रा० ५।४२।७ ) इन्द्रजित् द्वारा माया सीता के वध का समाचार सुनकर राम मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़े— "तस्य तद्वचनं श्रुत्वा राघवः शोकमूर्च्छितः । निपपात तदा भूमौ छिन्नमूल इव द्रुमः ॥” (वा० रा० ५।८३।१०) इससे स्पष्ट है कि सीता के प्रति राम का प्रेम अपरिवर्तित बना हुआ था, किन्तु यह सब होते हुए भी रावणवध के पश्चात् राम सीता को देख कर उनसे कहते हैं कि मैं अपने शत्रु के अपमान का प्रतीकार कर चुका हूँ। मुझे तुम्हारे प्रति कोई आकर्षण नहीं रहा। लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न, सुग्रीव, अथवा विभीषण किसी को भी पति के रूप में चुन सकती हो। मुझे तुम्हारे चरित्र पर सन्देह है। अग्निपरीक्षा के बाद राम अवश्य स्वीकार करते हैं कि मैंने तो तुम पर सन्देह नहीं किया, किन्तु जनता की दृष्टि से तुम्हारे इस शुद्धिकरण की आवश्यकता थी। इस प्रकार का दिखावा समस्त मूल वाल्मीकिरामायण की भावधारा के विरुद्ध है और अवतारवाद स्वीकार होने के पश्चात् ही ऐसा सम्भव था। परवर्ती साहित्य में इसपर बारम्बार बल दिया जाता है कि राम को वास्तविक दुःख नहीं है। वह केवल मनुष्य-चरित्र करते हैं। अतः आश्चर्य नहीं होना चाहिये कि इस प्रसङ्ग में राम तथा सीता दोनों के अवतार १. दे० वा० रा० सर्ग ११७ तथा अन्य पाठों के समानान्तर स्थल ।