रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमनोरमा तथा दिव्य रूपवाली विशेषतः अपने गृह में पर्यवस्थित तुम्हें देखकर रावण अधिक काल तक सहन नहीं कर सकता था। कालान्तर में अवध के कुछ पौरों ने भी लगभग राम के कथन के सदृश शब्दों में ही वैसी शङ्का उप- स्थित की थी । यह सब भारतीय धर्म तथा संस्कृति के अनुसार स्वाभाविक ही था। श्रीसीता ने अग्नि-प्रवेशरूप दिव्य प्रत्यय देकर इन सभी आरोपों एवं अपवादों का समूल उन्मूलन कर अपने अखण्ड अनन्त दिव्य पातिव्रत्य तेज को प्रकट कर दिया। यही भारतीय नारी का आदर्श है। साक्षात् अग्नि ने तथा सब देवताओं ने सीता की शुद्धता का साक्ष्य दिया। तब राम ने सीता को ग्रहण किया। भारतीय प्रेम और मर्यादा के समन्वय का यही सुन्दर आदर्श है। पाश्चात्य संस्कारों के कारण बुल्के के लिए यह सब अस्वाभाविक एवं असम्भव प्रतीत होता है। यथार्थतः यह सब दिखावा नहीं अपितु वस्तुस्थिति थी। राम को सीता के सतीत्व पर पूर्ण विश्वास होने से ही राम ने उन राक्षसों और वानरों के सम्मुख ही सीता से यह सब कहा । इस कथन का एकमात्र उद्देश्य यही था कि जनता में कोई लोकापवाद न हो । सीता के चरित्र पर कहीं किसी को कोई शङ्का न हो। “मनसा, वाचा, कर्मणा, बुद्ध्या, चक्षुषा किसी तरह भी सीता ने तुम्हारा अतिक्रमण नहीं किया यह अत्यन्त निष्पापा और विशुद्धभावा है।” लोकसाक्षी पावक के यह कहने पर राम ने कहा यद्यपि सीता पवित्र है फिर भी लोक में इसकी पवित्रता व्यक्त होनी चाहिये, क्योंकि वह दीर्घकाल तक रावण की लङ्का में रही है। यदि मैं बिना विशुद्धि किये उसको ग्रहण करता तो लोक यही कहता कि दशरथात्मज राम बालिश एवं कामात्मा थे, इसलिए परगृहोषिता सीता की विशुद्धि किये बिना ही उसको ग्रहण कर लिया (सर्ग ११५-११८) अतः सीता शुद्धि नितरां अपेक्षित थी। मूलरामायण में जिसको बुल्के पहली अनुक्रमणिका कहते हैं, अग्निपरीक्षा का स्पष्ट वर्णन है। “तेन गत्वा पुरीं • लङ्कां हत्वा रावणमाहवे । रामः सीतामनुप्राप्य परा व्रीडामुपागमत् ॥ तामुवाच ततो रामः परुषं जनसंसदि । अमृष्यमाणा सा सीता विवेश ज्वलनं सती ॥ ततोऽग्निवचनात् सीतां ज्ञात्वा विगतकल्मषाम् । कर्मणा तेन महता त्रैलोक्ये सचराचरम् ॥ सदेवर्षिगणं तुष्टं राघवस्य महात्मनः । बभौ रामः सम्प्रहृष्टः पूजितः सर्वदैवतैः ॥” ( वा० रा० १।१।८१-८४ ) अर्थात् सेतु के द्वारा लङ्का जाकर, रावण को मारकर एवं सीता को प्राप्त कर सीता के रावणगृह-निवास के कारण राम व्रीड़ा ( लज्जा ) को प्राप्त हुए और जन-संसद् में ही सीता के प्रति परुष वचन बोले । उन्हें अमृष्य- माणा ( सहन न कर ) सीता ने अग्नि में प्रवेश किया। पुनश्च अग्नि-वचन से सीता को विगतकल्मषा जान कर राम संप्रहृष्ट हुए। उस अग्नि-प्रवेश से देवर्षिगण सहित सचराचर त्रैलोक्य राम पर परितुष्ट हुआ। सब देवताओं से पूजित राम सम्यक् प्रसन्न हुए। प्रस्तुत संस्करण को प्रामाणिक न मानना भी निराधार है। १८५२ शक, १९३० ई० में यह निर्णय सागर में प्रकाशित हुआ है। इसपर अत्यन्त प्रामाणिक रामाभिरामी टीका है। प्रसिद्ध शब्देन्दुशेखरकार नागेशभट्ट ने अपने शिष्य राम के नाम से इस टीका का निर्माण किया है। संक्षिप्त वर्णन में कितनी ही बातें छूट जाती हैं। अतः कहा नहीं कहा जा सकता कि किसी एक वर्णन में सभी कथाएँ अनिवार्य अपेक्षित हैं। फिर भी अग्नि परीक्षा का तो स्पष्ट उल्लेख है ही जिससे बुल्के कितना झूठ बोलते हैं यह भी साफ हो जाता है।