रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 288, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय राम साक्षात् विष्णु के अवतार थे, इसके विरोधी वादों का खण्डन २११ उसका वध नहीं हो सकता था। अतः रावण-मरण के बाद ही ब्रह्मादि देवताओं ने तथा शिव ने सार्वजनिकरूप में राम को ब्रह्मस्वरूप बतलाया । इसी प्रसङ्ग में वे आगे लिखते हैं, "सीता अपने आपको साधारण स्त्री मानती हैं और अपने इस जन्म के दुःखों का कारण पूर्व जन्म में किये हुए पाप को समझती हैं। १ यही नहीं राम का अवतार होना भी उनसे छिपा हुआ है। वह राम की तुलना विष्णु से करती हैं। २ राक्षसों के प्रति राम की हिंसात्मक प्रवृत्ति देखकर वह राम के परलोक के विषय में चिन्तित हैं ( वा० रा०, ३।९।१२ ) ! और जब रावण उनसे अनुरोध करता है कि वह राम, साधारण मनुष्य, को छोड़ दे, तो वह उत्तर नहीं देती कि राम साधारण मनुष्य नहीं हैं। युद्ध के समय भी वह राम को अमर नहीं समझती ।”३ बुल्के के उपर्युक्त बालोचित तर्क अकिञ्चित्कर हैं। यदि सीता ने रावण से या अन्य से राम के अवतार होने की बात कही भी होती तो बुल्के उसे प्रक्षेप कह देते। श्रीमद्भागवत में श्रीकृष्ण को स्पष्टतः अवतार कहा गया है और अनेक बार नन्द और यशोदा को तथा गोप और गोपिकाओं को भी श्रीकृष्ण का परमेश्वरत्व विदित हुआ है तो भी नन्द, यशोदा एवं गोप तथा गोपिकाएँ विरह से संतप्त होती हैं। क्योंकि मानव-जन्म के कारण मानवीय भावनाओं का पुनः पुनः सञ्चार होना स्वाभाविक है। इसी दृष्टि से सीता एवं राम के व्यवहारों को भी समझना उचित है। तुलसी के राम शुद्ध परमात्मा हैं तो भी लक्ष्मण को शक्ति लगने पर वे मूच्छित होते हैं और तरह तरह के प्रलाप करते हैं। इसी तरह की घटना सीता एवं राम के सम्बन्ध में भी हो तो क्या आश्चर्य ? साधारणतः भाग्यवैषम्य के दोष से पुराकृत दुष्कृतों के अनुसार ही प्राणी को सुख-दुःख की प्राप्ति होती है। सभी को स्वकृत कर्मों का फल भोगना पड़ता है—इस लौकिकी दृष्टि से ही सीता का उक्त कथन सङ्गत है। वस्तुतः सीता एवं राम लक्ष्मी एवं विष्णु के अवतार होते हुए भी जिस रूप को धारण कर प्रकट हुए हैं उसके अनुरूप ही उनका व्यवहार होना भी उचित ही है। यदि परब्रह्म या विष्णु नररूप में प्रकट हो सकता है तो नरानुरूप ही अन्य व्यवहार में भी अग्रसर हो सकता है। जब राम विष्णु से भिन्न नररूप में अवतीर्ण हैं तब विष्णु तुलना भी उचित ही है । रावण-वध के लिए भिन्नरूपता ही अपेक्षित भी थी । किं बहुना परब्रह्म के नरावतार में प्रायः सभी चेष्टाएँ नरानुरूप ही होती हैं; उसी दृष्टि से राम की हिंसात्मक प्रवृत्ति से आपाततः सीता को चिन्ता होती है। “अनिष्टाशङ्कीनि सुहृदां चेतांसि ।” सुहृदों के चित्तों में स्वभाव से अनिष्ट की चिन्ता बनी रहती है। यशोदा ने अनेक बार कृष्ण की ब्रह्म- रूपता का अनुभव कर लिया था, फिर भी कृष्ण के अनिष्ट की चिन्ता उनके मन में बनी ही रहती थी। ऐसी भावनाएँ वस्तुस्थितिमूलक न होकर सौहार्द-मूलक ही समझी जानी चाहिये । रावण को उत्तर देने के लिए सीता के द्वारा राम को विष्णु अवतार बताये जाने की अपेक्षा नहीं थी; “नहि कस्तूरिकामोदः शपथेन विभाव्यते ।” कस्तूरी की गन्ध को बताने के लिए शपथ की अपेक्षा नहीं होती। राम के लौकिक रूप से रावण का दर्पदलन होना सीता सम्भव मानती हैं। राम का लौकिक रूप ही रावण के छक्के छुड़ा देता है। १. दे० रा० ५।२५।१८; ६।११३।३६, ३७; ७।४८।३, ४ । २. दे० रा० ५।२१।२८; ५।३८।६५ । ३. रामकथा, पृष्ठ १३५ ।