रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 289, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ें२१२ रामायणमीमांसा षष्ठ “भुञ्जाना मानुषान् भोगान् दिव्यांश्च वरवर्णिनि । न स्मरिष्यसि रामस्य मानुषस्य गतायुषः ॥” (वा० रा० ३।४८।१४ ) रावण के उपर्युक्त वचनों का सीता ने भी राम की विशेषता का वर्णन करते हुए उत्तर दिया है, “जीवेच्चिरं वज्रधरस्य वज्राच्छचीं प्रधृष्याप्रतिरूपरूपाम् । न मादृशीं राक्षस धर्षयित्वा पीतामृतस्यापि तवास्ति मोक्षः ॥” (वा० रा० ३।४८।२४) अर्थात् वज्रधर इन्द्र की शची का हरण करके भी कोई जीवित रह सकता है, परन्तु मुझ जैसी का धर्षण कर अमृत पी लेने पर भी तुम्हारा बचना कदापि सम्भव नहीं है । इतने पर भी क्या राम विष्णु ही हैं ऐसा कहना ही अनिवार्यतः अपेक्षित है ? वस्तुतः ऐसा कथन निरर्थक ही होता, क्योंकि विष्णु आदि के द्वारा अवध्य होने का वरदान उसे प्राप्त था । सीता पुनः कहती हैं— “वर्जयेद् वज्रमुत्सृष्टं वर्जयेदन्तकश्चिरम् । त्वद्विधं न तु संक्रुद्धो लोकनाथः स राघवः ॥” (वा० रा० ५।२१।३२ ) अर्थात् इन्द्र द्वारा उत्सृष्ट वज्र कदाचित् तुम्हारे प्राणों को छोड़ दे, साक्षात् अन्तक ( काल ) भी भले तुम्हें छोड़ दे, परन्तु संक्रुद्ध लोकनाथ राम त्वादृश पापी को प्राणदण्ड दिये बिना कभी नहीं छोड़ सकते । यहाँ लोक- नाथ शब्द स्पष्ट ही राम को परमेश्वर बता रहा है । क्या भगवान् से भिन्न भी कोई लोकनाथ हो सकता है ? “रामस्य धनुषः शब्दं श्रोष्यसि त्वं महारस्वनम् । शतक्रतुविसृष्टस्य निर्घोषमशनेरिव ॥” (वा० रा० ५।२१।२४ ) अर्थात् इन्द्र के छोड़े हुए वज्र की गड़गड़ाहट के समान श्रीरामचन्द्र के धनुष का घोर टंकार तुम शीघ्र ही सुनोगे । “राक्षसेन्द्रमहासर्पान् स रामगरुड़ो महान् । उद्धरिष्यति वेगेन वैनतेय इवोरगान् ॥” (वा० रा० ५।२१।२७ ) अर्थात् जैसे विनतानन्दन गरुड़ सर्पों का संहार करते हैं, वैसे ही रामरूपी गरुड़ राक्षसरूपी सर्पों का उन्मूलन करेंगे । “नहि गन्धमुपाघ्राय रामलक्ष्मणयोस्त्वया । शक्यं संदर्शने स्थातुं शुना शार्दूलयोरिव ॥” (वा० रा० ५।२१।३१ ) अर्थात् जैसे शार्दूल सिंह की गन्ध पाकर श्वान ठहर नहीं सकता वैसे ही राम और लक्ष्मण की गन्ध के आघ्राणमात्र से ही तुम भी नहीं ठहर पाओगे । “क्षिप्रं तव स नाथो मे रामः सौमित्रिणा सह । तोयमल्पमिवादित्यः प्राणानादास्यते शरैः ॥” (वा० रा० ५।२१।२३ ) अर्थात् जैसे आदित्य अल्पतोय को अनायास ही सुखा देता है, वैसे ही राम तुम्हारे प्राण ले लेंगे । “गिरिं कुबेरस्य गतोऽथवाऽऽलयं समागतो वा वरुणस्य राज्ञः । असंशयं दाशरथेर्न मोक्ष्यसे महाद्रुमः कालहतोऽशनेरिव ॥” (वा० रा० ५।२१।३४ )