झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२ झाँसी की रानी सन् १८१७ के जून में पन्त प्रधान बाजीराव से अङ्गरेजो की अन्तिम सन्धि हुई। इस सन्धि ने पेशवा के सम्पूर्ण अधिकार, ठोस और खोखले, जो उसको बुन्देलखण्ड में प्राप्त थे, ईस्ट इन्डिया कम्पनी को दे दिये। बाजीराव को इस सन्धि द्वारा आठ लाख रुपये वार्षिक पैन्शन बिठूर खास की जागीर और पूना त्याग कर बिठूर का प्रवास मिला। उसी साल नवम्बर के महीने में शिवराव भाऊ के पौत्र रामचन्द्रराव के साथ, जो उस समय नाबालिग था, दूसरी सन्धि हुई, जिसमें पेशवा का स्थानापन्न कम्पनी सरकार को मनवाया गया। एक शर्त उस सन्धि में यह भी थी कि झाँसी का राज्य रामचन्द्रराव के कुटुम्ब मे 'दवाम' के लिये रहेगा, चाहे वारिस औरस सन्तान हो, चाहे सगोत्रज हो अथवा गोद लिये हुये हो। सन् १८३२ में रामचन्द्रराव और उसके वारिसो को राजा की उपाधि दी गई। उस दरबार में शिवराव भाऊ के लडके रघुनाथराव और गङ्गाधर- राव भी थे। शिवराव भाऊ का जेठा लडका कृष्णराव था। उसका देहान्त हो चुका था। रामचन्द्रराव कृष्णराव का पुत्र था। शिवराव भाऊ के जेठे लडके की सन्तान होने के कारण झासी की गद्दी उसको मिली थी। राजा की उपाधि मिलने के उपलक्ष में जो दरबार हुआ था, उसमें राज्य के छोटे-बडे सब जागीरदार पुरस्कृत किये गये। छोटे जागीरदारो मे मऊ का एक युवक आनन्दराय कायस्थ था। उसके घराने में ताम्रपत्रो की सनदो द्वारा जो माफी लगी थी, वह पुष्ट की गई। कुछ बढा भी दी गई। गायक, वादक और नर्तकियो पर भी पुरस्कार बरसाये गये। रामचन्द्रराव की नाबालिगी के ज़माने में शासनसूत्र उसकी मा सखूबाई के हाथ में था। जब वह वयस्क हो गया तब भी सखूबाई