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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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लक्ष्मीबाई ~ ३ रामचन्द्रराव ने राजा की स्थायी उपाधि पाते ही शासनसूत्र, पूरे तौर पर, अपने हाथ में ले लिया और दो-एक दिन मे ही खजाने को लगभग रीता कर दिया । सखूबाई को खजाने का खाली होना इतना नही अखरा जितना अपने हाथ से राज्य की बागडोर का चला जाना । सखूबाई ज़रा ढली आयु की प्रचण्ड वेगमयी राजमाता थी । माथे और चेहरे की शिकने राजदण्ड के निरन्तर कठोर उपयोग और क्रोध के आवेशो के व्यवहार की कथा कहती थी । उसकी कठोरता विख्यात थी । सखूबाई से रामचन्द्रराव का राजा होना नही सहा गया । उसने रामचन्द्रराव को मरवा डालने का षडयन्त्र रचा । झाँसी के लक्ष्मी-फाटक के बाहर लक्ष्मी-तालाब के दक्षिण-पश्चिमी सिरे पर महालक्ष्मी का मन्दिर है । इस मन्दिर के चौपडे में सखूबाई ने अपने लडके का वध करने के लिये भाले गडवाये । रामचन्द्रराव को तैरने का बहुत शौक था—विशेषकर रात में। सखूबाई को विश्वास था कि उस रात रामचन्द्रराव चौपड़े में तैरने के लिये मुटार लगायगा—और समाप्त हो जायगा । परन्तु लालू कोदेलकर नाम के एक मराठा युवक और मऊ के उपरोक्त आनन्दराय की सहायता के कारण रामचन्द्रराव बच गया । आनन्दराय तो अपने घर मऊ निकल भागा, पर कोदेलकर को दो दिन बाद सखूबाई ने मरवा डाला । लालू कोदेलकर के तीन दरिद्र नातेदार थे । वे झाँसी से भागे । लालू के देहान्त के कुछ समय उपरान्त इन तीनो के एक-एक लडकी हुई । इन बालिकाओ के नाम थे काशी, सुन्दर और मुन्दर । तीनो बालिकाये सुन्दर थी । परन्तु इनका लालन- पालन बडी दरिद्रता में हुआ । सखूबाई का क्रोध कोदेलकर ही तक सीमित न था, उसके नातेदार भी आतङ्कग्रस्त थे और राज्याश्रय से वञ्चित । रामचन्द्रराव अपनी माँ के साथ, इतना सब होने पर भी, कठोर बर्ताव नही करना चाहता था । परन्तु उसके दोनो काका—रघुनाथराव