झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
पृष्ठ 13, कुल 526 में से
संदर्भ में पढ़ें४ झाँसी की रानी और गङ्गाधरराव —तथा दीवान, सखूबाई को स्वतन्त्र नही छोडना चाहते थे । वह कैद कर दी गई । लालू कोदेलकर के नातेदार झाँसी बुला लिये गये और मऊ के आनन्दराव को सरक्षण मिल गया । रामचन्द्रराव सन् १८३५ मे निस्सन्तान मरा । उसकी विधवा रानी ने कृष्णराव नामक एक बालक को गोद लिया । कम्पनी सरकार ने इस गोद को नही माना । रघुनाथराव को, उत्तराधिकारी करार देकर, गद्दी दी । गङ्गाधरराव रघुनाथराव से छोटे थे । जब शिवराव भाऊ के जेठे भाई रघुनाथ हरि (१७५६-१७६६) झाँसी के सूबेदार होकर आये तब जो लगान किसानो पर बाधा गया, ज्यादा था । सबका-सब कभी वसूल नही होता था । पूरा बीस लाख रुपया साल सखूबाई ने ही रामचन्द्रराव की नाबालिगी के समय मे वसूल करने का प्रयास किया । गाँवटी पञ्चायते हाहाकार कर उठी । परन्तु उस सामन्त युग मे, विचारे किसान लुटेरो और बटमारो के सन्ताप के मारे कुछ कर ही नही सकते थे । रामचन्द्रराव के राज्यकाल में लगान उत्तरोत्तर कम वसूल किया जाने लगा । खजाने मे जो कुछ रुपया था उसका एक अश सखूबाई ने दाब लिया और अधिकाश रामचन्द्रराव ने खर्च कर डाला । बाकी रघुनाथराव के शिथिल शासन में साफ हो गया । रघुनाथराव रङ्गीली प्रकृति के रईस थे । उनकी वेश्याओ में से लच्छो नाम की एक मुसलमान वेश्या थी । इससे दो लडके और लडकियाँ हुई । बडे लडके का नाम नवाब अलीबहादुर था । जब रघुनाथराव सन् १८३५ में झाँसी के राजा हुये, अलीबहादुर की आयु २२ वर्ष की थी । लच्छो की कबर आँतिया ताल के बँध के नीचे मेहदी बाग में है ।* एक समय था जब लच्छो नईबस्ती के महल में रहती थी
- झाँसी के सदर अस्पताल के अहाते में जिस गजरा वेश्या की कबर है उसको गङ्गाधरराव के पिता शिवराव भाऊ रक्खे थे, न कि रघुनाथराव या गङ्गाधरराव, जैसा कि अनेक इतिहास लेखको का भ्रम है ।