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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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४ झाँसी की रानी और गङ्गाधरराव —तथा दीवान, सखूबाई को स्वतन्त्र नही छोडना चाहते थे । वह कैद कर दी गई । लालू कोदेलकर के नातेदार झाँसी बुला लिये गये और मऊ के आनन्दराव को सरक्षण मिल गया । रामचन्द्रराव सन् १८३५ मे निस्सन्तान मरा । उसकी विधवा रानी ने कृष्णराव नामक एक बालक को गोद लिया । कम्पनी सरकार ने इस गोद को नही माना । रघुनाथराव को, उत्तराधिकारी करार देकर, गद्दी दी । गङ्गाधरराव रघुनाथराव से छोटे थे । जब शिवराव भाऊ के जेठे भाई रघुनाथ हरि (१७५६-१७६६) झाँसी के सूबेदार होकर आये तब जो लगान किसानो पर बाधा गया, ज्यादा था । सबका-सब कभी वसूल नही होता था । पूरा बीस लाख रुपया साल सखूबाई ने ही रामचन्द्रराव की नाबालिगी के समय मे वसूल करने का प्रयास किया । गाँवटी पञ्चायते हाहाकार कर उठी । परन्तु उस सामन्त युग मे, विचारे किसान लुटेरो और बटमारो के सन्ताप के मारे कुछ कर ही नही सकते थे । रामचन्द्रराव के राज्यकाल में लगान उत्तरोत्तर कम वसूल किया जाने लगा । खजाने मे जो कुछ रुपया था उसका एक अश सखूबाई ने दाब लिया और अधिकाश रामचन्द्रराव ने खर्च कर डाला । बाकी रघुनाथराव के शिथिल शासन में साफ हो गया । रघुनाथराव रङ्गीली प्रकृति के रईस थे । उनकी वेश्याओ में से लच्छो नाम की एक मुसलमान वेश्या थी । इससे दो लडके और लडकियाँ हुई । बडे लडके का नाम नवाब अलीबहादुर था । जब रघुनाथराव सन् १८३५ में झाँसी के राजा हुये, अलीबहादुर की आयु २२ वर्ष की थी । लच्छो की कबर आँतिया ताल के बँध के नीचे मेहदी बाग में है ।* एक समय था जब लच्छो नईबस्ती के महल में रहती थी

  • झाँसी के सदर अस्पताल के अहाते में जिस गजरा वेश्या की कबर है उसको गङ्गाधरराव के पिता शिवराव भाऊ रक्खे थे, न कि रघुनाथराव या गङ्गाधरराव, जैसा कि अनेक इतिहास लेखको का भ्रम है ।