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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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लक्ष्मीबाई १२१ [ २५ ] झासी की जनता के पञ्चो, सरदारो, और सेठ साहूकारो को जो इस उत्सव पर निमन्त्रित किये गये थे, इत्र पान भेट इत्यादि से सम्मानित करके विदा किया गया । केवल मेजर एलिस, कप्तान मार्टिन, मोरोपन्त और—प्रधान मन्त्री नरसिंहराव वहा रह गए । निकट ही पर्दे के पीछे रानी लक्ष्मीबाई बैठी हुई थी । राजा ने एक खरीता कम्पनी सरकार के नाम लिखवाया । उसका सार यह है:— 'बुन्देलखण्ड मे कम्पनी सरकार का राज्य स्थापित होने के पहले से हमारे पूर्वज उनकी हर तरह की सहायता करते आये हैं और मैंने स्वय जीवन भर उनकी सहायता की है । मेरे घराने के साथ कम्पनी सरकार की जो संघिया समय समय पर हुई हैं, उनसे हमारा हक बराबर पुष्ट होता चला आया है । मैं इस समय रोग ग्रस्त हू । अच्छे होने की आशा है और यह भी आशा है कि स्वस्थ होने पर मेरे सन्तान हो, परन्तु यह सोच कर कि कदाचित् मेरा देहान्त हो जाय और बिना उत्तराधिकारी के यह राज्य नष्ट हो जाय, अपने कुटुम्ब के एक पञ्चवर्षीय बालक आनन्दराव को हिन्दू धर्म शास्त्र के अनुसार गोद लिया है । वह नाते में मेरा पौत्र लगता है । यदि मै स्वस्थ न हो सका और मेरा देहान्त हो गया तो यही बालक, जिसका नाम गोद के उपरान्त दामोदरराव रक्खा गया है, झासी राज्य का उत्तराधिकारी होगा । जब तक मेरी पत्नी जीवित रहे, तब तक इस राज्य की स्वामिनी और इस बालक की माता समझी जावे और राज्य की व्यवस्था उसी के आधीन रहे । मैं चाहता हू कि उसको किसी प्रकार का कष्ट न हो ।' राजा ने खरीता अपने हाथ से एलिस के हाथ में दिया । राजा का गला रुद्ध हो गया और आखो मे आसू भर आये । पर्दे के पीछे रानी की सिसक सुनाई पडी मानो उस खरीते पर इस सिसक की मुहर लगी हो ।