झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२२ झांसी की रानी गले को किसी तरह काबू में करके राजा ने एलिस से कहा, 'आपको मैं अपना मित्र मानता हू । बडे साहब मालकम भी मेरे मित्र हैं । गार्डन तो वैसे मेरा छोटा भाई हो ...' राजा के हृदय में पीडा हुई । वे रुक गये । एलिस ध्यानपूर्वक उनकी बात सुनने लगा । राजा बोले, 'इस समय गार्डन मेरे पास होता तो मुझको बडी खुशी होती' और मुस्कराए । पीड़ा कम्पित होठो पर वह अर्द्धस्मित किसी असह कष्ट को जोर के साथ दबा गया । 'गार्डन का हुक्का दीवान खास में रक्खा हुआ है पियो तो मँगवा दूँ।' 'नही सरकार ।' 'देखो मेजर साहब दामोदरराव कितना सुन्दर है। यह बडा होनहार है। मेरी रानी सी माता को पाकर झासी को चमका देगा । मेरी झासी को ये दोनो बडा भारी नाम देंगे ..' पर्दे के पीछे फिर सिसकी सुनाई दी । एलिस ने आख के एक कोने से उस ओर देखकर मुह फेर लिया । राजा ने पर्दे की ओर मुह फेरकर रुद्ध स्वर में, मुश्किल से, कहा, 'यह क्या है ? रोती हो ? मै अच्छा हो रहा हूँ। पर मुझे अपनी बात तो कह लेने दो।' रानी ने धीरे से खांसकर अपना कठ संयत किया । राजा स्थिर होकर बोले, 'मेजर साहब हमारी रानी स्त्री जरूर है, परन्तु इसमें ऐसे गुण हैं कि संसार के बडे बडे मर्द इसके पैरो की धूल अपने माथे पर चढावेगे । बहुत प्रयत्न करने पर भी राजा अपने आसुओ को न रोक सके । एलिस ने कहा, 'महाराज थोड़ी बात करे नही तो तबियत देर में अच्छी हो पावेगी ।' रानी ने जरा जोर से खासा मानो राजा को निवारण कर रही हो ।