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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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लक्ष्मी बाई १२३ दुर्बल हाथो़ से राजा ने आंसू पोछे। गले को नियन्त्रित किया। 'बोले रानी बहुत अच्छी व्यवस्था करेगी। आप लोग दामोदरराव की नावालिगी के कारण परेशान मत होना।' राजा के हृदय में पीडा बढी। किसी प्रकार उसको काबू में करके उन्होने कहा, 'मुझे झासी के लोग बहुत प्यारे हैं। मैं चाहता हू मेरी जनता सुखी रहे। मैने जिसको जो कुछ दिया है, वह सब उसके पास बना रहना चाहिये। मुगलखा बहुत बडा गवैंया है मेजर साहब।' एलिस ने सोचा गङ्गाधरराव का दिमाग फिरने को है। जरा चिन्तित हुआ। राजा बोले, 'उसको मैने इनाम में हाथी दिया है। वह उसी के पास रहेगा। और हाथी के व्यय के लिये मैंने जो कुछ लगा दिया है वह भी उसके पास रहना चाहिये।' इसके उपराप राजा को खासी आई और साथ ही रक्त। प्रतापसाह वैद्य बाहर मौजूद था। बुला लिया गया। दवा दी गई। राजा को कुछ चैन मिला। पर वह जान गये कि यह क्षणिक है। बोले, 'एलिस साहब, ये हमारे वैद्य जी बडे हठी हैं। अपना एक अलग नगर बसा रहे हैं। मैने अनुमति दे दी है। इनके हठ को कोई तोडे नही।' वैद्य की आंख में भी एक आंसू आ गया। उसको वैद्य ने किसी बहाने से जल्दी पोछ डाला। वैद्य बाहर चला गया। राजा के होठो पर एक क्षीण मुस्कराहट फिर आई। 'मैं चाहता हूँ कि मेरी नाटकशाला मे चाहे खेल हो या न हो, परन्तु पात्रो के लिये जो वेतन खजाने से दिया जाता है वह उनको मिलता रहे।' राजा फिर खासे। अबकी बार ज्यादा खून आया। वैद्य फिर भीतर आया। उसने आज्ञा के स्वर में प्रतिवाद किया, 'महाराज अब बिलकुल न बोले...'