झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२४ झांसी की रानी राजा ने तुरन्त कहा, 'थोडा सा और फिर बस । तुम्हारी और तुम्हारी दवा की कोई जरूरत न रहेगी ।' राजा की आकृति बिगडी । सब लोग चिन्तत और भयभीत हुये । बहुत कष्ट के साथ बोले, 'मेजर साहब एक अन्तिम प्रार्थना—बस एक — झाँसी अनाथ न होने पावे ० ।' कराहने लगे । आँखे फिरने लगी । कप्तान मार्टिन एक ओर चुप बैठा हुआ था । उसने एलिस को चल देने का संकेत किया । एलिस उठना ही चाहता था कि राजा बोले, चित्रकार सुखलाल, हृदयेश कवि.....' एलिस उठा उसने प्रणाम करके राजा से कहा, 'सरकार हम लोग जाते हैं । समाचार मिलते ही तुरन्त हाजिर होगे ।' राजा ने आँखे स्थिर की । कहा, 'मेजर साहब भूलना मत । हमको आपका भरोसा है । हमारी प्रार्थना को ध्यान में रखना । लाट साहब को मेरी बिनती.. ' इसके बाद वे नही बोल सके और बेसुध हो गये । एलिस और मार्टिन चले गये । लक्ष्मीबाई तुरन्त पर्दे से बाहर निकल आई । पति की उस दशा को देखकर चीत्कार कर उठी । मोरोपन्त ने दामोदरराव को बुलवा लिया । नाना भोपटकर लेकर आये । रानी को कुछ सान्त्वना मिली ।