झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई ५
और मेंहदी बाग के फूल उस पर न्योछावर होते थे—अब उसकी टूटी कबर पर घास और जङ्गली पौधे खड़े हुये हैं। रघुनाथराव और लच्छो के महल खण्डहर हो गये हैं और उनमे झाँसी म्युनिस्पैलटी की कूडा- ,गाडियाँ रक्खी जाती हैं, बैल बांधे जाते हैं और उनके लिये घास-चारा भरा जाता है। सखूबाई के शासनकाल मे रघुनाथराव और गङ्गाधरराव—दोनो भाइयो—की मनोवृत्तियाँ आमोद-प्रमोद की ओर झुकी, बढी और उसी मे तल्लीन हुई। लडाइयाँ लडनी नही थी कि जिस कारण प्रजा को— खास कर किसानो को—सतुष्ट रक्खा जावे । कुराज्य था, कुशासन था। परन्तु गाँवटी पञ्चायते बनी हुई थी। पूरा लगान वसूल नही होता था। पञ्चायत की रक्षा प्रत्येक ग्रामीण को सहज ही प्राप्य थी। पञ्चायतो के अधिकार जब्त होकर अदालतो के हवाले नही हुये थे। जरा-जरा सी सडी-गली बात के लिये राज्य के पदाधिका- रियो के घरो पर हाजिरी नही देनी पडती थी। बडे मामलो के लिये बँधे हुये-हक-दस्तूरो—रिश्वतरो—के छेदो मे होकर जनता अपने नित्य के जीवन में आराम और निभाव को खींचती-घसीटती चली जाती थी। शासन-शक्ति का केन्द्रीकरण नही हुआ था। लोगो को अपने औसान और पराक्रम का सहारा पकडने के बहुधा अवसर मिलते रहते थे। समाज में सन्तुलन यथेष्ट नही था—समानता, विषमता स्पष्ट थी। परन्तु, आर्थिक श्रृंखलाओ की कडियाँ मजबूती के साथ जुडी हुई थी। धन एक जगह इकट्ठा हो होकर बट-बट जाता था। एक एक आश्रय पर शत शत आश्रित टंगे हुये, लिप्त और सलग्न थे। आश्रय और आश्रित सब क्रियाशील। जहाँ आश्रय श्रमहीन, प्रयत्नरहित और दुश्शील हुआ कि गया और उसका स्थान दूसरे प्रबल सबल स्थानापन्न ने ग्रहण किया। खोखला गौरव अपनी कहानी बहुत अल्प समय तक ही कह सकता था।