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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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१३० | झाँसी की रानी

जनरल को अपनी काउन्सिल की सम्मति को रद्द करने का पूरा अधिकार है। यहां की जनता को मुट्ठी में रखने के लिये कुछ राजा नवाबों का बनाए रखना बहुत जरूरी है। और यह भी बहुत जरूरी है कि ऐसे बड़े बड़े राजों और नवाबों की रियासतों में अत्याचार होते रहे, जिसमें अंग्रेजी इलाके की प्रजा अपनी बेहतर हालत को, रियासती प्रजा की अवतर हालत से सदा मुकाबला करती रहे, तोलती रहे। और पुकार कर कहती रहे कि हिन्दुस्थानी हुकूमत से अंग्रेजी हुकूमत बहुत अच्छी। समझे !' 'जनता में ऊँची-नीची श्रेणियां कायम रखने की जरूरत है।' 'तुम्हारा सिर। उनमें जात-पात, ऊँच-नीच बहुत सख्या में जमानों से है। केवल जिमीदारी, ताल्लुकेदारी प्रथा को मजबूती के साथ दाखिल करना रह गया है। बंगाल में हो गया है। सब जगह कर दिया जावेगा। सिर उठाने वाली जनता को ये जिमीदार, ताल्लुकेदार ही कुचल दिया करेंगे। हमको हाथ जमाने की परवाह ही न करनी पड़ेगी। सब बन्दोबस्त आराम से होता चला जावेगा।' 'मुझको यह शब्द 'बन्दोबस्त', बहुत प्यारा लगता है। हर जगह, कोने कोने में, बन्दोबस्त होना चाहिए। 'तुमने अभी अभी कहा 'तुम्हारा सिर' वापिस लो इसको। तुम क्या मुझसे होड़ लगा सकते हो कि हिन्दुओं की जात-पात और मुसलमानों का ऊँच नीच हमारे सहायक नहीं हैं ?' 'बेशक होड़ लगा सकता हूँ। यह सब होते हुए भी इन लोगों में बड़े बड़े राजा और बादशाह हुये हैं। फिर भी हो सकते हैं। इसलिये इस देश को अनन्त काल तक अपने हाथ में बनाये रखने के लिये— हिन्दुस्तानियों के लाभ और अपने रोजगार के हेतु—वही दूसरी तरकीब बेहतर है। हम-तुमसे कहीं ज्यादा चतुर राजनीतिज्ञों ने इस सम्पूर्ण समस्या पर यों ही माथापच्ची नहीं की है।'