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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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लक्ष्मीबाई १३७ विकट ठंड थी। ठिठुरा देने वाली। दीन दरिद्रो के दात मे दात बजाने वाली। उस पर सन्ध्या से ही बादल घिर आये। आधी चल उठी और पानी बरस पड़ा। नाना और तात्या रानी से बातचीत करने सध्या के पहले ही किले के महल में गये। भोजन के उपरान्त बातचीत होना थी और फिर डेरे को लौटना था। परन्तु ऋतु की कठोरता के कारण उनके विश्राम का वही प्रबन्ध करवा दिया गया। दीवान खास में बैठक हुई। सुन्दर, मुन्दर, और काशीबाई भी रानी के साथ थी। रानी का मुख दुर्बल हो जाने के कारण जरा लम्बा जान पडता था। तो भी उस सतेज सौन्दर्य के आतंक मे वही आदर उत्पन्न करने वाला ओज था। विशाल आखो की ज्योति और भी ज्वलन्त थी। रानी कोई आभूषण नही पहिने थी—केवल गले में मोतियो की एक माला और हाथ में हीरे की एक अगूठी। श्वेत साडी पर एक मोटा श्वेत दुशाला ओढे थी। सहेलिया भी जेवरो का त्याग करना चाहती थी, परन्तु रानी के आग्रह से उन्होने ऐसा नही कर पाया था। रानी—बुन्देलखण्ड के रजवाडे बुझे हुये दीपक हैं। उनमें तेल है, परन्तु लौ नही। नाना—'क्या उनमें लौ पैदा नही की जा सकती ?' रानी— कह नही सकती। तुमने ढूंढ खोज की ? मैं तो बाहर आने जाने से विवश रही हूँ, और हूँ।' तात्या—'मैं यो ही घूमा फिरा हूँ। विशेष तौर पर यहा के किसी राजा से प्रसग नही छेड़ा। परन्तु वातावरण बिलकुल ठस जान पडा। राजाओ को अपने सरदारो और प्रजा से प्रणाम लेने मे सुख की इति अनुभव होती है। हास विलास और सुरापान में मस्त रहते हैं।' रानी—'वीरसिंहदेव, छत्रसाल और दलपति के बुन्देलखण्ड का हाल कुछ और होना चाहिये था।' नाना—'लखनऊ और दिल्ली का हाल कुछ अच्छा है।'