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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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८ झाँसी की रानी सखू ने कोई परवाह नही की । मधुमास का महीना था । होली हो चुकी थी । जनता अपने रंग में मस्त थी । सखूबाई के इशारे पर फ्रेज़र की किले से बाहर निकलते ही बहुत दुर्गति हुई । फ्रेज़र सेना और तोपखाना लेकर लौटा । सखूबाई किला छोड़ कर भाग गई । अलीबहादुर करेरा त्याग कर कम्पनी की शरण में आगये, और उनको ५००) मासिक पेन्शन देना तै हो गया । झाँसी राज्य का मामला तै करने के लिये एक कमीशन बैठा । कमीशन ने उत्तराधिकार का निश्चय गङ्गाधरराव के हक में किया । गङ्गाधरराव कानपुर से झाँसी आ गये । धूमधाम के साथ उनका अभिषेक हुआ । परन्तु झाँसी राज्य पर कुप्रबन्ध और ऋण का इतना बोझ बढ गया था कि फिर कोर्ट हो गया । बात सन् १८३६ की है । गङ्गाधरराव साहित्य और ललित-कलाओ के पूरे रसिक थे । सुखलाल काछी उनका चित्रकार था । पढा लिखा कम, परन्तु कमल और कूची की सही विधि, कोमलता और हथौटी का आचार्य । गायक, वादक, खास कर ध्रुपद, वीणा और पखावज के उस्ताद और रीतिकाल तथा भक्ति- रस की ओट वाले कवि गङ्गाधरराव की महफिल को आबाद करने लगे । उन्होने दूर दूर से नाना-प्रकार के हस्त-लिखित ग्रन्थ इकट्ठे करवाये और विशाल पुस्तक भाण्डार से अपने पुस्तकालय को भर दिया । वेद, उपनि, षद्, दर्शन, पुरान, तन्त्र, आयुर्वेद, ज्योतिष, व्याकरण, काव्य इत्यादि के इतने ग्रन्थ उनके पुस्तकालय में थे कि लोग दूर दूर से उनकी प्रतिलिपि के लिये आने लगे । नाटको का उन्हे विशेष शौक था । वे संस्कृत नाटको का अनुवाद हिन्दी और मराठी में करवाया करते थे और उनका अभिनय भी करवाते थे । शहर के महल के ठीक पीछे पश्चिमी दिशा में नाटकशाला थी ।* *अब यह खंडहर है । गिरजाघर के उत्तर में केवल सडक बीच में है ।

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