झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८ झाँसी की रानी सखू ने कोई परवाह नही की । मधुमास का महीना था । होली हो चुकी थी । जनता अपने रंग में मस्त थी । सखूबाई के इशारे पर फ्रेज़र की किले से बाहर निकलते ही बहुत दुर्गति हुई । फ्रेज़र सेना और तोपखाना लेकर लौटा । सखूबाई किला छोड़ कर भाग गई । अलीबहादुर करेरा त्याग कर कम्पनी की शरण में आगये, और उनको ५००) मासिक पेन्शन देना तै हो गया । झाँसी राज्य का मामला तै करने के लिये एक कमीशन बैठा । कमीशन ने उत्तराधिकार का निश्चय गङ्गाधरराव के हक में किया । गङ्गाधरराव कानपुर से झाँसी आ गये । धूमधाम के साथ उनका अभिषेक हुआ । परन्तु झाँसी राज्य पर कुप्रबन्ध और ऋण का इतना बोझ बढ गया था कि फिर कोर्ट हो गया । बात सन् १८३६ की है । गङ्गाधरराव साहित्य और ललित-कलाओ के पूरे रसिक थे । सुखलाल काछी उनका चित्रकार था । पढा लिखा कम, परन्तु कमल और कूची की सही विधि, कोमलता और हथौटी का आचार्य । गायक, वादक, खास कर ध्रुपद, वीणा और पखावज के उस्ताद और रीतिकाल तथा भक्ति- रस की ओट वाले कवि गङ्गाधरराव की महफिल को आबाद करने लगे । उन्होने दूर दूर से नाना-प्रकार के हस्त-लिखित ग्रन्थ इकट्ठे करवाये और विशाल पुस्तक भाण्डार से अपने पुस्तकालय को भर दिया । वेद, उपनि, षद्, दर्शन, पुरान, तन्त्र, आयुर्वेद, ज्योतिष, व्याकरण, काव्य इत्यादि के इतने ग्रन्थ उनके पुस्तकालय में थे कि लोग दूर दूर से उनकी प्रतिलिपि के लिये आने लगे । नाटको का उन्हे विशेष शौक था । वे संस्कृत नाटको का अनुवाद हिन्दी और मराठी में करवाया करते थे और उनका अभिनय भी करवाते थे । शहर के महल के ठीक पीछे पश्चिमी दिशा में नाटकशाला थी ।* *अब यह खंडहर है । गिरजाघर के उत्तर में केवल सडक बीच में है ।