झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ४ ] स्वामिनी निकली मोतीबाई नाटकशाला वाली । गंगाधरराव को नाटक खेलने और खिलवाने का बहुत शौक था । स्त्रियो का अभिनय स्त्रिया ही करती थी । इनमें मोतीबाई भी थी । मोतीबाई का पता लगाते लगाते जूही, दुर्गा और मुगलखा भी निगाह में आये । इन सबके सम्बन्ध की घटनाओ का सार सच्चा है । सन् १६३२ से मै इन अनुसन्धानो मे लगा । एक दिन रानी लक्ष्मीबाई के भतीजे मुझको झांसी में घर पर ही मिले। वे रानी के ऊपर हिन्दी मे कुछ लिखना चाहते थे । रानी क्यो लड़ी, इस समस्या पर हम दोनो एक मत थे । फिर एक दिन डाक्टर सावरकर के एक सेक्रेटरी मुझको झांसी में ही मिले । वे मराठी में ‘सत्तावनी’ लिख रहे थे । रानी के सम्बन्ध की जो सामग्री उनके ग्रन्थ के लिए आवश्यक थी, मैंने दी । मै सोचता था कि रानी के विषय में बहुत लोगो ने कुछ न कुछ लिखा है और लिख रहे हैं, मै क्यो कुछ और प्रयत्न करू ? कुछ दिनो बाद मेरी यह धारणा बदल गई । कलक्टरी में कुछ सामग्री मिली । १८५८ मे लोगो के बयान लिये गये थे । इनको मैंने पढा । इनको पढकर मै अपने विश्वास में और दृढ हुआ—रानी ‘स्वराज्य’ के लिये लडी थी । मेरा वह स्वप्न जिसकी भूमिका होकी ग्राउण्ड पर थी, फिर ताजा हुआ । मैंने निश्चय किया कि उपन्यास लिखूगा, ऐसा जो इतिहास के रग-रेशे से सम्मत हो और उसके सदंर्भ में हो । इतिहास के ककाल में मास और रक्त का सचार करने के लिये मुझको उपन्यास ही अच्छा साधन प्रतीत हुआ । उस साधन को मैने जो कुछ रूप दे पाया है वह पाठको के सामने है । यदि आनन्दराव ने रानी के लिये गोली खाई और मेरी कलम ने थोडी सी स्याही—तो इस अन्तर को पाठक अवश्य ध्यान में रखने की कृपा करे । वृन्दावनलाल वर्मा