भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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[ ४ ] स्वामिनी निकली मोतीबाई नाटकशाला वाली । गंगाधरराव को नाटक खेलने और खिलवाने का बहुत शौक था । स्त्रियो का अभिनय स्त्रिया ही करती थी । इनमें मोतीबाई भी थी । मोतीबाई का पता लगाते लगाते जूही, दुर्गा और मुगलखा भी निगाह में आये । इन सबके सम्बन्ध की घटनाओ का सार सच्चा है । सन् १६३२ से मै इन अनुसन्धानो मे लगा । एक दिन रानी लक्ष्मीबाई के भतीजे मुझको झांसी में घर पर ही मिले। वे रानी के ऊपर हिन्दी मे कुछ लिखना चाहते थे । रानी क्यो लड़ी, इस समस्या पर हम दोनो एक मत थे । फिर एक दिन डाक्टर सावरकर के एक सेक्रेटरी मुझको झांसी में ही मिले । वे मराठी में ‘सत्तावनी’ लिख रहे थे । रानी के सम्बन्ध की जो सामग्री उनके ग्रन्थ के लिए आवश्यक थी, मैंने दी । मै सोचता था कि रानी के विषय में बहुत लोगो ने कुछ न कुछ लिखा है और लिख रहे हैं, मै क्यो कुछ और प्रयत्न करू ? कुछ दिनो बाद मेरी यह धारणा बदल गई । कलक्टरी में कुछ सामग्री मिली । १८५८ मे लोगो के बयान लिये गये थे । इनको मैंने पढा । इनको पढकर मै अपने विश्वास में और दृढ हुआ—रानी ‘स्वराज्य’ के लिये लडी थी । मेरा वह स्वप्न जिसकी भूमिका होकी ग्राउण्ड पर थी, फिर ताजा हुआ । मैंने निश्चय किया कि उपन्यास लिखूगा, ऐसा जो इतिहास के रग-रेशे से सम्मत हो और उसके सदंर्भ में हो । इतिहास के ककाल में मास और रक्त का सचार करने के लिये मुझको उपन्यास ही अच्छा साधन प्रतीत हुआ । उस साधन को मैने जो कुछ रूप दे पाया है वह पाठको के सामने है । यदि आनन्दराव ने रानी के लिये गोली खाई और मेरी कलम ने थोडी सी स्याही—तो इस अन्तर को पाठक अवश्य ध्यान में रखने की कृपा करे । वृन्दावनलाल वर्मा