रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
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दशमाध्याय-में विविध मूषा तथा विविधपुट तथा अम्लवर्ग, विष-वर्ग, दुग्धवर्ग, रक्तादिवर्ग, शोधनीयगणादिकों का वर्णन है ।
एकादशाध्याय—में मानपरिभाषा, पारद के अष्टादश संस्कार तथा २५ प्रकार के बन्धनों का विस्तृत वर्णन है ।
बारहवें से पच्चीसवें अध्याय-में शरीर में होने वाले समस्तरोगों (जैसे ज्वर, रक्तपित्त, कास, श्वास, हिक्का, वैस्वर्य, क्षय, अरुचि, प्रसेक, छर्दि, हृद्रोग, तृष्णा, मदात्यय, अर्श, उदावर्त, अतिसार, ग्रहणी, प्रवाहिका, विसूची, अग्निमान्द्य, मूत्रकृच्छ्र, अश्मरी, प्रमेह, सोमरोग, पिडिका, विद्रधि, वृद्धि, गुल्म, शूल, उदररोग, पाण्डु, शोफ, विसर्प, कुष्ठ, श्वित्र, वातव्याधि, वातरक्त, वन्ध्यारोग, गर्भिणीविकार, सूतिकारोग, बालरोग, उन्माद, अपस्मार, नेत्ररोग, कर्णरोग, नासिकारोग, मुखरोग, शिरोरोग, व्रण, अस्थिभग्न, भगन्दर, गलगण्ड, गण्डमाला, क्षुद्ररोग, उष्णवात ( औपसर्गिक मेह ) उपदंश आदि गुह्यरोग, विषजन्य रोग के लक्षण, भेद, निदान तथा चिकित्सा का विस्तृत वर्णन है।
छब्बीसवें अध्याय-में जरारोग की निदानचिकित्सा, मासिकरसायन, षाण्मासिकरसायन, पाक्षिकरसायन, अष्टमासिक रसायन, त्रिवार्षिक-रसायन, सहस्रवर्षायुष्करसायन, त्रिफलारसायन और कान्ताभ्रक रसायनादि का वर्णन है ।
सत्ताइसवें अध्याय-में वाजीकरण के लिये अनेक प्रकार के दिव्य रसों का वर्णन तथा स्तम्भनशक्तिवर्द्धक उपाय हैं ।
अट्ठाइसवें अध्याय-में लोह अर्थात् स्वर्ण, रजत ताम्रादिकों के अनेक कल्पों का वर्णन है ।
उन्तीसवें अध्याय-में विषों की उत्पत्ति, विषों के भेद, गुणदोष तथा अनेक रोगों पर विषके कल्पों का वर्णन है ।
तीसवें अध्याय-में रसमारण, रसजारण तथा रस ( पारद ) के अनेक रोगों को नष्ट करने के लिये अनेक कल्पों का वर्णन, ग्रन्थोप-संहार, आचार रसायन, आयुर्वेदोपदेश का पालन, कुवैद्यवर्जन, शास्त्रज्ञ वैद्य का साफल्य, चिकित्सा की सर्वत्र सफलता, वैद्य और रोगी