रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें[ ७ ]
से परिपूर्ण होने के कारण यह एक पूर्ण रस ग्रन्थ बन गया है तथा इसटीका के समान पूर्व में कोई ऐसी टीका नहीं थी और न बनेगी कारण यह है कि ग्रन्थारम्भसे लेकर ग्रन्थ समाप्ति तक मूलका अर्थ स्पष्टतया लिख कर नीचे विमर्श के अन्दर खनिजों का वैज्ञानिक पूर्ण वर्णन तथा रोगों का डाक्टरी के मत से भेद निदानादिक का जहां तहां वर्णन कर दिया गया है। अत एव मुझे पूर्ण विश्वास है कि ऐसी टीका “न भूता न भविष्यति” हां हो सकता है कि इसी का अनुकरण कर के कुछ इधर उधर परिवर्तन कर के अन्य टीका प्रकाशित हो किन्तु वह भी निम्न पद्यानुकूल होगी।
“उत्पत्स्यते हि मम कोऽपि समानधर्मा कालो ह्ययं निरवधिर्विपुला च पृथ्वी”
अस्तु जो कुछ है संसार के पूज्य विद्वानों की सेवा में उपस्थित है।
हंसः श्वेतो बकः श्वेतः को भेदो बकहंसयोः।
नीरक्षीरविभागे तु हंसो हंसो बको बकः॥
विशेषतायें—
[ १ ]
प्रथमाध्याय में सर्व प्रथम लिखे हुए पारद के विषयका विमर्श ३८ पृष्ठों में वर्णित है। पारद का स्वरूप, सङ्केत (Symbol), परमाणुभार (Atomic weight), आपेक्षिकघनत्व (Relative Density), हिमाङ्क (Freezing Point), कथनाङ्क (Boiling Paint) आदि का परिभाषा के सहित वर्णन है तथा उसके पश्चात् पारद की उपस्थिति, पारद की सर्वप्रथम प्राप्ति, पारद निकालने योग्य खनिज, पारद की परीक्षा (Test), पारदीय खनिज प्राप्ति के स्थान, पारद के दोषों का समन्वय, पारद के भेद, शुद्धाशुद्धपारद के लक्षण आदि पारदसम्बन्धि अनेक बातों पर प्राच्य-पाश्चात्य मत से अच्छा वर्णन किया गया है जिस से हमारे वैद्य बन्धुओं को पारद के ज्ञान की विशेष करके नव्य ज्ञान की पूर्ण प्राप्ति हो जाय।
[ २ ]
द्वितीयाध्याय में लिखित अभ्रकादिक अष्ट महारसों के विमर्श में प्रत्येक महारस की उत्पत्ति, भेद, प्राप्तिस्थान, गुणदोष आदि का आधुनिक मत से वर्णन है।