भारतकोश
संग्रह पर लौटें

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा

स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)

DevanagariHindipublished362 पृष्ठ

[ ७ ]

से परिपूर्ण होने के कारण यह एक पूर्ण रस ग्रन्थ बन गया है तथा इसटीका के समान पूर्व में कोई ऐसी टीका नहीं थी और न बनेगी कारण यह है कि ग्रन्थारम्भसे लेकर ग्रन्थ समाप्ति तक मूलका अर्थ स्पष्टतया लिख कर नीचे विमर्श के अन्दर खनिजों का वैज्ञानिक पूर्ण वर्णन तथा रोगों का डाक्टरी के मत से भेद निदानादिक का जहां तहां वर्णन कर दिया गया है। अत एव मुझे पूर्ण विश्वास है कि ऐसी टीका “न भूता न भविष्यति” हां हो सकता है कि इसी का अनुकरण कर के कुछ इधर उधर परिवर्तन कर के अन्य टीका प्रकाशित हो किन्तु वह भी निम्न पद्यानुकूल होगी।
“उत्पत्स्यते हि मम कोऽपि समानधर्मा कालो ह्ययं निरवधिर्विपुला च पृथ्वी”
अस्तु जो कुछ है संसार के पूज्य विद्वानों की सेवा में उपस्थित है।
हंसः श्वेतो बकः श्वेतः को भेदो बकहंसयोः।
नीरक्षीरविभागे तु हंसो हंसो बको बकः॥

विशेषतायें—

[ १ ]
प्रथमाध्याय में सर्व प्रथम लिखे हुए पारद के विषयका विमर्श ३८ पृष्ठों में वर्णित है। पारद का स्वरूप, सङ्केत (Symbol), परमाणुभार (Atomic weight), आपेक्षिकघनत्व (Relative Density), हिमाङ्क (Freezing Point), कथनाङ्क (Boiling Paint) आदि का परिभाषा के सहित वर्णन है तथा उसके पश्चात् पारद की उपस्थिति, पारद की सर्वप्रथम प्राप्ति, पारद निकालने योग्य खनिज, पारद की परीक्षा (Test), पारदीय खनिज प्राप्ति के स्थान, पारद के दोषों का समन्वय, पारद के भेद, शुद्धाशुद्धपारद के लक्षण आदि पारदसम्बन्धि अनेक बातों पर प्राच्य-पाश्चात्य मत से अच्छा वर्णन किया गया है जिस से हमारे वैद्य बन्धुओं को पारद के ज्ञान की विशेष करके नव्य ज्ञान की पूर्ण प्राप्ति हो जाय।

[ २ ]
द्वितीयाध्याय में लिखित अभ्रकादिक अष्ट महारसों के विमर्श में प्रत्येक महारस की उत्पत्ति, भेद, प्राप्तिस्थान, गुणदोष आदि का आधुनिक मत से वर्णन है।

[ ८ ]

[ ३ ]
तृतीयाध्याय में लिखित गन्धकादिक अष्ट उपरसों की उपलब्धि, भेद, प्राप्तिस्थान आदि विषयों का वर्णन किया गया है ।

[ ४ ]
एकादशाध्याय में पारद के संस्कारों की सब विधियां टिप्पणी के रूप में प्रत्येक स्थान पर लिखी गई हैं ।

[ ५ ]
प्रत्येक ज्वर के लक्षण, प्रत्येक ज्वर का पथ्य तथा अपथ्य का विशेष उल्लेख किया गया है । साथ २ रसनिर्माण में जो २ पारिभाषिक शब्द आये हैं उन की टिप्पणी में परिभाषा लिख दी हैं ।

[ ६ ]
इसी तरह रक्त पित्त, कास, श्वास, हिक्का, स्वरभङ्ग, राज्यक्ष्मा, छर्दि, हृद्रोग, मदात्यय, अर्श, उदावर्त, अतीसार, ग्रहणी, मूत्रकृच्छ्र, प्रमेह, वृद्धि, गुल्म, उदररोग, पाण्डु, शोथ, विसर्प, कुष्ठ, वातव्याधि, वातरक्त, भगन्दर, नेत्र रोग आदि समस्त रोगों के विषय में विमर्श लिख दिया है जिस में सब रोगों का पथ्यापथ्य तथा जहां तहां डाक्टरी मत से रोग भेद आदि का वर्णन भी किया गया है ।

[ ७ ]
सर्व प्रकार के विषों का भेद, उन के शोधन की विधि तथा प्रयोगों का वर्णन किया गया है ।

[ ८ ]
सर्व प्रकार के क्षुद्र रोगों का पृथक् २ लक्षण, पृथक् २ चिकित्सा तथा पथ्यापथ्य का अन्य रसग्रन्थों की सहायता से पूर्ण वर्णन कर दिया है ।

[ ९ ]
कहीं २ पर अनेक रोग तथा उन की चिकित्सा का प्रक्षिप्त रूप से आवश्यक होने के कारण वर्णन कर दिया गया है ।

[ १० ]
रसायन और वाजीकरण का लक्षण, कुटीनिर्माणविधि, चरकोक्ताचार, रसायन आदि अनेक उपयुक्त विषयों का चरक सुश्रुतादि ग्रन्थों के आधार पर वर्णन किया गया है ।

[ ६ ]

इस तरह मैने टीका की विशेषता को संक्षेप में दिखलाई है। विमर्शा-नुक्रमणिका के अवलोकन करने से विज्ञ महानुभावों को विदित हो जायगा कि यह टीका कहां तक उपयुक्त है।

इस टीका के लिखने में चरक, सुश्रुत, वाग्भट, रसेन्द्रसारसङ्ग्रह, भैषज्यरत्नावली, रसतरङ्गिणी, खनिजविज्ञान, प्रारम्भिक रसायन आदि अनेक ग्रन्थों की सहायता प्राप्त हुई है अतः उन ग्रन्थकर्त्ताओं के प्रति परम श्रद्धा प्रकट करता हूं तथा उनके ऋण से कभी भी निर्मुक्त नहीं हो सकता। सर्वप्रथम श्रीमान् विप्रकुलावतंस, हिन्दूविश्वविद्यालय के प्राण, देशोद्धारक, भगवद्भक्त, कुलपति महोदय श्रीमनामना मदनमोहन मालवीय जी के प्रति असीम श्रद्धा प्रगट करता हूं क्यों कि आप ही की साधना से यह प्राच्यनव्यायुर्वेदीय विद्यालय स्थापित हुआ और इसी में मैंने जन्तुशास्त्र, वनस्पतिशास्त्र, भौतिकशास्त्र, रसायनशास्त्र तथा आयुर्वेद और डाक्टरो का उच्चज्ञान प्राप्त करके इस प्रकार की वैज्ञानिक टीका के लिखने में प्रवृत्ति प्रदर्शित की। इस टीका के लिखने में विशेष कर अनेक जटिल स्थलों पर पूज्यपाद गुरुवर्य, चिकित्सकचूडामणि, आयुर्वेद विद्यालय (हिन्दू यूनिवरसीटी) के प्रधानाध्यक्ष श्रीमान् पं० सत्यनारायण जी शास्त्री ने चिकित्सा के सिद्धान्तों में तथा खनिजविषयों पर श्रीमान् कविराज प्रतापसिंह जी (रसशास्त्राध्यापक आयुर्वेद फार्मेसी सुपरिन्टेण्डेण्ट) ने अत्यन्त सहायता प्रदान की है अतः उक्त दोनों महानुभावों के प्रति मैं परम श्रद्धा प्रगट करता हूं। साथ ही साथ आयुर्वेद कालेज के पाश्चात्य चिकित्साशास्त्र के अध्यापक तथा अनेक ग्रन्थों के लेखक आयुर्वेदाचार्य डा० भास्कर गोविन्द घाणेकर जी के प्रति परमश्रद्धा प्रगट करता हूं क्यों कि आप ही ने सर्व प्रथम अपनी सुकृतियों के द्वारा हम लोगों की इस नवीनप्रकार की टीका लेखन पद्धति में रुचि उत्पन्न की तथा एक मार्ग सा बना दिया। इनके अतिरिक्त डा० मुकुन्द स्वरूप जी वर्मा (सरसुन्दरलाल हास्पिटल सुपरिन्टेण्डेण्ट तथा वायस-प्रिंसिपल आयुर्वेदकालेज तथा सर्जरी के प्रोफेसर) तथा पं० जगन्नाथजी शर्मा वाजपेयी एम० ए० (प्रोफेसर आयुर्वेद कालेज) तथा अन्य समस्त-

[ १० ]

गुरुओं के प्रति भी परम श्रद्धा प्रकट करता हूं, क्यों कि आप लोगों के सदुपदेश तथा प्रोत्साहन का ही फल है कि मैं इस टीका के लिखने में सफल हुआ।

आयुर्वेद प्रेमी तथा छात्रों के हितचिन्तक और सरस्वतीसेवापरायण परम वैष्णवभक्त चौखम्बा पुस्तकालय के अध्यक्ष श्रीमान् जयकृष्णदास जी को मैं अनेक धन्यवाद देता हूं, क्यों कि आपने अपने उदारभावसे तथा सरस्वती की सेवा और आयुर्वेद की उन्नति तथा छात्रों के हित आदि अनेक विषयों का विचार रखकर आयुर्वेद ग्रन्थों के प्रकाशन की सदिच्छा प्रगट की तथा अब दिनों दिन प्रत्यक्ष रूप में प्रगट भी हो रही है, इस ग्रन्थ के प्रकाशन में तन, मन, धन सब कुछ व्यय करके इस कार्य को पूर्ण किया। अन्त में मैं इस ग्रन्थ के प्रारम्भिक प्रूफ संशोधन में पं० रामचन्द्र पराशीकरजी ने अपना समय दिया अतः उन्हें धन्यवाद देता हूं।

ग्रन्थ की छपाई का कार्य बहुत ही शीघ्रता से हुआ है इसलिये अनेक स्थानों पर अत्यन्त ध्यान देने पर भी सम्भव है अशुद्धियां रह गई हों तो पाठक क्षमा करें, आगामी संस्करण में सब ठीक कर दी जायगीं। इस टीका से यदि वैद्यक शास्त्र तथा वैद्यसमुदाय का स्वल्प भी उपकार हुआ तो मैं अपने श्रम को सफल समझूंगा।

गच्छतः स्खलनं क्वापि भवत्येव प्रमादतः।
हसन्ति दुर्जनास्तत्र समादधति सज्जनाः ॥
सारं ततो ग्राह्यमपास्य फल्गु
हंसो यथा क्षीरमिवाम्बुमध्यात्।
इति।

संवत् १९९६<br>ज्येष्ठ शुक्ल<br>पूर्णिमानिवेदयति-विद्वदनुचरः<br>अम्बिकादत्तशास्त्री<br>आयुर्वेदाचार्य ( A. M. S. )<br>हिन्दू विश्वविद्यालय<br>आयुर्वेदकालेज, काशी

समर्पणम्

श्रीमन्महीमहेन्द्रमहाराजाधिराजमहाराणेति
विरुदालङ्कृतानां हिन्दूकुलपतीनां
के० सी० एस० आई० जी० सी० आई० इत्युपाधिविभूषितानां
६ श्रीमेदपाटेश्वराणां
"श्रीभूपालसिंहवर्म" महोदयानां
करकमलयोः
द्वितीयमिदं कृतिपुष्पं सप्रणयोल्लसन्मानसा समर्प्यते


श्रीएकलिङ्गेश्वरपादपद्म
सम्पूजयन् धर्मपुरःसरेण ।
सम्पालयन् स्वाः प्रकृतीरिदानीं
श्रीमेदपाटाऽवनिपालकोऽसौ ॥ १ ॥

"भूपालवर्मा" वसुधाधिपेन्द्र
आस्ते तदीये च करारविन्दे ।
रत्नोज्ज्वलाख्यां रसरत्नटीकां
समर्पयेऽहं मुदितात्मना वै ॥ २ ॥

श्रीमतां शुभचिन्तकः
अम्बिकादत्त शास्त्री "आयुर्वेदाचार्यः"

इस पृष्ठ पर कोई पठनीय पाठ (Text) उपलब्ध नहीं है (पृष्ठ रिक्त / धुंधला है)।

रसरत्नसमुच्चयस्य मूलविषयानुक्रमणिका—


विषयाःपृष्ठाङ्काःविषयाःपृष्ठाङ्काः
प्रथमोऽध्यायः ।अभ्रभेदाः६०
मङ्गलाचरणम्पिनाकादीनां लक्षणानि"
टीकाकारकृतमङ्गलाचरणं व्याख्या-प्रयोजनञ्च"वर्णभेदेनाभ्रकस्य भेदास्तेषां क्रियाविषयश्च"
ग्रन्थकर्तॄणां नामानिग्रासयोग्याभ्रम्६१
हिमालयवर्णनम्निश्चन्द्रसचन्द्राभ्रयोर्गुणदोषौ"
महादेवस्थितिवर्णनम्अशुद्धाभ्रस्य दोषाः"
रसोत्कर्षवर्णनम्अभ्रशोधनमारणे६२
पारदस्य विशेषतो महत्ताधान्याभ्रकम्६३
मूर्च्छितादिपारदगुणाःधान्याभ्रमारणम्"
पारदे सर्वौषधाना मन्तर्भावःअभ्रमारणम्"
रसस्य जीवन्मुक्तिकारणता१०मतान्तर"
रसोत्पत्तिवर्णनम्१३अभ्रकसत्त्वपातनम्६४
रसानां भेदाः१४प्रकारान्तर"
रसादीनां निरुक्तिः१६किट्टात्सत्त्वग्रहणम्६५
रससंस्कारकारणम्१७सत्त्वशोधनम्"
रसस्य स्थानान्तरगतिवर्णनम्१८सत्त्वानां मृदुकरणम्"
हिङ्गुलोत्पत्तिवर्णनम्१९अभ्रमारणम्६६
द्वितीयोऽध्यायः ।मारणे प्रकारान्तरम्६७
महारसाः५८सत्त्वस्यशोधनमारणे"
गन्धाभ्रयोः स्वरूपम्"अभ्रप्रयोगः६८
अभ्रकगुणाः"वैक्रान्तः"
वैक्रान्तस्य वर्णभेदाः"

२ र० स०

[ २ ]

विषयाःपृष्ठाङ्काःविषयाःपृष्ठाङ्कः
वैक्रान्तस्य गुणाः६९विमलस्य मारणम्७८
वैक्रान्तोत्पत्तिः,,विमलस्य सत्त्वपातनविधिः,,
वैक्रान्तस्य स्थानं निरुक्तिश्च७०मतान्तरेण सत्त्वपातनम्७९
मतान्तरेण वर्णभेदकथनम्,,विमलस्य प्रयोगविधिर्गुणाश्च,,
वर्णभेदेन कार्यभेदकथनम्,,अथ शिलाजंतु८०
आहरणविधिः७१शिलाजतुभेदाः,,
गुणान्तरम्,,शिलाजतुन उत्पत्तिः,,
शोधनम्,,शुद्धशिलाजतुलक्षणम्८१
मतान्तरे शोधनमारणे७०गुणाः८२
मतान्तरम्७१शोधनम्८३
सत्त्वपातनम्७२शिलाजतुमारणम्,,
मतान्तरम्,,प्रयोगविधिः,,
मृतवैक्रान्तस्य प्रयोगविधिर्गुणाश्च,,सत्त्वपातनम्,,
प्रयोगान्तरम्७३कर्पूरशिलाजतुनो लक्षणादिकम्८४
अथ माक्षिकम्,,सस्यकः,,
माक्षिकोत्पत्तिवर्णनम्,,सस्यकोत्पत्तिवर्णनम्,,
माक्षिकस्य गुणाः,,प्रशस्तसस्यकलक्षणम्,,
माक्षिकभेदाः७४गुणाः८५
माक्षिकगुणाः७५शोधनम्,,
सुवर्णमाक्षिकशोधनमारणे,,मतान्तरम्,,
सत्त्वपातनम्,,तुत्थखर्परमारणम्,,
विशुद्धताम्यसत्त्वलक्षणम्७६तुत्थसत्त्वपातनम्,,
सुवर्णमाक्षिकरसायनम्,,मतान्तरम्८६
सुवर्णमाक्षिकरसायनम्७७प्रयोगविधिः,,
विमलभेदाः,,भालुकितन्त्रोक्तप्रयोग विधिः,,
विमलस्य लक्षणगुणाः७८अथ चपलः,,
विमलभेदानां प्रयोगनिर्देशः,,गुणाः८८
विमलशोधनम्,,शोधनम्८९

[ ३ ]

विषयाःपृष्ठाङ्काःविषयाःपृष्ठाङ्काः
सत्त्वपातनम्८९कुष्ठे गन्धकप्रयोगः१००
रसकःकण्डूहर प्रयोगः
सस्यकस्य प्रयोगविषयो गुणाश्च९०गन्धकतैलम्१०१
शोधनम्गन्धकगुणाः
मतान्तरम्गैरिकम्११०
रसकस्य ताम्रादिरञ्जनविधिः९१गैरिकभेदाः
खर्परस्य भस्म तथा सत्त्वपातनविधिश्चपाषाणस्वर्णगैरिकयोर्लक्षणम्
मतान्तरम्९२गैरिकशोधनम्१११
मतान्तरम्कासीसरसायनम्
मतान्तरम्कासीसभेदाः
सत्त्वमारणम्९३बालुकासीसगुणाः११२
प्रयोगविधिःपुष्पकासीसगुणाः
तृतीयोऽध्यायः ।कासीस शोधनम्
उपरसानां नामानिसत्त्वग्रहणनिर्देशः
गन्धकोत्पत्तिःशोधनान्तरम्११३
गन्धकभेदाः९५कासीसप्रयोगः
गन्धकगुणाः९६तुवरीनिरूपणम्
बलिवसाख्यगन्धकोत्पत्तिःतुवरीपरिचयः
गन्धकशुद्धिः९७तुवरीभेदाः११४
मतान्तरम्तुवरीलक्षणगुणाः
मतान्तरम्९८तुवरीशोधनम्
प्रयोगःतुवरीसत्त्वपातनविधिः
गन्धकद्रुतिःतालकसन्निरूपणम्११५
प्रयोगविधिः९९तालकभेदाः
अन्यविधप्रयोगविधिःपत्रतालकलक्षणम्
गन्धकसेवने वर्ज्यानिपिण्डतालकलक्षणम्
गुणाः

[ ४ ]

विषयाःपृष्ठाङ्काःविषयाःपृष्ठाङ्काः
हरतालशुद्धिः११६स्रोतोऽञ्जनसत्त्वपातनविधिः१२४
अशुद्धतालसेवनदोषाः,,कङ्कुष्ठनिरूपणम्,,
मतान्तरेण तालशोधनम्,,कङ्कुष्ठोत्पत्तिवर्णनम्,,
मतान्तरेण शोधनमारणनिरूपणम्,,द्विविधकङ्कुष्ठलक्षणम्,,
सत्त्वपातनम्११७कङ्कुष्ठोत्पत्तौ मतान्तराणि,,
मतान्तरम्,,गुणाः१२५
मनःशिलानिरूपणम्११९रसोपरसानां सामान्यशोधनं सत्त्वपातनविधिश्च,,
मनःशिलाया भेदाः,,कङ्कुष्ठशोधनम्,,
त्रिविधमनःशिलालक्षणानि,,रेचकयोगः,,
गुणाः,,ताम्बूलानुपानवर्जनम्१२६
अशुद्धशुद्धदोषगुणाः,,विषनाशार्थं कङ्कुष्ठप्रयोगविधिः,,
शोधनम्१२०साधारणरसपरिगणनम्,,
मतान्तरम्,,कम्पिल्लः,,
सत्त्वपातनम्,,गुणाः१२७
मतान्तरम्,,गौरीपाषाणः,,
अञ्जनानां संनिरूपणम्,,शोधनम्१२८
अञ्जनभेदाः,,सत्त्वग्रहणम्१२९
सौवीराञ्जनगुणाः१२२गुणाः,,
रसाञ्जनगुणाः,,नवसारनिरूपणम्,,
स्रोतोऽञ्जनगुणाः,,नवसारोत्पत्तिः,,
लेखनस्वरूपम्,,मतान्तरेणोत्पत्तिः१३०
पुष्पाञ्जनगुणाः१२३गुणाः,,
नीलाञ्जनगुणाः,,वराटिकावर्णनम्,,
शोधनम्,,वराटिकालक्षणम्,,
अञ्जनसत्त्वाहरणम्,,उत्तमादि वराटिका,,
स्रोतोऽञ्जनलक्षणम्,,गुणाः,,
अञ्जनरसबन्धनम्,,
रसाञ्जनस्य विशेषशोधनम्,,

[ ५ ]

विषयाःपृष्ठाङ्काःविषयाःपृष्ठाङ्काः
शोधनम्१३१माणिक्यम्१३६
अग्निजारनिरूपणम्,,द्विविधमाणिक्यनिर्देशः,,
अग्निजारपरिचयः,,श्रेष्ठमाणिक्यलक्षणम्,,
गुणाः,,श्रेष्ठनीलमाणिक्यलक्षणम्,,
तस्य स्वभावतः शुद्धत्वनिर्देशः,,निकृष्टमाणिक्यलक्षणम्१३७
गिरिसिन्दूरनिरूपणम्१३२माणिक्यगुणाः,,
गिरिसिन्दूरगुणाः,,मौक्तिकनिरूपणम्,,
हिङ्गुलनिरूपणम्,,प्रशस्तमौक्तिकलक्षणम्,,
हिङ्गुलभेदाः,,मौक्तिकशुक्त्योर्गुणाः,,
शुकतुण्डकस्य परिचयः,,हेममौक्तिकम्१३८
हंसपादलक्षणम्,,मौक्तिकगुणान्तरम्,,
हिङ्गुलगुणाः,,प्रवालनिरूपणम्,,
शोधनम्१३३ग्राह्यप्रवालस्वरूपः,,
हिङ्गुलसत्त्वाकर्षणविधिः,,हेयप्रवालस्वरूपम्,,
मृद्दारशृङ्गम्,,प्रवालगुणाः१३९
परिचयः,,तार्क्ष्यम्,,
गुणाः,,प्रशस्ततार्क्ष्यलक्षणम्,,
साधारणशोधननिर्देशः१३४अप्रशस्ततार्क्ष्यलक्षणम्,,
सत्त्वानां सामान्यशोधनम्,,तार्क्ष्यगुणाः,,
चतुर्थोऽध्यायः ।पुष्परागः,,
रत्ननिरूपणम्१३५श्रेष्ठपुष्परागलक्षणम्,,
मणयः,,हेयपुष्परागलक्षणम्१४०
मणीनां नामानि,,पुष्परागगुणाः,,
श्रेष्ठमणीनां नामानि,,वज्रम्,,
ग्रहप्रसादकरत्नानि,,वज्रभेदाः,,
ग्रहानुसारेण रत्नपरिगणनम्१३६पुंवज्रलक्षणम्,,
रत्नप्रयोगविषयः,,स्त्रीनपुंसकवज्रयोर्लक्षणानि,,

[ ६ ]

विषयाःपृष्ठाङ्काःविषयाःपृष्ठाङ्काः
जातिभेदेनाधिकारीभेदकथनम्१४१रत्नभस्मक्रमः१४८
वर्णभेदेनाधिकारीभेदकथनम्,,रत्नानां द्रावणम्,,
वज्रगुणाः,,मुक्ताद्रावणे विशेषक्रमः,,
रत्नदोषाः१४२वज्रद्रावणविशेषविधिः१५०
वज्रशोधनम्,,वैक्रान्तद्रावणे विशेषक्रमः,,
वज्रमारणम्,,अन्यविधिः,,
मतान्तरेण मारणम्,,अन्यविधिः,,
मतान्तरेण मारणम्१४३राजावर्त्तः१५१
मतान्तरेण मारणम्१४४उत्तममध्यमराजावर्त्तलक्षणम्,,
प्रयोगविशेषेण गुणविशेषकथनम्,,गुणाः,,
वज्ररसायनम्,,राजावर्त्तादिसामान्यशोधनम्,,
नीलनिरूपणम्१४५राजावर्त्तशोधनम्,,
नीलभेदाः,,राजावर्त्तमारणम्,,
जलशक्रनीलयोः स्वरूपम्,,सत्त्वपातनम्१५२
गुणाः,,द्रुतीनां दीर्घकालरक्षणोपायः,,
गोमेदः१४६रत्नधारणगुणाः,,
गोमेदर्निरुक्तिः,,गैरिकम्,,
प्रशस्तगोमेद लक्षणम्,,गैरिकस्य शोधनं सत्त्वपातनञ्च,,
हेयगोमेदलक्षणम्,,पञ्चमोऽध्यायः ।
गुणाः,,लोहानि१५३
रत्नमारणनिषेधः,,लोहजातिपरिगणनम्,,
रत्नप्रयोगः१४७स्वर्णम्१५४
रत्नानां साधारणशोधनम्,,स्वर्णभेदाः,,
वैदूर्यम्,,प्राकृतस्वर्णस्योत्पत्तिः,,
श्रेष्ठवैदूर्यलक्षणम्,,सहजस्वर्णोत्पत्तिः,,
हेयवैदूर्यलक्षणम्,,वह्निजस्वर्णोत्पत्तिः,,
गुणाः,,स्वर्णत्रयगुणाः१५५
रत्नशुद्धिः,,

[ ७ ]

विषयाःपृष्ठाङ्काःविषयाःपृष्ठाङ्काः
खनिजस्वर्णोत्पत्तिस्तल्लक्षणगुणाश्च१५५अन्यविधिः१६२
वेधजस्वर्णोत्पत्तिर्गुणाश्च,,रौप्यस्य निरुत्थीभस्मकरणम्,,
स्वर्णरौप्ययोः सामान्यगुणाः,,अन्यविधिः,,
स्वर्णगुणाः१५६स्वर्णरौप्ययोर्द्रावणम्,,
अशोधितामारितस्वर्णदोषाः,,रौप्यप्रयोगः१६३
स्वर्णशोधनम्,,ताम्रम्,,
लौहमारणार्थमुत्तमद्रव्यकथनम्,,ताम्रभेदाः,,
स्वर्णमारणम्१५७म्लेच्छताम्रस्य लक्षणम्,,
अन्यविधिः,,नेपालताम्रलक्षणम्,,
अन्यविधिः,,रसकर्मानर्हताम्रलक्षणम्१६४
स्वर्णद्रावणम्,,गुणाः,,
अन्यविधिः१५८ताम्रस्य दोषाः,,
स्वर्णभस्मप्रयोगविधिः,,ताम्रशुद्धिः१६५
अशुद्धामारितस्वर्णदोषाः,,मतान्तरम्,,
रजतम्१५९मतान्तरम्,,
रजतभेदाः,,मतान्तरम्,,
सहजरौप्योत्पत्तिर्गुणाश्च,,ताम्रभस्म,,
खनिजरौप्योत्पत्तिर्गुणाश्च,,अन्यविधिः१६६
कृत्रिमरौप्योत्पत्तिर्गुणाश्च,,मारणान्तरम्,,
उत्तमरौप्यलक्षणम्,,सोमनाथीताम्रभस्म,,
निकृष्टरौप्यलक्षणम्१६०ताम्रभस्मगुणाः१६७
रौप्यगुणाः,,ग्रन्थान्तरोक्त ताम्रप्रयोगः,,
गुणान्तरम्,,अथलौहम्१६८
स्वर्णादिशोधनम्,,लौहभेदाः,,
अशोधितमारितलोहस्य दोषाः१६१मुण्डलौहभेदाः,,
रौप्यस्य विशेषशोधनम्,,मृदुमुण्डलक्षणम्,,
अन्यविधिः,,कुण्ठमुण्डलक्षणम्,,
रौप्यमारणम्,,

[ ८ ]

विषयाःपृष्ठाङ्काःविषयाःपृष्ठाङ्काः
कडारमुण्डलक्षणम्१६९मारणार्थं लौहस्य परिमाणनिर्देशः१७४
मुण्डगुणाः,,लौहमारणे मन्त्रः,,
अशुद्धलौहस्य दोषाः,,लौहत्रयाणामुत्तरोत्तरगुणाधिक्यम्,,
तीक्ष्णलौहम्,,सर्वलौहशुद्धिः१७५
तीक्ष्णलौहभेदाः,,लौहस्थगिरिजदोषनाशनविधिः,,
खरलौहलक्षणम्,,मतान्तरम्,,
सारलौहलक्षणम्१७०मतान्तरेण शोधनं मारणञ्च१७६
हृन्नाललौहलक्षणम्,,मतान्तरेण मारणञ्च,,
सपर्यायपोगरलक्षणम्,,तीक्ष्णलौहस्य मारणम्,,
वाजीरलौहलक्षणम्,,कान्तलौहस्य गुणाः१७७
काललौहलक्षणम्,,लौहस्य मारणान्तरम्,,
खरलौहगुणाः१७१तीक्ष्णलौहस्य विशेषमारणम्१७८
अन्यसारादितीक्ष्णलौहगुणाः,,मतान्तरम्,,
कान्तलोहभेदाः,,मतान्तरे सर्वलौहानां मारणम्,,
वर्णानुसारकार्यभेदाः,,अन्यविधिः१७९
अधमादिकथनम्१७२अन्यविधिः,,
भ्रामककान्तलक्षणम्,,अन्यविधिः,,
चुम्बककर्षकलक्षणम्,,कान्तलोहस्य रामराजीप्रोक्तशोधनम्१८०
द्रावककान्तलक्षणम्,,अन्यविधिः१८१
रोमकान्तलक्षणम्,,लौहप्रयोगः,,
मुखभेदेन श्रेष्ठाश्रेष्ठकथनम्,,लौहानां रामराजीप्रोक्तगुणाः१८२
भ्रामकादिलौहकार्यनिर्देशः१७३श्रेष्ठकान्तलौहस्य लक्षणम्,,
रसक्रमेण कान्तस्य विशेषता,,लौहद्रुतिः,,
कान्तलौहस्य ग्राह्याग्राह्यनिर्देशः,,कान्तलौहस्य विशेषमारणम्१८३
कान्तलौहलक्षणम्१७४अथाष्टलौहानां द्रावणम्,,
कान्तलौहगुणाः,,मतान्तरम्,,
लौहकल्पश्रेष्ठता,,अशुद्धपक्वलौहदोषः,,

[ ९ ]

विषयाःपृष्ठाङ्काःविषयाःपृष्ठाङ्काः
उत्तरोत्तरमधिकगुणकरं लौहम्१८४नागरसायनम्१९२
मण्डूरम्,,पित्तलम्,,
मण्डूरशोधनम्,,पित्तलभेदः,,
मतान्तरम्,,रीतिकालक्षणम्,,
लौहमण्डूरयोर्गुणसाम्यता१८५काकतुण्डी लक्षणम्,,
वङ्गनिरूपणम्,,रीतिकाया गुणाः,,
वङ्गस्य द्वैविध्यनिर्देशः,,काकतुण्ड्या गुणाः१९३
खुरकवङ्गस्य मिश्रकवङ्गस्य च लक्षणम्,,शुभरीतिकालक्षणम्,,
वङ्गगुणाः,,अशुभरीतिलक्षणम्,,
खुरकवङ्गशोधनम्,,रीतिकाशोधनम्,,
मिश्रकवङ्गशोधनम्,,रीतिका मारणम्,,
नागवङ्गकांस्यताम्राणां सामान्यशोधनम्,,मतान्तरम्१९४
वङ्गभस्म,,पित्तलरसायनम्,,
मतान्तरम्,,पित्तलद्रुतिः,,
मतान्तरम्१८६कांस्यम्१९५
मतान्तरम्,,कांस्योत्पत्तिवर्णनम्,,
वङ्गरसायनम्,,प्रशस्तकांस्यलक्षणम्,,
नागः१८८त्याज्यकांस्यलक्षणम्,,
शुद्धसीसकलक्षणम्,,कांस्यगुणाः,,
सीसकगुणाः१८९कांस्यशोधनम्१९६
नागशुद्धिः,,कांस्यमारणम्,,
नागभस्म,,मतान्तरम्,,
मतान्तरम्१९०वर्तलौहम्,,
नागस्य निरुत्थभस्मीकरणम्,,वर्तलौहस्वरूपः,,
मतान्तरम्१९१वर्तलौहगुणाः,,
वर्तलौहशोधनम्१९७
वर्तलौहमारणम्,,

[ १० ]

विषयाःपृष्ठाङ्काःविषयाःपृष्ठाङ्काः
रसोपरसलोहानां सूतसाधकत्वनिर्देशः१९७ध्यानम्२०७
रत्नादीनां सूतयोग्यत्वनिर्देशःदेवीपूजनमन्त्रम्
भूनागसत्त्वपातनम्१९८कुम्भस्थापनादिशिष्यदीक्षादानविधिः२०८
मतान्तरम्१९९कालिनीलक्षणम्२०९
भूनागमुद्रिका२००कालिन्यभावे तदनुकल्पविधिः
तैलपातनविधिःहोमविधिः२१०
मतान्तरम्रससिद्ध्यर्थं सङ्ग्रहणीयपदार्थास्तत्पूजनादिकञ्च२११
मतान्तरम्२०१रसशक्तयः
मतान्तरम्उपरसाः
तैलपातनम्२०२महारसाः२१२
विष्णुसृष्टितैलपातनम्अष्टलौहपूजाक्रमः
जैपालतैलपातनम्उपकरणानां पूजाविधिः
वाकुचीतैलाहरणविधिःरससिद्धीश्वरब्राह्मणादीनां पूजनम्२१३
कृष्णमिश्रश्वेतगुञ्जाबीजतैलपातनविधिःअदीक्षितस्य रसविद्यासाधनवैफल्यनिर्देशः२१४
षष्ठोऽध्यायः ।रससाधने सिद्धिलाभहेतुनिर्देशः
शिष्योपनयननिरुपणम्२०३कस्मै किमर्थं रसविद्यादातव्या तन्निर्देशः२१५
क्रमयुक्तशास्त्रम्गुरुसन्तोषस्य सर्वसिद्धिहेतुत्वनिर्देशः,
शास्त्रक्रमयोः परस्परापेक्षारसविद्याया अवश्यगोप्यत्वनिर्देशः
रसविद्यागुरुःसप्तमोऽध्यायः ।
शिष्यगुणाः२०४रसशाला२१६
अनुचरगुणाःरससाधनीयपदार्थाः२१७
अयोग्यशिष्याःचालनीभेदलक्षणादिकम्२१८
रससाधनरसशालारस मण्डपाः२०५रससिद्ध्युपकरणानि
रसलिङ्गस्थापनादि२०६
रसलिङ्गपूजनफलम्

[ ११ ]

विषयाःपृष्ठाङ्काःविषयाःपृष्ठाङ्काः
उपलनामानि२१९कजली२२५
कूपीनिर्माणद्रव्याणि,,रसपङ्कः,,
कूपीपर्यायाः,,पिष्टी,,
चषकस्य पर्यायाः,,मतान्तरम्,,
शूर्पादीनां समर्चनम्,,पातनपिष्टी,,
रसविद्यायां कीदृशा वैद्या अन्ये वा नियोज्यास्तत्कथनम्२२०स्वर्णरौप्ययोः कृष्टिः२२६
रसपाककाले मन्त्रजपस्य कर्तव्यतानिर्देशः,,कृष्ट्या उपयोगः,,
परिचारकलक्षणम्,,स्वर्णकृष्ट्याः कार्यम्,,
पद्महस्तवैद्यलक्षणम्२२१वरलोहकम्,,
अमृतहस्तवैद्यलक्षणम्,,हेमरक्ती,,
दग्धहस्तवैद्यलक्षणम्,,हेमरक्तीप्रयोगः,,
निधिरक्षायोग्यपुरुषाः,,ताररक्ती२२७
बलिसाधने नियोज्यपुरुषलक्षणम्,,दलम्,,
रसायने नियोज्यपुरुषलक्षणम्२२२अन्यविधदलम्,,
स्वर्णादिधातुसिद्धिनियुक्तियोग्यपुरुषाः,,शुल्बनागम्,,
भेषजाहरणे नियोज्यपुरुषलक्षणम्,,शुल्बनागगुणाः२२८
केषां रससिद्धिर्भवतीत्याह,,पिञ्जरी,,
रससिद्धसाधकस्य कर्तव्यनिर्देशः,,चन्द्रार्कम्,,
रससिद्धमर्त्यफलम्२२३निर्वापणम्२२९
अष्टमोऽध्यायः ।निर्वापणद्रव्यमात्रा,,
परिभाषा२२४वारितरलौहलक्षणम्,,
धन्वन्तरिभागः,,मृतलौहलक्षणम्,,
रुद्रभागः,,अपुनर्भवलक्षणम्,,
विश्वासघातकवैद्यलक्षणम्,,उत्तमभस्मलक्षणम्२३०
निरुत्थलौहलक्षणम्,,
बीजलक्षणम्,,
ताडनस्वरूपम्,,
धान्याभ्रलक्षणम्,,

[ १२ ]

विषयाःपृष्ठाङ्काःविषयाःपृष्ठाङ्काः
सत्त्वलक्षणम्२३१उत्थापनादिलक्षणम्२३७
एककोलिसकलक्षणम्बन्धनलक्षणम्
द्रावणादिकर्मसाधनेकाष्ठनिर्देशःपातनलक्षणम्
हिङ्गुलाकृष्टो रसःरोधनलक्षणम्२३८
घोषाकृष्टताम्रलक्षणम्नियमनलक्षणम्
वरनागलक्षणम्२३२दीपनलक्षणम्२३९
उत्थापनलक्षणम्ग्रासमानम्
ढालनलक्षणम्जारणाभेदनिर्देशः
नागसम्भूतचपलःनिर्मुखजारणालक्षणम्२४०
वङ्गसम्भूतचपलः२३३बीजादिनिर्देशः
चपलकार्यम्मुखलक्षणम्
बद्धरसोपयोगःसम्मुखजारणालक्षणम्
धौतम्राक्षसवरसलक्षणम्
द्वन्द्दानम्२३४चारणालक्षणम्२४१
भञ्जनीगर्भद्रुतिलक्षणम्
चुल्लकाबाह्यद्रुतिलक्षणम्
पतङ्गीरागःद्रुतेर्भेदाः
आवापःद्रुतेः स्वरूपम्
अभिषेकः२३५जारणाभेदः
निर्वापलक्षणम्जारणालक्षणम्
प्रतिवापसमयनिर्देशःबिडादिलक्षणम्२४२
शुद्धावर्तःरञ्जनलक्षणम्
बीजावर्तःसारणालक्षणम्
स्वाङ्गशीतलम्वेधलक्षणं भेदाश्च
बहिःशीतलम्२३६लेपवेधलक्षणम्२४३
स्वेदनलक्षणम्क्षेपवेधलक्षणम्
मर्दनलक्षणम्कुन्तवेधलक्षणम्
मूर्च्छनलक्षणम्धूमवेधलक्षणम्

[ १३ ]

विषयाःपृष्ठाङ्काःविषयाःपृष्ठाङ्काः
शब्दवेधलक्षणम्२४४प्रकारान्तरम्२५४
उद्घाटनलक्षणम्,,नालिकायन्त्रम्,,
स्वेदनलक्षणम्,,भूधरयन्त्रम्,,
सन्न्यास लक्षणम्,,पुटयन्त्रम्,,
रसस्वेदसन्यासगुणाः२४५कोष्ठीयन्त्रम्२५५
परिभाषाऽऽवश्यकता,,वलभीयन्त्रम्,,
अध्यायपठनफलम्,,तिर्यक्पातनयन्त्रम्२५६
नवमोऽध्यायः ।पालिकायन्त्रम्,,
यन्त्राणि२४६घटयन्त्रम्,,
यन्त्रशब्द निरुक्तिः,,इष्टिकायन्त्रम्२५७
दोलायन्त्रम्,,हिङ्गुलाकृष्टिविद्याधरयन्त्रम्,,
स्वेदनीयन्त्रम्२४७डमरुयन्त्रम्२५८
पातनायन्त्रम्,,नालियन्त्रम्,,
अधःपातनयन्त्रम्२४८तोयमृल्लक्षणम्,,
कच्छपयन्त्रम्,,वह्निमृत्सा२५९
दीपिकायन्त्रम्,,शेषनाभियन्त्रवर्णनम्,,
ढेकीयन्त्रम्२४९ग्रस्तयन्त्रम्,,
जारणायन्त्रम्,,स्थालीयन्त्रम्२६०
जारणायन्त्रस्य–,,धूपयन्त्रम्,,
प्रकारान्तरम्२५०कन्दुकयन्त्रम्२६१
विद्याधरयन्त्रम्२५१प्रकारान्तरम्,,
सोमानलयन्त्रम्,,खल्लयन्त्रम्२६२
गर्भयन्त्रम्,,खल्लयन्त्रस्य त्रैविध्यनिर्देशः,,
हंसपाकयन्त्रम्२५२द्विविधखल्लयोः सामान्यलक्षणम्,,
बालुकायन्त्रम्२५३अर्धचन्द्राकृतिकखल्लनिर्देशः,,
बालुकायन्त्रस्य प्रकारान्तरम्,,वर्तुलखल्लनिर्देशः२६३
लवणयन्त्रम्,,तप्तखल्लप्रमाणनिर्देशः,,
तप्तखल्लविधिः,,

[ १४ ]

दशमोऽध्यायः ।

विषयाःपृष्ठाङ्काःविषयाःपृष्ठाङ्काः
मूषादिकथनम्२६४मूसलाख्यमूषा२७१
मूषायाः पर्यायाः,,कोष्ठिकानिर्देशः,,
मूषाया निरुक्तिः,,अङ्गारकोष्ठी२७२
मूषाया उपादानम्२६५पातालकोष्ठी२७३
मूषा शंसा,,गारकोष्ठी,,
सन्धिलेपस्य पर्यायाः,,वङ्कनालम्२७४
मूषोपयुक्तमृत्तिका,,मूषाकोष्ठी,,
मतान्तरम्२६६पुटस्य लक्षणम्२७५
मूषामृत्तिकायां संयोज्यद्रव्याणि,,पुटस्य फलम्,,
वज्रमूषा,,महापुटम्२७७
योगमूषा,,गजपुटम्,,
वज्रद्रावणीमूषा२६७वाराहपुटम्२७८
गारमूषा,,कुक्कुटपुटम्,,
वरमूषा,,कपोतपुटम्,,
वर्णमूषा२६८गोर्वरस्वरूपम्,,
रौप्यमूषा,,गोर्वरपुटलक्षणम्२७९
विडमूषा,,भाण्डपुटम्,,
वज्रद्रावणमूषा,,बालुकापुटम्,,
मूषाऽऽप्यायनम्२६९भूधरपुटम्२८०
वृन्ताकमूषा,,लावकपुटम्,,
गोस्तनीमूषा२७०अनुक्तपुटमानेकर्त्तव्यनिर्देशः२८१
मल्लमूषा,,उपलपर्यायाः,,
पक्कमूषा,,कृत्रिमाकृत्रिमलौहनिर्देशः,,
गोलमूषा,,षल्लवणानि२८२
महामूषा२७१क्षारत्रयम्,,
मण्डूकमूषा,,क्षारपञ्चकम्,,
मधुरत्रयम्२८३