रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६६ रसरत्नसमुच्चये—
दश वार निर्वापित करने से मृदु हो जाता है। इसी तरह कठिन लोहादि धातु भी मृदु होते हैं ॥ ३६ ॥
अथाभ्रमारणम्—
पट्टचूर्णं विधायाथ गोघृतेन परिप्लुतम् ।
भर्जयेत्सप्तवाराणि चुल्लीसंस्थितखर्परे ॥ ३७ ॥
अग्निवर्णं भवेद्यावद्वारं वारं विचूर्णयेत् ।
तृणं क्षिप्त्वा दहेद्यावत्तावद्वा भर्जनं चरेत् ॥ ३८ ॥
ततः सगन्धकं पिष्ट्वा वटमूलकषायतः ।
पुटेद्विंशति वारेण वाराहेण पुटेन हि ॥ ३९ ॥
पुनर्विंशतिवाराणि त्रिफलोत्थकषायतः ।
त्रिफलामुण्डिकाभृङ्गपत्रपथ्याक्षमूलकैः ॥ ४० ॥
भावयित्वा प्रयोक्तव्यं सर्वरोगेषु मात्रया ।
सत्त्वाभ्रात्किंचिदपरं निर्विकारं गुणाधिकम् ॥ ४१ ॥
एवं चेच्छुतवाराणि पुटपाकेन साधितम् ।
गुणवज्जायतेऽत्यर्थं परं पाचनदीपनम् ॥ ४२ ॥
अभ्रक सत्व को कपड़े से छान कर या पत्थर पर चूर्ण कर के गोघृत मिला कर चूल्हे पर स्थित कटाह इत्यादि पात्र में भूने । जब तक अग्नि के समान लाल वर्ण का न हो तब तक उस सत्व का कड़ाह में घोट कर चूर्ण करता जाय या कटाह में तृण डालने से वे जलने लगे तब तक घोट २ के चूर्ण करता जाय । इस तरह सात बार भूनना चाहिए । फिर उसमें समान मात्रा में शुद्ध गन्धक डाल कर वट के मूल के कषाय या क्वाथ से घोट कर वाराह संज्ञक पुट द्वारा २० पुट देवे । प्रत्येक पुट में गन्धक मिलाना चाहिए । फिर त्रिफले के क्वाथ या कषाय से घोट कर उसी तरह २० पुट देना चाहिए । पश्चात् त्रिफला, मुण्डी, भांगरे के पत्ते और हरीतकी तथा बहेड़ा और मूली इनके रस की क्रमशः भावनां देकर सब रोगों में मात्रानुसार प्रयोग करना चाहिए । इस सत्वाभ्रक से अन्य अधिक गुण करने वाली और कोई औषधि नहीं है । इसी प्रकार यदि १०० पुट दे कर अभ्रक सत्व का पुट पाक करें तो अत्यन्त गुण कारक तथा अग्निदीपक और पाचनशक्ति बढ़ाने वाली अभ्रक भस्म हो जाती है ॥ ३७-४२ ॥