भारतकोश
रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा

स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)

DevanagariHindipublished362 पृष्ठ

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द्वितीयोऽध्यायः। [५७]

घोट कर गोला बनावे। उस गोले को लवण नामक यन्त्र में रख कर मृदु अग्नि से आधे दिन तक पकावे। स्वाङ्गशीतल होने पर निकाल कर चूर्ण कर ले। इसमें से एक रत्ती की मात्रा में लेकर सोंठ, मिर्च, पीपल और वायविडङ्ग के चूर्ण में मिलाकर शहद के साथ सेवन करने से समग्र रोग, जरा तथा अत्यन्त कष्टसाध्य भी रोग और अकाल मृत्यु सात दिन में दूर हो जाते हैं। इसके समान अमृत रस भी गुण नहीं करता है ॥ ८५-८७ ॥

अथ सुवर्णमाक्षिकरसायनम्—

एरण्डोत्थेन तैलेन गुञ्जा क्षौद्रं च टङ्कणम् ।
मर्दितं तस्य वापेन सत्त्वं माक्षिकजं द्रवेत् ॥ ८८ ॥
इति माक्षिकाधिकारः ।

एरण्ड तेल, गुन्जा का चूर्ण, शहद और सुहागा इनके चूर्ण के साथ सुवर्ण माक्षिक सत्व के चूर्ण को डाल कर अग्नि पर गलाने से सोना माखी के सत्व का द्रवण हो जाता है ॥ ८८ ॥

विमलभेदाः—

विमलस्त्रिविधः प्रोक्तो हेमाद्यस्तारपूर्वकः ।
तृतीयः कांस्यविमलस्तत्तत्कान्त्या स लक्ष्यते ॥ ८९ ॥

कुछ लोग (पर्यायमुक्तावलोकार) विमल को रूपमाखी कहते हैं। विमल भी माक्षिक धातु का ही एक भेद है। विमल के ३ भेद हैं। सुवर्ण का भाग मिला रहने से सुवर्ण विमल, चांदी का भाग मिला रहने से तार विमल और कांस्य का भाग रहने से कांस्य विमल कहलाता है। चमक से ही विमल के भेदों का ज्ञान होता है ॥ ८९ ॥

विमल— इसको रौप्यमाक्षिक कहते हैं। बाजारों में इसके चतुष्कोण कण मिलते हैं और उनका वर्ण स्वर्ण के समान होता है। इसी लिये इसको फूल्स गोल्ड ( Fools gold ) भी कहते हैं तथा अज्ञ लोग इसे स्वर्ण माक्षिक मान कर स्वर्ण के अभाव में प्रयुक्त करते हैं। किन्तु यह गन्धक तथा लोहे का यौगिक है। इस में स्वल्प मात्रा में भी स्वर्ण नहीं रहता है।

जो असली स्वर्णमाक्षिक होता है उसमें ताम्र का अंश रहता है तथा वह कणरूप में नहीं आता है। "सत्त्वं चन्द्रार्कसङ्काशम्" इस पद से सिद्ध होता है कि प्राचीनाचार्यों ने भी असली स्वर्णमाक्षिक में ताम्र की उपस्थिति को माना है।