रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
पृष्ठ 168, कुल 362 में से
संदर्भ में पढ़ें७८ : रसरत्नसमुच्चये—
**उपलब्धि—**आज कल माक्षिक धातु विशेष करके बिहार, नेपाल, पञ्जाब और बुन्देलखण्ड की रियासतों में मिलता है तथा विदेश में भी इसकी खाने हैं।
अथ विमलस्य लक्षणगुणाः—
वर्तुलः कोणसंयुक्तः स्निग्धश्च फलकान्वितः ।
मरुत्पित्तहरो वृष्यो विमलोऽतिरसायनः ॥ ६० ॥
जो विमल गोल तथा चारों ओर कोण युक्त हो तथा स्पर्श में स्निग्ध और फलकाकार हो वह श्रेष्ठ है, तथा कुपित वात और पित्त को नष्ट करता है तथा अत्यन्त रसायन और वृष्य है ॥ ९० ॥
विमलभेदानां प्रयोगनिर्देशः—
पूर्वो हेमक्रियासूक्तो द्वितीयो रूप्यकृन्मतः ।
तृतीयो भेषजे तेषु पूर्वपूर्वो गुणोत्तरः ॥ ६१ ॥
सुवर्ण विमल सोने के जारण मारण या उसके स्थान में प्रयुक्त होता है । तार विमल चांदी के कार्य में और तृतीय कांस्य विमल औषध में काम आता है । इन तीनों में पूर्व से पूर्व श्रेष्ठ माना गया है ॥ ९१ ॥
अथ विमलशोधनम्—
आटूरूषजले स्विन्नो विमलो विमलो भवेत् ।
जम्बीरस्वरसे स्विन्नो मेषशृङ्गीरसेऽथवा ॥
आयाति शुद्धिं विमलो धातवश्च यथाऽपरे ॥ ६२ ॥
विमल को दोला यन्त्र द्वारा वासा के रस में या नीम्बू के रस में या मेढा-सिङ्गी के रस में दो घण्टे तक स्वेदन करने से शुद्ध हो जाता है । इस विधि से अन्य धातुओं को भी शुद्ध करना चाहिये ॥ ९२ ॥
अथ विमलस्य मारणम्—
गन्धाश्मलकुचाम्लैश्च म्रियते दशभिः पुटैः ॥ ६३ ॥
विमल के चूर्ण में समान भाग शुद्ध गन्धक मिलाकर बड़हर (लकुच) के स्वरस में या निम्बू के रस में घोट कर १० पुट देने से भस्म हो जाती है ॥ ९३ ॥
अथ विमलस्य सत्वपातनविधिः—
सटङ्कण्लंकुचद्रावैर्मेषशृंग्याश्च भस्मना ।
पिष्टो मूषोदरे लिप्तः संशोष्य च निरुध्य च ॥ ६४ ॥