रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयोऽध्यायः । ७९
षट्प्रस्थकोकिलैर्ध्मातो विमलः सीससन्निभः । सत्त्वं मुञ्चति तद्युक्तो रसः स्यात्स रसायनः ॥ ९५ ॥
विमल भस्म में बराबर भाग में सुहागा और मेढासिङ्गी की भस्म मिलाकर बडहर के रस में घोट कर मूषा के अन्दर लेप कर के सुखा लें । फिर मूषा यन्त्र को बंध कर के ६ प्रस्थ कोयले की आंच में फूंकने से सीसे के समान श्वेत सत्त्व निकल आता है । इस सत्त्व को पारे के साथ मिलाने से उत्तम रसायन तैयार हो जाता है ॥ ९४-९५ ॥
अथ मतान्तरेण सत्वपातनम्—
विमलं शिग्रुतोयेन कांक्षीकासीसटङ्कणम् । वज्रकन्दसमायुक्तं भावितं कदलीरसे ॥ ९६ ॥ मोक्षकक्षारसंयुक्तं ध्मापितं मूकमूषगम् । सत्त्वं चन्द्रार्कसंकाशं पतते नात्र संशयः ॥ ९७ ॥
विमल भस्म के बराबर २ फिटकिरी, हीराकासीस, सोहागा और जङ्गली सूरण-कन्द लेकर इनको कदली कन्द स्वरस या सहजन ( शिग्रु ) की छाल के क्वाथ से घोट कर पाढल क्षार भी मिला कर मूकमूषा यन्त्र में बन्द कर फूंकने से चन्द्र और अर्क (सूर्य) के समान श्वेत या चन्द्रकिरणवत् श्वेत सत्त्व निकलता है । इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है ॥ ९६-९७ ॥
अथ विमलस्य प्रयोगविधिर्गुणाश्च—
तत्सत्त्वं सूतसंयुक्तं पिष्टं कृत्वा सुमर्दितम् । विलीनं गन्धके क्षिप्त्वा जारयेत् त्रिगुणालकम् ॥ ९८ ॥ शिलां पञ्चगुणां चापि वालुकायन्त्रके खलु । तारभस्म दशांशेन तावद्वैक्रान्तकं मृतम् ॥ ९९ ॥ सर्वमेकत्र सञ्चूर्ण्य पटेन परिगाल्य च । निक्षिप्य कूपिकामध्ये परिपूर्य प्रयत्नतः ॥ १०० ॥ लीढो व्योषवरान्वितो विमलको युक्तो घृतैः सेवितो हन्याद्दुर्भगकृज्ज्वराङ्गश्वयथुकं पाण्डुप्रमेहारुचीः । मूलात्तिं ग्रहणीं च शूलमतुलं यक्ष्मामयं कामलाम् सर्वाञ्पित्तमरुद्गदान्किमपरैर्यौगैरशेषामयान् ॥ १०१ ॥