भारतकोश
रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा

स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)

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१७२ रसरत्नसमुच्चये-

पीतवर्ण का लौह स्पर्शमात्र से पारद का वेधाख्यसंस्कार कर देता है तथा रसायन में कृष्णवर्ण का लौह श्रेष्ठ है और रक्तवर्ण का कान्त लौह पारद के बन्धन में श्रेष्ठ है ॥ ८५ ॥

अधमादिकथनम्—

भ्रामकं तु कनिष्ठं स्याच्चुम्बकं मध्यमं तथा ।
उत्तमं कर्षकं चैव द्रावकं चोत्तमोत्तमम् ॥ ८६ ॥

ऊपर कहे हुए कान्त लौह के भेदों में भ्रामकसंज्ञक लौह औषध कर्म में कनिष्ठ ( त्याज्य ) है, चुम्बक मध्यम है, कर्षक उत्तम है तथा द्रावक संज्ञक कान्त लौह सर्वोत्तम कहा गया है ॥ ८६ ॥

भ्रामककान्तलक्षणम्—

भ्रामयेल्लोहजातं यत्तत्कान्तं भ्रामकं मतम् ॥ ८७ ॥

जो लौह अपने प्रभाव से अन्य लौह समूह को भ्रमाता ( चञ्चल या गति-युक्त करता ) है उसे भ्रामककान्त लौह कहते हैं ॥ ८७ ॥

चुम्बककर्षकलक्षणम्—

चुम्बयेच्चुम्बकं कान्तं कर्षयेत्कर्षकं तथा ॥ ८८ ॥

जो अपने प्रभाव से अन्य लौह को खींचकर चुम्बित कर लेता है वह चुम्बक कहा जाता है और जो केवल अन्य लौह को अपनी ओर खींचता है उसे कर्षक कहते हैं ॥ ८८ ॥

द्रावककान्तलक्षणम्—

साक्षाद्यद्द्ावयेल्लोहं तत्कान्तं द्रावकं भवेत् ॥ ८९ ॥

और जो अपने संयोगसे अन्य लौह को द्रवित कर देता है उस कान्त लौह को द्रावक कहते हैं ॥ ८९ ॥

रोमकान्तलक्षणम्—

तद्रोमकान्तं स्फुटिताद्यतो रोमोद्गमो भवेत् ॥ ९० ॥

तथा जिस कान्त लौह के तोड़ने पर बालों के समान रेखाओं का अविर्भाव हो वह रोमकान्त कहलाता है ॥ ९० ॥

मुखभेदेन श्रेष्ठाश्रेष्ठत्वकथनम्—

कनिष्ठं स्यादेकमुखं मध्यं द्वित्रिमुखं भवेत् ।
चतुष्पञ्चमुखं श्रेष्ठमुत्तमं सर्वतोमुखम् ॥ ९१ ॥