रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२२४ रसरत्नसमुच्चये—
अथ अष्टमोऽध्यायः ॥
अथ परिभाषा—
कथ्यते सोमदेवेन मुग्धवैद्यप्रबुद्धये ।
परिभाषा रसेन्द्रस्य शास्त्रैः सिद्धैश्च भाषिता ॥ १ ॥
अब सोमदेव नामक रसशास्त्र के आचार्य, अल्प मति वैद्यों को सहज में ज्ञान हो जाय इसलिये शास्त्र और सिद्ध पुरुषों से कही हुई रस सम्बन्धी परिभाषा को कहते हैं ॥ १ ॥
धन्वन्तरिभागः—
अर्धं सिद्धरसस्य तैलघृतयोर्लेहस्य भागोऽष्टमः
संसिद्धाखिललोहचूर्णवटकादीनां तथा सप्तमः ।
यो दीयेत भिषग्वराय गदिभिर्निर्दिश्य धन्वन्तरिम् ।
सर्वाऽऽरोग्यसुखाप्तये निगदितो भागः स धन्वन्तरेः ॥ २ ॥
जो रोगी अपने रोगमुक्ति के लिये तथा आरोग्य और सुखप्राप्ति के निमित्त वैद्य के द्वारा अपने द्रव्य से औषध निर्माण कराकर उसमें से निर्माता वैद्य को जारणमारणादिविधि से सिद्ध हुए रस और सिद्धकिये हुए घृत, तैल का आधाभाग, अवलेह का आठवांभाग, सिद्ध हुए सप्तलोह, चूर्ण, वटक इत्यादि में से सप्तमांश (सातवां) भाग धन्वन्तरि के निमित्त देता है वह धन्वन्तरि का भाग कहलाता है ॥२॥
रुद्रभागः—
भैषज्यक्रीणितद्रव्यभागोऽप्येकादशो हि यः ।
वणिग्भ्यो गृह्यते वैद्यै रुद्रभागः स उच्यते ॥ ३ ॥
औषधि के लिये खरीदे हुए द्रव्यों में का व्यापारियों से जो ग्यारहवां भाग वैद्य लेते हैं वही रुद्रभाग कहलाता है ॥ ३ ॥
अथ विश्वासघातकवैद्यलक्षणम्—
प्रगृह्याऽधिकरुद्रांशं योऽसमीचीनमौषधम् ।
दापयेल्लुब्धधीर्वैद्यः स स्याद्विश्वासघातकः ॥ ४ ॥
जो लोभी वैद्य अधिक मात्रा से रुद्रभाग लेकर खराब औषधि को श्रेष्ठ कह कर देता है या अन्य से दिला देता है वह वैद्य विश्वासघातक है ॥ ४ ॥