रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
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इन तीनों में दैवी ( रस ) चिकित्सा सर्व श्रेष्ठ मानी गई है । यह मानना सोलहों आना ( पूर्णतया ) सत्य भी है क्योंकि शल्यचिकित्सा केवल वर्धित या विकृत हुए शरीराङ्ग को काट सकती है । किन्तु उस विकार का पूर्ण निर्मूलन नहीं कर सकती है । जैसे अर्श (Piles), अर्बुद ( Tumours ) आदि का छेदन करने पर भी अनेकों बार उनकी पुनरुत्पत्ति होते देखी गई है किन्तु रसचिकित्सा के द्वारा चिकित्सा करने पर लाभ ( रोगनाश ) देर से होता है किन्तु स्थाई होता है इस लिए रसचिकित्सा सर्वोत्तम है । रसों के सेवन करने से शरीर रोगों से प्रथम ही पृथक् रहता है ।
“प्रक्षालनाद्धि पङ्कस्य दूरादस्पर्शनं वरम्”
इस लिए इस चिकित्सा को दैवी चिकित्सा कहना अत्युक्ति नहीं है अपि तु यथार्थ ही है । अत एव रसचिकित्सक सर्व चिकित्सकों में उत्तम “उत्तमो रस वैद्यस्तु मध्यमो मूलिकादिभिः ।
अधमः शस्त्रदाहाभ्याम्”
माना गया है । यद्यपि काष्ठौषधियों द्वारा निर्मित चूर्ण, अवलेह आदि भी शरीर के लिये हितकर हैं तथापि चूर्ण अवलेहादिक की तरह रसों का अधिक प्रयोग नहीं करना पड़ता है तथा रस अरुचिकर कभी भी नहीं होते हैं और शीघ्रातिशीघ्र शरीर को आरोग्य प्रदान करते हैं ।
अल्पमात्रोपयोगित्वादरुचेरप्रसङ्गतः ।
क्षिप्रमारोग्यदायित्वादौषधेभ्योऽधिको रसः ॥
इस लिये निर्विवाद सिद्ध हो गया कि रसचिकित्सा अन्य चिकित्साओं में तो श्रेष्ठ है ही परन्तु आयुर्वेदीय ‘अष्ट”अङ्गों’ में भी सर्व प्रथम मानी गई है । इस रस चिकित्सा का आविर्भाव सर्व प्रथम महादेवजी ने किया है । अत एव यह चिकित्सा दैवी है । बाद में रसचिकित्सा के प्रवर्तक कई आचार्य हुए हैं ।
आदिमश्चन्द्रसेनश्च लङ्केशश्च विशारदः ।
कपाली मत्तमाण्डव्यौ भास्करः शूरसेनकः ॥ १ ॥
रत्नकोशश्च शम्भुश्च सात्विको नरवाहनः ।