रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें[ ३ ]
इन्द्रदो गोमुखश्चैव कम्बलिव्र्यांडिरेव च ॥ २॥
नागार्जुनः सुरानन्दो नागबोधिर्यशोधनः ।
खण्डः कापालिको ब्रह्मा गोविन्दो लम्पको हरिः ॥ ३॥
इन आचार्यों ने कई रस ग्रन्थ बनाये हैं। निम्न रसतन्त्र या संहिताओं का नामोल्लेख मिलता है।
| रसेन्द्रसंहिता | सिद्धलक्ष्मीश्वरतन्त्र | चन्द्रसेनसिद्धान्त |
| दत्तात्रेयसंहिता | लम्पटतन्त्र | लङ्केशसिद्धान्त |
| अगस्त्यसंहिता | स्वच्छन्दभैरवतन्त्र | कपिलसिद्धान्त |
| नासत्यसंहिता | मन्थानभैरवतन्त्र | ब्रह्मसिद्धान्त |
| गोरक्षसंहिता | काकचण्डीश्वरतन्त्र(१) | रसरत्नाकर |
| रुद्रयामलतन्त्र | हरीश्वरतन्त्र | रसरत्नप्रदीप |
| महारसायनतन्त्र | महादेवतन्त्र | रसपारिजात |
| कामधेनुतन्त्र | नागार्जुनतन्त्र | रसेन्द्रसारसङ्ग्रह |
| दत्तात्रेयतन्त्र | बालतन्त्र | रसरत्नसमुच्चय आदि। |
इनमें से बहुत से ग्रन्थ लुप्त हैं तथा जो मिलते हैं उनमें यह रस-रत्नसमुच्चय नामक ग्रन्थ भी रसचिकित्सा का एक सर्वाङ्गीण ग्रन्थ है। यद्यपि इस का प्रचार कुछ वर्षों पहिले कम था किन्तु इसके अन्दर अनेक रसों के उत्तमोत्तम योग तथा पारद के अनेक संस्कारों का उत्तम वर्णन होने से अब दिनों दिन इसकी आवश्यकता बढ़ती जा रही है तथा यह ग्रन्थ अब वैद्य समुदाय में अधिक प्रचलित हो रहा है तथा बिहार आदि अनेक स्थानों की सम्मानित परीक्षाओं में भी रखा हुआ है। इस ग्रन्थ में अनेक उत्तमोत्तम योग हैं, जिनका अनुभव करना अत्यन्त आवश्यक है। यदि इन योगों का प्रयोग किया जाय तो चिकित्सा में आश्चर्यजनक लाभ हो सकता है। यह ग्रन्थ तीस अध्यायों में विभक्त है।
प्रथमाध्याय-में हिमालयवर्णन, रस ( पारद ) के उत्कर्ष का वर्णन, मूर्च्छित पारद के गुण तथा उसकी उत्पत्ति, भेद और निरुक्ति आदि पारदसम्बन्धी वर्णन है।
( १ ) काशी संस्कृत ग्रन्थमाला नं० ७३ में मुद्रित है।