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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

सूक्त—१८० देवता—इंद्र

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श्रातं मन्य ऊधनि श्रातमग्नौ सुश्रातं मन्ये तदृतं नवीयः. माध्यन्दिनस्य सवनस्य दध्नः पिबेन्द्र वज्रिन्पुरुकृज्जुषाणः.. (३) गाय के थन में यह दुग्धरूप हवि सबसे पहले पकता है, हम लोग ऐसा मानते हैं. अग्नि में पककर वह अति पवित्र एवं नवीन बनता है, यह हमारा विचार है. हे वज्रधारी एवं अधिक धनदान करने वाले इंद्र! माध्यंदिन सवन नामक यज्ञ के उस दूध को तुम पिओ. (३) सूक्त—१८० देवता—इंद्र प्र ससाहिषे पुरुहूत शत्रूञ्ज्येष्ठस्ते शुष्म इह रातिरस्तु. इन्द्रा भर दक्षिणेना वसूनि पतिः सिन्धूनामसि रेवतीनाम्.. (१) हे बहुतों द्वारा बुलाए गए इंद्र! तुम शत्रुओं को हराते हो. तुम्हारा तेज श्रेष्ठ है. इस यज्ञ में तुम्हारा दान हमें मिले. तुम दाहिने हाथ से हमें धन दो. तुम जल वाली सरिताओं के पति हो. (१) मृगो न भीमः कुचरो गविष्ठाः परावत आ जगन्था परस्याः. सृकं संशाय पविमिन्द्र तिग्मं वि शत्रून्ताळ्हि वि मृधो नुदस्व.. (२) हे इंद्र! तुम भयानक पैरों एवं पर्वतवासी पशु के समान भयानक हो. तुम दूरवर्ती स्वर्गलोक से आए हो. तुम गतिशील एवं तीखे वज्र पर सान चढ़ाकर शत्रुओं को मारो और विरोधियों को दूर भगाओ. (२) इन्द्र क्षत्रमभि वाममोजोऽजायथा वृषभ चर्षणीनाम्. अपानुदो जनममित्रयन्तमुरुं देवेभ्यो अकृणोरु लोकम्.. (३) हे इंद्र! तुम कष्ट से रक्षा करने वाले एवं सुंदर तेज को लेकर उत्पन्न हुए हो. हे कामपूरक इंद्र! तुम हमारे प्रति शत्रुता रखने वाले लोगों का नाश करो एवं देवों के लिए संसार को विस्तृत बनाओ. (३) सूक्त—१८१ देवता—विश्वेदेव प्रथश्च यस्य सप्रथश्च नामानुष्टुभस्य हविषो हविर्यत्. धातुर्द्युतानात्सवितुश्च विष्णो रथन्तरमा जभारा वसिष्ठः.. (१) वसिष्ठ के पुत्र पृथु हैं और भरद्वाज के सुप्रथ हैं. इन में से वसिष्ठ धाता, दीप्तिशाली सविता और विष्णु के समीप से अनुष्टुप् छंद वाला एवं हवि को शुद्ध करने वाला साममंत्र लाए थे. (१) ebook converter DEMO Watermarks*

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अविन्दन्ते अतिहितं यदासीद्यज्ञस्य धाम परमं गुहा यत्. धातुर्द्युतानात्सवितुश्च विष्णोर्भरद्वाजो बृहदा चक्रे अग्नेः.. (२) धाता आदि ने छिपा हुआ, हव्य का संस्कार करने वाला व गुफा में सुरक्षित साममंत्र पाया. भरद्वाज ऋषि धाता, दीप्तिशाली सविता, विष्णु और अग्नि के पास से उस बृहत् साममंत्र को लाए. (२) तेऽविन्दन्मनसा दीध्याना यजुः ष्फन्नं प्रथमं देवयानम्. धातुर्द्युतानात्सवितुश्च विष्णोरा सूर्याद्भरन्घर्ममेते.. (३) धाता आदि ने ध्यान करते हुए मन में यज्ञसाधक, अभिषेकक्रिया संपन्न करने वाले, मुख्य एवं देवों को प्राप्त करने के साधन उस धर्ममंत्र को पाया. पुरोहितों ने धाता, तेजस्वी सविता, विष्णु और सूर्य से इस मंत्र को प्राप्त किया. (३) सूक्त—१८२ देवता—बृहस्पति बृहस्पतिर्नयतु दुर्गहा तिरः पुनर्नेषदघशंसाय मन्म. क्षिपदशस्तिमप दुर्मतिं हन्नथा करद्यजमानाय शं योः.. (१) दुर्दशा को नष्ट करने वाले बृहस्पति हमारे पापों को नष्ट करें व हमारा अनर्थ चाहने वाले व्यक्ति के ऊपर आयुध उठावें. वे शत्रु का नाश करें, दुर्बुद्धि का नाश करें एवं यजमान को रोग से बचाकर निर्भय करें. (१) नराशंसो नोऽवतु प्रयाजे शं नो अस्त्वनुयाजो हवेषु. क्षिपदशस्तिमप दुर्मतिं हन्नथा करद्यजमानाय शं योः.. (२) पांच प्रयाजों में नराशंस अग्नि हमारी रक्षा करें. आह्वानाें में अनुयाज हमारी रक्षा करें. वे शत्रु का नाश करें, दुर्बुद्धि को मिटावें एवं यजमान को रोग से बचाकर निर्भय करें. (२) तपुर्मूर्धा तपतु रक्षसो ये ब्रह्मद्विषः शरवे हन्तवा उ. क्षिपदशस्तिमप दुर्मतिं हन्नथा करद्यजमानाय शं योः.. (३) जो स्तोत्रों से द्वेष करने वाले राक्षस हैं, उन्हें हिंसक असुरों के नाश हेतु तप्त शिर वाले बृहस्पति कष्ट दें. वे अमंगल का नाश करें, दुर्बुद्धि को मिटावें एवं यजमान को रोगमुक्त करके निर्भय बनावें. (३) सूक्त—१८३ देवता—यजमान और उसकी पत्नी ebook converter DEMO Watermarks*

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अपश्यं त्वा मनसा चेकितानं तपसो जातं तपसो विभूतम्. इह प्रजामिह रयिं रराणः प्र जायस्व प्रजया पुत्रकाम.. (१) हे कर्मों के ज्ञानी, तप से उत्पन्न एवं तपस्या से उन्नत यजमान! मैंने अपने मन की आंखों से तुम्हें देखा है. तुम यहां संतान एवं धन पाकर प्रसन्न बनो एवं पुत्र की कामना से संतान के रूप में जन्म लो. (१) अपश्यं त्वा मनसा दीध्यानां स्वायां तनू ऋत्व्ये नाधमानाम्. उप मामुच्चा युवतिर्बभूयाः प्र जायस्व प्रजया पुत्रकामे.. (२) हे पत्नी! मैंने मन की आंखों से तुम्हें दीप्तिशालिनी व ऋतु के अनुसार अपने शरीर में गर्भाधान की कामना करती हुई देखा है. हे पुत्र की कामना करने वाली! मेरे समीप तुम उत्तम तरुणी बनो एवं पुत्र उत्पन्न करो. (२) अहं गर्भमदधामोषधीष्वहं विश्वेषु भुवनेष्वन्तः. अहं प्रजा अजनयं पृथिव्यामहं जनिभ्यो अपरीषु पुत्रान्.. (३) मैं होता हूं, ओषधियों में गर्भ धारण करता हूं एवं सभी प्राणियों में गर्भ धारण का कारण बनता हूं. मैंने धरती पर प्रजा को जन्म दिया है. मैं यज्ञ करके सब नारियों में पुत्र उत्पन्न कर सकता हूं. (३) सूक्त—१८४ देवता—विष्णु आदि विष्णुर्योनिं कल्पयतु त्वष्टा रूपाणि पिंशतु. आ सिञ्चतु प्रजापतिर्धाता गर्भं दधातु ते.. (१) विष्णु नारी की योनि को गर्भाधान के योग्य बनावें. त्वष्टा उस में स्त्री एवं पुरुष के चिह्नों का भाग सम्मिलित करें. प्रजापति योनि को वीर्य से सींचें एवं धाता तेरा गर्भ धारण करें. (१) गर्भं धेहि सिनीवालि गर्भं धेहि सरस्वति. गर्भं ते अश्विनौ देवावा धत्तां पुष्करस्रजा.. (२) हे सिनीवाली! तुम गर्भ धारण कराओ. हे सरस्वती! तुम गर्भ की रक्षा करो. हे स्त्री! सुनहरे कमलों की माला पहनने वाले अश्विनीकुमार देव तुम्हारे शरीर में गर्भ धारण करें. (२) हिरण्ययी अरणी यं निर्मन्थतो अश्विना. तं ते गर्भं हवामहे दशमे मासि सूतवे.. (३) हे पत्नी! अश्विनीकुमार जिस स्वनिर्मित अरणि का मंथन करते हैं, हम दशम मास में तुम्हारे गर्भ के जन्म के लिए उसी अरणि को बुलाते हैं. (३)

सूक्त—१८५ देवता—आदित्य

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सूक्त—१८५ देवता—आदित्य महि त्रीणामवोऽस्तु द्युक्षं मित्रस्यार्यम्णः. दुराधर्षं वरुणस्य.. (१) वरुण, मित्र एवं अर्यमा—इन तीन देवों का दीप्तिशाली, अपराजेय एवं महान् रक्षण हमें प्राप्त हो. (१) नहि तेषाममा चन नाध्वसु वारणेषु. ईशे रिपुरघशंसः.. (२) वरुण, अर्यमा एवं मित्र द्वारा अनुगृहीत स्तोताओं को घर, मार्ग एवं दुर्गम स्थान में बुरा चाहने वाला शत्रु नहीं दबा सकता. (२) यस्मै पुत्रासो अदितेः प्र जीवसे मर्त्याय. ज्योतिर्यच्छन्त्यजस्रम्.. (३) अदिति के ये तीनों पुत्र जिसके जीवन के लिए ज्योति प्रदान करते हैं, उस पर शत्रु का अधिकार नहीं होता. (३) सूक्त—१८६ देवता—वायु वात आ वातु भेषजं शम्भु मयोभु नो हृदे. प्र ण आयूंषि तारिषत्.. (१) वायु ओषधि बनकर हमारे हृदय में आवें तथा हमारे लिए कल्याण एवं सुख दें. वायु हमारी आयु बढ़ावें. (१) उत वात पितासि न उत भ्रातोत नः सखा. स नो जीवातवे कृधि.. (२) हे वायु! तुम हमारे पिता भाई एवं मित्र हो. तुम हमारे जीवन के लिए यज्ञ करो. (२) यददो वात ते गृहे३ मृतस्य निधिर्हितः. ततो नो देहि जीवसे.. (३) हे वायु! तुम्हारे घर में जो अमृत का खजाना छिपा है, उससे हमारे जीवन के लिए अमृत दो. (३) सूक्त—१८७ देवता—अग्नि प्राग्नये वाचमीरय वृषभाय क्षितीनाम्. स नः पर्षदति द्विषः.. (१) हे स्तोताओ! मानवों की अभिलाषा पूरी करने वाले अग्नि की स्तुति करो. अग्नि हमें शत्रु से बचावें. (१) eBook converter DEMO Watermarks*

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यः परस्याः परावतस्तिरो धन्वातिरोचते. स नः पर्षदति द्विषः.. (२) जो अग्नि अत्यंत दूरवर्ती आकाश को पार करके आए हैं, वे हमें शत्रु से बचावें. (२) यो रक्षांसि निजूर्वति वृषा शुक्रेण शोचिषा. स नः पर्षदति द्विषः.. (३) जो अग्नि अपनी वर्षाकारक एवं उज्ज्वल ज्वाला से राक्षसों का नाश करते हैं, वे हमें शत्रुओं से बचावें. (३) यो विश्वाभि विपश्यति भुवना सं च पश्यति. स नः पर्षदति द्विषः.. (४) जो अग्नि सारे संसार को एक-एक करके एवं सामूहिक रूप से देखते हैं वे शत्रुओं से हमारी रक्षा करें. (४) यो अस्य पारे रजसः शुक्नो अग्निरजायत. स नः पर्षदति द्विषः.. (५) जिन अग्नि ने इस अंतरिक्ष के पार उज्ज्वल रूप में जन्म लिया है, वे हमें शत्रुओं से बचावें. (५) सूक्त—१८८ देवता—ज्ञानी अग्नि प्र नूनं जातवेदसमश्वं हिनोत वाजिनम्. इदं नो बर्हिरासदे.. (१) हे ऋत्विजो एवं यजमानो! ज्ञानी, व्याप्त एवं अन्न वाले अग्नि को कुशों पर बैठने के लिए बुलाओ. (१) अस्य प्र जातवेदसो विप्रवीरस्य मीळ्हुषः. महीमियर्मि सुष्टुतिम्... (२) विद्वान्, यजमानों के पिता एवं वर्षाकारक अग्नि के लिए मैं यह विशाल तथा शोभन स्तुति करता हूं. (२) या रुचो जातवेदसो देवत्रा हव्यवाहनीः ताभिर्नो यज्ञमिन्वतु.. (३) अग्नि की जो ज्वालाएं देवों के लिए हव्यवहन करने वाली हैं, उनके द्वारा अग्नि हमारे यज्ञ की रक्षा करें. (३) सूक्त—१८९ देवता—सूर्य एवं सार्पराज्ञी आयं गौः पृश्निरक्रमीदसद्न् मातरं पुरः. पितरं च प्रयन्त्स्वः.. (१) गमनशील व तेज प्राप्त करने वाले सूर्य उदयाचल को पाकर अपनी माता पूर्व दिशा को ebook converter DEMO Watermarks*

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प्राप्त करते हैं. वे इसके बाद अपने पिता आकाश के पास जाते हैं. (१) अन्तश्चरति रोचनास्य प्राणादपानती. व्यख्यन्महिषो दिवम्.. (२) इस सूर्य के भीतर दीप्ति विचरण करती है एवं इनके प्राण के साथ ऊपर-नीचे जाती है. सूर्य महान् बनकर आकाश को व्याप्त करते हैं. (२) त्रिंशद्धाम वि राजति वाक्पतङ्गाय धीयते. प्रति वस्तोरह द्युभि:.. (३) सूर्य के तीस स्थान शोभा पाते हैं एवं गतिशील सूर्य के लिए स्तुति की जाती है. सूर्य प्रतिदिन अपनी किरणों से शोभा पाते हैं. (३) सूक्त—१९० देवता—सृष्टि ऋतं च सत्यं चाभीद्धात्तपसोऽध्यजायत. ततो रात्र्यजायत ततः समुद्रो अर्णव:.. (१) प्रज्वलित तप से यज्ञ और सत्य उत्पन्न हुए. इसके बाद रात तथा दिन उत्पन्न हुए. इसके पश्चात् जलपूर्ण सागर उत्पन्न हुए. (१) समुद्रादर्णवादधि संवत्सरो अजायत. अहोरात्राणि विदधद्विश्वस्य मिषतो वशी.. (२) जलपूर्ण सागर से संवत्सर उत्पन्न हुए. पलक झपकाने में संसार के स्वामी ईश्वर ने दिन एवं रात बनाए. (२) सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत्. दिवं च पृथिवीं चान्तरिक्षमथो स्व:.. (३) ईश्वर ने पूर्वकाल के अनुसार सूर्य और चंद्रमा को बनाया. उसने इसके बाद द्युलोक, पृथ्वी एवं अंतरिक्ष को बनाया. (३) सूक्त—१९१ देवता—अग्नि व ज्ञान संसमिद्युवसे वृषन्नग्ने विश्वान्यर्य आ. इळस्पदे समिध्यसे स नो वसून्या भर.. (१) हे अभिलाषापूरक एवं स्वामी अग्नि! तुम सभी प्राणियों को भली प्रकार मिश्रित करते हो. तुम यज्ञवेदी पर प्रज्वलित होते हो. तुम हमें धन दो. (१) संगच्छध्वं सं वदध्वं सं वो मनांसि जानताम्. देवा भागं यथा पूर्वे सञ्जानाना उपासते.. (२) हे स्तोताओ! तुम लोग आपस में मिलो, एक साथ स्तोत्र बोलो. तुम्हारे मन समान बात ebook converter DEMO Watermarks*

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को जानें. प्राचीन देव जिस प्रकार सम्मिलित होकर यज्ञ का भाग प्राप्त करते थे, उसी प्रकार तुम भी मिलकर संपत्ति का भोग करो. (२) समानो मन्त्रः समितिः समानी समानं मनः सह चित्तमेषाम्. समानं मन्त्रमभि मन्त्रये वः समानेन वो हविषा जुहोमि.. (३) पुरोहितों की स्तुतियां समान हों. ये लोग यज्ञ में एक साथ आवें. उनके मन और चित्त भी समान हों. हे पुरोहितो! मैं एक ही मंत्र से तुम सबको अभिमंत्रित करता हूं और एक ही प्रकार के हवि से तुम्हारा हवन करता हूं. (३) समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः. समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति.. (४) हे यजमानो व पुरोहितो! तुम्हारा व्यवसाय समान हो. तुम्हारे हृदय समान हों व तुम्हारा मन समान हो. तुम लोग एकरूप में संगठित बनो. (४) (ऋग्वेद संहिता संपूर्ण)

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यजुर्वेद ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ .. वेद ॥ अथर्ववेद ॥ द ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद .. सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ यजु ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद , ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ ' ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ यजुव वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ य. वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ यजु ॥ ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ यजुर्वेद ॥ ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ` सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ यजुर्वेद ॥ ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ अ' अथर्ववेद ॥ यजुर्वेद ॥ ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ - ूर्वेद ॥ यजुर्वेद ॥ ऋग्वेद ॥ .. .. ॥ अथर्ववेद ॥ यजुर्वेद ॥ ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ अ-, . सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ यजुर्वेद ॥ ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ अ.. सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ यजुर्वेद । ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ य. '॥ ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद २ ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ यजु वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ यजु ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद 'वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ द ॥ सामवेद ॥ अथर्ववे 'ग्वेद ॥ अथर्ववेद ॥ यजु ऋग्वेद ॥ सामवे- -॥ अथर्ववेद ॥ डा. रेखा व्यास एम.ए. (संस्कृत), पी-एच.डी.