ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सूक्त—४८ देवता—वायु
हम हव्यदाताओं को दे दो. (४) सूक्त—४८ देवता—वायु विहि होत्रा अवीता विपो न रायो अर्यः. वायवा चन्द्रेण रथेन याहि सुतस्य पीतये.. (१) हे वायु! तुम शत्रुओं को भयकंपित करने वाले राजाओं के समान दूसरों द्वारा बिना पिया हुआ सोम सबसे पहले पिओ एवं स्तुतिकर्त्ता को धनसंपन्न करो. हे वायु! तुम सोमरस पीने के लिए प्रसन्नतादायक रथ द्वारा आओ. (१) निर्यूवाणो अशस्तीर्नियुत्वाँ इन्द्रसारथिः. वायवा चन्द्रेण रथेन याहि सुतस्य पीतये.. (२) हे वायु! तुम सभी प्रशंसाओं से युक्त, घोड़ों के स्वामी एवं इंद्र के सहायक बनकर अपने अन्नदाता रथ द्वारा सोम पीने हेतु आओ. (२) अनु कृष्णे वसुधिती येमाते विश्वपेशसा. वायवा चन्द्रेण रथेन याहि सुतस्य पीतये.. (३) हे वायु! काले रंग वाले, धनों को धारण करने वाले एवं विश्वयुक्त धरती-आकाश तुम्हारे पीछे चलते हैं. तुम आनंददायक रथ द्वारा सोम पीने हेतु आओ. (३) वहन्तु त्वा मनोजुजो युक्तासो नवतिर्नव. वायवा चन्द्रेण रथेन याहि सुतस्य पीतये.. (४) हे वायु! मन के समान तीव्र गति वाले एवं एक-दूसरे से मिलकर चलने वाले निन्यानवे घोड़े तुम्हें लाते हैं. हे वायु! तुम अपने आनंदप्रद रथ द्वारा सोम पीने के लिए आओ. (४) वायो शतं हरीणां युवस्व पोष्याणाम्. उत वा ते सहस्रिणो रथ आ यातु पाजसा.. (५) हे वायु! तुम सौ स्वस्थ अश्वों को अपने रथ में जोड़ो अथवा हजार को. उनसे युक्त तुम्हारा रथ शीघ्रता से आवे. (५) सूक्त—४९ देवता—इंद्र, बृहस्पति इदं वामास्ये हविः प्रियमिन्द्राबृहस्पती. उक्थं मदश्च शस्यते.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*
हे इंद्र एवं बृहस्पति! तुम दोनों के मुख में सोम रूप हवि डालने के साथ-साथ तुम्हें आनंद देने वाली स्तुतियां भी बोली जा रही हैं. (१) अयं वां परि षिच्यते सोम इन्द्राबृहस्पती. चारुर्मदाय पीतये.. (२) हे इंद्र एवं बृहस्पति! यह सोमरस पीने के निमित्त एवं तुम्हें प्रसन्नता देने के लक्ष्य से तुम्हारे मुंह में डाला जाता है. (२) आ न इन्द्राबृहस्पती गृहमिन्द्रश्च गच्छतम्. सोमपा सोमपीतये.. (३) हे सोमपानकर्त्ता इंद्र एवं बृहस्पति! तुम दोनों सोमरस पीने के लिए हमारे घर आओ. (३) अस्मे इन्द्राबृहस्पती रयिं धत्तं शतग्विनम्. अश्वावन्तं सहस्रिणम्.. (४) हे इंद्र एवं बृहस्पति! हमें सौ गायों एवं हजार घोड़ों से युक्त धन दान करो. (४) इन्द्राबृहस्पती वयं सुते गीर्भिर्हवामहे. अस्य सोमस्य पीतये.. (५) हे इंद्र एवं बृहस्पति! हम सोम निचूड़ जाने पर सोमरस पीने के लिए स्तुतियों द्वारा तुम दोनों को बुलाते हैं. (५) सोममिन्द्राबृहस्पती पिबतं दाशुषो गृहे. मादयेथां तदोकसा.. (६) हे इंद्र एवं बृहस्पति! तुम हव्य देने वाले यजमान के घर में सोम पिओ एवं वहीं निवास करके प्रसन्न बनो. (६) सूक्त—५० देवता—बृहस्पति आदि यस्तस्तम्भ सहसा वि ज्मो अन्तान्बृहस्पतिस्त्रिषधस्थो रवेण. तं प्रत्नास ऋषयो दीध्यानाः पुरो विप्रा दधिरे मन्द्रजिह्वम्.. (१) यज्ञ का पालन करने वाले एवं शब्द के द्वारा तीनों स्थानों में वर्तमान बृहस्पति ने अपनी शक्ति द्वारा दसों दिशाओं को स्थिर किया है. प्रसन्नतादायक जीभ वाले बृहस्पतियों को प्राचीन ऋषियों एवं मेधावियों ने सबसे आगे स्थापित किया था. (१) धुनेतयः सुप्रकेतं मदन्तो बृहस्पते अभि ये नस्ततस्रे. पृषन्तं सृप्रमदब्धमूर्वं बृहस्पते रक्षतादस्य योनिम्.. (२) हे शोभन बुद्धि वाले बृहस्पति! तुम उन ऋत्विजों के लिए फलदाता, उन्नति करने वाले एवं अहिंसक बनकर उनके विशाल यज्ञ की रक्षा करते हो जो तुम्हें प्रसन्न करते हैं, तुम्हारी ebook converter DEMO Watermarks*
स्तुति करते हैं एवं जिनके चलने से शत्रु कांप उठते हैं. (२) बृहस्पते या परमा परावदत आ ऋतस्पृशो नि षेदुः. तुभ्यं खाता अवता अद्रिदुग्धा मध्वः श्चोतन्त्यभितो विरप्शम्.. (३) हे बृहस्पति! तुम्हारे यज्ञ में आने वाले अश्व परम उच्च स्थान स्वर्ग से आते हैं. जिस प्रकार खोदे हुए कुएं में चारों ओर से धाराएं निकलती हैं, उसी प्रकार पत्थरों की सहायता से निचोड़े गए सोमरस स्तुतियों के साथ तुम्हें गीला बनावें. (३) बृहस्पतिः प्रथमं जायमानो महो ज्योतिषः परमे व्योमन्. सप्तास्यस्तुविजातो रवेण वि सप्तरश्मिरधमत्तमांसि.. (४) बृहस्पति महान् दीप्तिशाली सूर्य के विशाल आकाश में जब पहली बार उत्पन्न हुए थे, तब उन्होंने सात मुख वाला, अनेक प्रकार का रूप धारण करके, शब्दयुक्त एवं गतिशील तेज से एकाकार होकर अंधकार का नाश किया था. (४) स सुष्टुभा स ऋक्वता गणेन वलं रुरोज फलिगं रवेण. बृहस्पतिरुस्रिया हव्यसूदः कनिक्रदद्वावशतीरुदाजत्.. (५) बृहस्पति ने शोभन स्तुति करने वाले एवं दीप्तिसंपन्न अंगिराओं के साथ मिलकर शब्द करते हुए बल नामक असुर को नष्ट किया था एवं शब्द करते हुए ही हव्य की प्रेरणा करने वाली रंभाती हुई गायों को बाहर निकाला था. (५) एवा पित्रे विश्वदेवाय वृष्णे यज्ञैर्विधेम नमसा हविर्भिः. बृहस्पते सुप्राजा वीरवन्तो यं स्याम पतयो रयीणाम्.. (६) हम लोग इसी तरह पालक, सब देवों के प्रतिनिधि एवं कामवर्षी बृहस्पति की सेवा हव्य, यज्ञों एवं स्तुतियों द्वारा करेंगे. हे बृहस्पति! इस प्रकार हम उत्तम संतान एवं वीर सैनिकों सहित धन के स्वामी हो सकेंगे. (६) स इद्राजा प्रतिजन्यानि विश्वा शुष्मेण तस्थावभि वीर्येण. बृहस्पतिं यः सुभृतं बिभर्ति वल्गूयति वन्दते पूर्वभाजम्.. (७) वही राजा अपनी शक्ति के द्वारा सभी शत्रुओं के बल को हराता है जो बृहस्पति का भली प्रकार भरण-पोषण करता है और सर्वप्रथम भाग पाने वाले के रूप में उनकी स्तुति करता है. (७) स इत्क्षेति सुधित ओकसि स्वे तस्मा इळा पिन्वते विश्वदानीम्. तस्मै विशः स्वयमेवा नमन्ते यस्मिन्ब्रह्मा राजनि पूर्व एति.. (८) ebook converter DEMO Watermarks*
वही राजा भली प्रकार तृप्त होकर अपने घर में रहता है, धरती उसे सभी कालों में फलों से बढ़ाती है एवं प्रजाएं अपने आप उसके सामने झुकी रहती हैं, जिस राजा के समीप ब्रह्मा सबसे पहले जाते हैं. (८) अप्रतीतो जयति सं धनानि प्रतिजन्यान्युत या सजन्या. अवस्यवे यो वरिवः कृणोति ब्रह्मणे राजा तमवन्ति देवाः.. (९) वह राजा बाधा के बिना शत्रुओं एवं अपनी प्रजाओं के धन पर अधिकार करके महान् बनता है एवं देव उसी की रक्षा करते हैं, जो धनहीन एवं रक्षा के इच्छुक ब्राह्मण को धन देता है. (९) इन्द्रश्च सोमं पिबतं बृहस्पतेऽस्मिन्यज्ञे मन्दसाना वृषण्वसू. आ वां विशन्त्विन्दवः स्वाभुवोऽस्मे रयिं सर्ववीरं नि यच्छतम्.. (१०) हे बृहस्पति! तुम और इंद्र इस यज्ञ में प्रसन्न होकर यजमानों को धन दो एवं सोमरस पिओ. संपूर्ण शरीर को व्याप्त करने में समर्थ सोम तुम्हारे शरीर में प्रवेश करे. तुम हमें पुत्र- पौत्र युक्त धन प्रदान करो. (१०) बृहस्पत इन्द्र वर्धतं नः सचा सा वां सुमतिर्भूत्वस्मे. अविष्टं धियो जिगृतं पुरन्धीर्जस्तमर्यो वनुषामरातीः.. (११) हे बृहस्पति और इंद्र! तुम हमें बढ़ाओ. हमारे प्रति तुम्हारी दया भावना एक ही साथ हो. तुम हमारे यज्ञकर्म की रक्षा करो, हमारी बुद्धियों को जगाओ एवं हम यजमानों के शत्रुओं से युद्ध करो. (११) सूक्त—५१ देवता—उषा इदमु त्यत्पुरुतमं पुरस्ताज्ज्योतिस्तमसो वयुनावदस्थात्. नूनं दिवो दुहितरो विभातीर्गातुं कृणवन्नुषसो जनाय.. (१) यह हमारे द्वारा स्तुति किया गया, सर्वप्रसिद्ध, परम विस्तृत एवं कांतियुक्त तेज पूर्व दिशा में अंधकार से उदित हुआ था. निश्चय ही सूर्य की पुत्रीरूप एवं दीप्तिशालिनी उषाएं यजमानों को गतिशील बनाने की सामर्थ्य रखती थीं. (१) अस्थुरु चित्रा उषसः पुरस्तान्मिता इव स्वरवोऽध्वरेषु. व्यु व्रजस्य तमसो द्वारोच्छन्तीरव्रञ्छुचयः पावकाः.. (२) यज्ञों में गाड़े गए खंभों के समान सुंदर एवं रंग-बिरंगी उषाएं पूर्व दिशा को घेरकर स्थित होती हैं. उषाएं बाधा डालने वाले अंधकार का द्वार खोलती हुई दीप्तियुक्त एवं पवित्र बनकर ebook converter DEMO Watermarks*
चमकती हैं. (३) उच्चन्तीरद्य चितयन्त भोजानाधोदेयायोषसो मघोनीः. अचित्रे अन्तः पणयः ससन्त्वबुध्यमानास्तमसो विमध्ये.. (३) आज अंधकार का नाश करती हुईं एवं धन की स्वामिनी उषाएं भोजन देने वाले यजमानों को सोमरस आदि दान करने के हेतु उत्साहित करती हैं. चेतनारहित गाढ़े अंधकार में दान न देने वाले पणि लोग चेतनारहित होकर पड़े रहे. (३) कुवित्स देवीः सनयो नवो वा यामो बभूयादुषसो वो अद्य. येना नवग्वे अङ्गिरे दशग्वे सप्तास्ये रेवती रेवदूष.. (४) हे प्रकाशयुक्त एवं धनशालिनी उषाओ! तुम्हारा वही पुराना या नया रथ आज यज्ञ में अनेक बार आवे, जिस रथ के द्वारा तुमने सात छंदरूप मुख वाले, नौ गायों अथवा दस गायों वाले अंगिरावंशीय ऋषियों को दीप्त किया था. (४) यूयं हि देवीर्ऋतयुग्भिरश्वैः परिप्रयाथ भुवनानि सद्यः. प्रबोधयन्तीरुषसः ससन्तं द्विपाच्चतुष्पाच्चरथाय जीवम्.. (५) दे दीप्तियुक्त उषाओ! तुम सोते हुए मनुष्य एवं पशुरूप जीवों को गमन के लिए जगाती हुई यज्ञ में जाने वाले घोड़ों की सहायता से सारे विश्व का तुरंत भ्रमण कर लो. (५) क्व स्विदासाम् कतमा पुराणी यया विधाना विदधुर्ऋभूणाम्. शुभं यच्छुभ्रा उषसश्चरन्ति न वि ज्ञायन्ते सदृशीरजुर्याः.. (६) वे प्राचीन उषाएं कहां हैं, जिनके लिए ऋभुओं ने चमस बनाने का काम किया था? जब तेजोविशिष्ट उषाएं प्रकाश फैलाती हैं, तब एक समान होने के कारण वे नई या पुरानी नहीं जान पड़तीं. (६) ता घा ता भद्रा उषसः पुरासुरभिष्टिद्युम्ना ऋतजातसत्याः. यास्वीजानः शशमान उक्थैः स्तुवञ्छंसन्द्रविणं सद्य आप.. (७) अपने आगमन मात्र से धन देने वाली, यज्ञ के निमित्त एवं सत्व फल देने वाली उषाएं कल्याणकारीरूप में पहले उत्पन्न हुई थीं। यज्ञ करने वाले मंत्रों द्वारा उन उषाओं की स्तुतियां करके एवं छंदों द्वारा प्रशंसा करके तुरंत धन लाभ करते थे. (७) ता आ चरन्ति समना पुरस्तात्समानतः समना पप्रथानाः. ऋतस्य देवीः सदसो बुधाना गवां न सर्गा उषसो जरन्ते.. (८) सर्वत्र समान एवं प्रसिद्ध उषाएं पूर्व दिशा में केवल आकाश से सब जगह घूमती हैं एवं ebook converter DEMO Watermarks*
यज्ञशाला को ज्ञान का विषय बनाती हुईं जल उत्पन्न करने वाली किरणों के सामन प्रशंसापात्र बनती हैं. (८) ता इन्न्वे३व समना समानीरमीतवर्णा उषसश्चरन्ति. गूहन्तीरभ्वमसितं रुशद्भिः शुक्लास्तनूभिः शुचयो रुचानाः.. (९) वे एक रूप वाली, समान व अनगिनत रंगों से युक्त उषाएं अपने दीप्तिशाली शरीर द्वारा प्रकाश फैलाती हुई एवं अपनी किरणों से महान् अंधकार का नाश करती हुई विचरण करती हैं. (९) रयिं दिवो दुहितरो विभातीः प्रजावन्तं यच्छतास्मासु देवीः. स्योनादा वः प्रतिबुध्यमानाः सुवीर्यस्य पतयः स्याम.. (१०) हे तेजस्वी सूर्य की पुत्रियो एवं दीप्तिशाली उषाओ! तुम हमें पुत्र-पौत्रादि से युक्त धन दो. हम सुख प्राप्ति के कारण तुम्हें जगा रहे हैं. इस प्रकार हम पुत्र-पौत्र युक्त धन के स्वामी होंगे. (१०) तद्वो दिवो दुहितरो विभातीरुप ब्रुव उषसो यज्ञकेतुः. वयं स्याम यशसो जनेषु तद्द्यौश्च धत्तां पृथिवी च देवी.. (११) हे तेजस्वी सूर्य की पुत्री रूपी उषाओ! हम यज्ञ के ज्ञापक रूप में तुमसे प्रार्थना कर रहे हैं कि हम सब लोगों के मध्य में यश और अन्न के स्वामी बनें. स्वर्ग एवं दीप्तिपूर्ण धरती हमारा वह यश धारण करे. (११) सूक्त—५२ देवता—उषा प्रति ष्या सूनरी जनी व्युच्छन्ती परि स्वसुः. दिवो अदर्शि दुहिता.. (१) भली प्रकार स्तुत, प्राणियों की कुशल नेत्री एवं उत्तम फलों को जन्म देने वाली सूर्यपुत्री उषा दिखाई देती है एवं रात बीतने पर अंधेरे का नाश करती है. (१) अश्वेव चित्रारुषी माता गवामृतावरी. सखाभूदश्विनोरुषाः.. (२) घोड़े के समान सुंदर, दीप्तिशालिनी, किरणों की माता एवं यज्ञ की स्वामिनी उषा अश्विनीकुमारों के साथ स्तुत हो. (२) उत सखास्यश्विनोरुत माता गवामसि. उतोषो वस्व ईशिषे.. (३) हे उषा! तुम अश्विनीकुमारों की सखा, किरणों की माता एवं धन की स्वामिनी हो. (३) ebook converter DEMO Watermarks*
यावयद् द्वेषसं त्वा चिकित्त्वत्सूनृतावरि. प्रति स्तोमैरभुत्स्महि.. (४) हे सत्य वचन वाली एवं शत्रुओं को दूर भगाने वाली उषा! हम स्तुतियों द्वारा तुझ ज्ञान कराने वाली को जगाते हैं. (४) प्रति भद्रा अदृक्षत गवां सर्गा न रश्मय:. ओषा अप्रा उरु ज्रय:.. (५) प्रशंसा के योग्य किरणें दिखाई देती हैं. उषा ने संसार को वर्षा की धारा के समान तेज से भर दिया है. (५) आपप्रुषी विभावरि व्यावर्ज्योतिषा तम:. उषो अनु स्वधामव.. (६) हे कांतिशालिनी उषा! तुम जगत् को तेज से पूर्ण करती हुई अंधकार को दूर भगाओ. इसके पश्चात् हविरूपी अन्न की रक्षा करो. (६) आ द्यां तनोषि रश्मिभिरान्तरिक्षनमुरु प्रियम्. उष: शुक्रेण शोचिषा.. (७) हे उषा! तुम दीप्त आकाश से युक्त होकर किरणों द्वारा स्वर्ग एवं प्रिय अंतरिक्ष को व्याप्त करो. (७) सूक्त—५३ देवता—सविता तद्देवस्य सवितुर्वार्थ महद्वृणीमहे असुरस्य प्रचेतस:. छर्दिर्येन दाशुषे यच्छति त्मना तन्नो महाँ उदयान्देवो अक्तुभि:.. (१) हम बलशाली एवं उत्तम बुद्धि वाले सविता देव के उस वरणीय एवं पूज्य धन की प्रार्थना करते हैं, जिस धन को वे हव्य देने वाले यजमान को अपने आप देते हैं. महान् सविता वह धन हमें प्रदान करें. (१) दिवो धर्त्ता भुवनस्य प्रजापति: पिशङ्गं द्रापिं प्रति मुञ्चते कवि:. विचक्षण: प्रथयन्नापृणन्वूर्वजीजनत्सविता सुन्ममुक्थ्यम्.. (२) स्वर्ग एवं अन्य सब लोकों को धारण करने वाले, प्रजाओं का पालन करने वाले एवं कवि सविता देव पीले रंग का कवच पहनते हैं. अनेक प्रकार से देखने वाले सविता प्रसिद्ध होकर भी जगत् को तेज से भरते हुए चलते हैं एवं प्रशंसा के योग्य सुख उत्पन्न करते हैं. (२) आप्रा रजांसि दिव्यानि पार्थिवा श्लोकं देव: कृणुते स्वाय धर्मणे. प्र बाहू अस्स्राक्सविता सवीमनि निवेशयन्प्रसुवन्नक्तुभिर्जगत्.. (३) सविता देव अपने तेज द्वारा पृथ्वीलोक एवं स्वर्गलोक को पूर्ण करते हुए अपने धारण eBook converter DEMO Watermarks*
कर्म की प्रशंसा करते हैं. वे अनुज्ञा रूप में भुजाएं फैलाते हैं एवं अपने प्रकाश से प्रतिदिन जगत् को अपने काम में लगाते हैं. (३) अदाभ्यो भुवनानि प्रचाकशद् व्रतानि देवः सविताभि रक्षते. प्रास्राग्बाहू भुवनस्य प्रजाभ्यो धृतव्रतो महो अज्मस्य राजति.. (४) सविता देव अन्य प्राणियों से पराजित न होते हुए सब लोकों को प्रकाशित करते हैं एवं सभी प्राणियों के व्रत की रक्षा करते हैं. वे विश्व की प्रजाओं के कल्याण के निमित्त अपनी भुजाओं को फैलाते हैं एवं व्रत धारण करने वाले इस महान् विश्व के स्वामी हैं. (४) त्रिरन्तरिक्षं सविता महित्वना त्री रजांसि परिभूस्त्रीणि रोचना. तिस्रो दिवः पृथिवीस्तिस्र इन्वति त्रिभिर्व्रतैरभि नो रक्षति त्मना.. (५) सविता देव अपने महत्त्व द्वारा सबको पराजित करते हुए तीनों अंतरिक्षों, तीनों लोकों एवं तीन तेजस्वी तत्त्वों—अग्नि, वायु और आदित्य, तीन स्वर्गों एवं तीन पृथ्वियों को व्याप्त करते हैं. वे तीन व्रतों द्वारा स्वयं हम सबका पालन करें. (५) बृहत्सुम्नः प्रसवीता निवेशनो जगतः स्थातुरुभयस्य यो वशी. स नो देवः सविता शर्म यच्छत्वस्मे क्षयाय त्रिवरूथमंहसः.. (६) पर्याप्त धन के स्वामी, कर्मों की अनुज्ञा देने वाले, सबके द्वारा गंतव्य एवं स्थावर जंगम दोनों को वश में रखने वाले सविता देव हमारे तीनों लोकों में स्थित पाप के नाश के हेतु हमें कल्याण प्रदान करें. (६) आगन्देव ऋतुभिर्वर्धतु क्षयं दधातु नः सविता सुप्रजामिषम्. स नः क्षपाभिरहभिश्च जिन्वतु प्रजावन्तं रयिमस्मे समिन्वतु.. (७) सविता देव ऋतुओं के साथ आवें, हमारे घरों की वृद्धि करें एवं हमें पुत्र-पौत्र से युक्त अन्न दें. वे रात और दिन हमारे प्रति प्रसन्न रहें एवं हमें पुत्र-पौत्र वाला धन प्रदान करें. (७) सूक्त—५४ देवता—सविता अभूद्देवः सविता वन्द्यो नु न इदानीमह उपवाच्यो नृभिः. वि यो रत्ना भजति मानवेभ्यः श्रेष्ठं नो अत्र द्रविणं यथा दधत्.. (१) उदित हुए सविता देव की हम शीघ्र ही वंदना करेंगे. मनुष्य इस समय अर्थात् प्रातः एवं तृतीय सवन में होतागण सूर्य की स्तुति करें. जो सविता मानवों को रक्त प्रदान करते हैं, वे हमें इस यज्ञ में उत्तम धन दें. (१) देवेभ्यो हि प्रथमं यज्ञियेभ्योऽमृतत्वं सुवसि भागमुत्तमम्.
आदिद्दामानं सवितर्व्यूर्णुषेऽनूचीना जीविता मानुषेभ्यः.. (२) हे सविता देव! तुम सर्वप्रथम यज्ञ के योग्य देवों के लिए अमरता का साधन सोम उत्पन्न करते हो. इसके बाद हव्यदाता यजमान को प्रकाशित करते हो तथा मनुष्यों को पिता, पुत्र व पौत्र के क्रम से जीवन देते हो. (२) अचित्ती यच्चकृमा दैव्ये जने दीनैर्दक्षैः प्रभूती पूरुषत्वता. देवेषु च सविर्तर्मानुषेषु च त्वं नो अत्र सुवतादनागसः.. (३) हे सविता देव! अज्ञान के कारण, दुर्बल अथवा शक्तिशाली लोगों के प्रमाद के कारण, ऐश्वर्य अथवा सेवा संबंधी गर्व के कारण तुम्हारे प्रति ही नहीं, देवों अथवा मनुष्यों के प्रति जो पाप हमने किया है, तुम हमें उस सब पाप से रहित बनाओ. (३) न प्रमिये सवितुर्देव्यस्य तद्यथा विश्वं भुवनं धारयिष्यति. यत्पृथिव्या वरिमन्ना स्वङ्गुरिर्वर्ष्मन्दिवः सुवति सत्यमस्य तत्.. (४) सविता देव का यह काम विरोध के योग्य नहीं है, क्योंकि वे सारे विश्व को धारण करते हैं. सुंदर उंगलियों वाले सविता धरती और आकाश को विस्तृत होने की प्रेरणा देते हैं. (४) इन्द्रज्येष्ठान्बृहद्द्रयः पर्वतेभ्यः क्षयाँ एभ्यः सुवसि पस्त्यावतः. यथायथा पतयन्तो वियेमिर एवैव तस्थुः सवितः सवाय ते.. (५) हे सविता देव! हम लोगों में इंद्र ही पूज्य हैं. तुम हमें पर्वतों से भी अधिक ऊंचा बनाओ एवं इन सब यजमानों को घर वाले निवासस्थान दो. इस प्रकार वे चलते समय तुम्हारे शासन में रहेंगे एवं तुम्हारी आज्ञा मानेंगे. (५) ये ते त्रिरहन्त्सवतः सवासो दिवेदिवे सौभगमासुवन्ति. इन्द्रो द्यावापृथिवी सिन्धुरद्भिरादित्यैर्नो अदितिः शर्म यंसत्.. (६) हे सविता! जो यजमान तुम्हारे निमित्त प्रतिदिन तीन बार सौभाग्यजनक सोमरस निचोड़ते हैं, इंद्र, धरती, आकाश, जलपूर्ण सिंधु एवं आदित्यों के साथ अदिति उस यजमान के साथ-साथ हमें भी धन दें. (६) सूक्त—५५ देवता—विश्वेदेव को वस्त्राता वसवः को वरूता द्यावाभूमी अदिते त्रासीथां नः. सहीयसो वरुण मित्र मर्तात्को वोऽध्वरे वरिवो धाति देवाः.. (१) हे वसुओ! तुम में रक्षा करने वाला कौन है एवं कौन दुःख दूर करने वाला है? हे अखंडनीय धरती आकाश! तुम हमारी रक्षा करो. हे इंद्र एवं ब्रह्म! तुम पराभवकारी लोगों से ebook converter DEMO Watermarks*
हमें बचाओ. हे देवो! तुम में से कौन धन का दान करता है? (१) प्र ये धामानि पूर्व्याण्यर्चान्वि यदुच्छान्वियोतारो अमूराः. विधातारो वि ते दधुरजस्रा ऋतधीतयो रुरुचन्त दस्माः.. (२) जो देव स्तुतिकर्त्ताओं को प्राचीन स्थान देते हैं, जो दुःखों को पृथक् करते हैं, जो मूढ़ताहीन हैं एवं अंधकार का नाश करते हैं, वे ही देव विधाता हैं एवं नित्य हमारी इच्छाएं पूरी करते हैं. सत्यकर्म वाले एवं दर्शनीय वे देव शोभित होते हैं. (२) प्र पस्त्या३मदितिं सिन्धुमर्कैः स्वस्तिमीळे सख्याय देवीम्. उभे यथा नो अहनी निपात उषासानक्ता करतामदब्धे.. (३) हम मित्रता प्राप्त करने के निमित्त सबके द्वारा गंतव्य देवमाता अदिति, सिंधु एवं स्वस्तिदेवी की मंत्रों द्वारा स्तुति करते हैं. धरती-आकाश हमारी भली-भांति रक्षा करें. रात एवं दिन के देव हमारी अभिलाषा पूर्ण करें. (३) व्यर्यमा वरुणश्चेति पन्थामिषस्पतिः सुवितं गातुमग्निः. इन्द्राविष्णू नृवदु षु स्तवाना शर्म नो यन्तममवद्वरूथम्.. (४) अर्यमा एवं वरुण हमारे लिए यज्ञ का मार्ग बताते हैं. हविरूप अन्न के स्वामी अग्नि हमें सुखकर गमन मार्ग दिखाते हैं. इंद्र एवं विष्णु भली प्रकार स्तुतियां सुनकर हमें पुत्र-पौत्रादि युक्त धन एवं शक्तिसंपन्न रमणीय सुख प्रदान करें. (४) आ पर्वतस्य मरुतामवांसि देवस्य त्रातुरव्रि भगस्य. पातपतिर्जन्यादंहसो नो मित्रो मित्रियादुत न उरुष्येत्.. (५) पर्वत, मरुद्गण तथा भग नामक देव से हम रक्षा की प्रार्थना करते हैं. स्वामी वरुण मानव संबंधी पाप से हमारी रक्षा करें. मित्र हमारी रक्षा हमको मित्र समझकर करें. (५) नू रोदसी अहिना बुध्य्नेन स्तुवीत देवी अप्येभिरिष्टैः. समुद्रं न संचरणे सनिष्यवो घर्मस्वरसो नद्यो३ अप व्रन्.. (६) हे द्यावा-पृथ्वी! जिस प्रकार धन चाहने वाला व्यक्ति सागर से उसके मध्य में जाने के लिए प्रार्थना करता है, उसी प्रकार हम भी इष्ट कार्य पूरा करने हेतु अहिर्बुध्न्य के साथ तुम्हारी स्तुति करते हैं. वे देव शब्द करती हुई नदियों को बहने योग्य बनावें. (६) देवैर्नो देव्यदितिर्नि पातु देवस्त्राता त्रायतामप्रयुच्छन्. नहि मित्रस्य वरुणस्य धासिमर्हामसि प्रमियं सान्वग्नेः.. (७) देवमाता अदिति अन्य देवों के साथ हमारी रक्षा करें. इंद्र प्रमादहीन होकर हमारा पालन ebook converter DEMO Watermarks*
करें. मित्र, वरुण एवं अग्नि के सोमरूप अन्न की हम हिंसा नहीं कर सकते. हम उन्हें अनुष्ठानों द्वारा बढ़ावेंगे. (७) अग्निरीशे वस्व्वस्याग्निर्महः सौभगस्य. तान्यस्मभ्यं रासते.. (८) अग्नि धन एवं महान् सौभाग्य के स्वामी हैं. वे हमें धन एवं सौभाग्य प्रदान करें. (८) उषो मघोन्या वह सूनृते वार्या पुरु. अस्मभ्यं वाजिनीवति.. (९) हे धनस्वामिनी, प्रिय-सत्य-रूप वाली एवं अन्नवती उषा! तुम हमें अधिक मात्रा में शोभन धन दो. (९) तत्सु नः सविता भगो वरुणो मित्रो अर्यमा. इन्द्रो नो राधसा गमत्.. (१०) सविता, भग, वरुण, मित्र, अर्यमा एवं इंद्र जिस धन के साथ आते हैं, वह धन वे सब हमें दें. (१०) सूक्त—५६ देवता—द्यावा-पृथ्वी मही द्यावापृथिवी इह ज्येष्ठे रुचा भवतां शुचयद्भिरर्कैः. यत्सीं वरिष्ठे बृहती विमिन्वन्नुवद्भोक्षा पप्रथानेभिरेवैः.. (१) हे महान् एवं विशाल द्यावा-पृथ्वी! इस यज्ञ में दीप्तियुक्त मंत्रों से तेजस्वी बनो, क्योंकि जल बरसाने वाले बादल विस्तृत एवं महान् धरती-आकाश को स्थापित करते हैं तथा गमनशील व प्रसिद्ध मरुतों के साथ सभी जगह गरजते हैं. (१) देवी देवेभिर्यजते यजत्रैरमिनती तस्थतुरुक्षमाणे. ऋतावरी अद्रुहा देवपुत्रे यज्ञस्य नेत्री शुचयद्भिरर्कैः.. (२) यज्ञ के योग्य, प्रजा की हिंसा न करने वाले, अभीष्ट वर्षा करने वाले, सत्यशील, द्रोहहीन, देवों को उत्पन्न करने वाले एवं यज्ञों के नेता धरती-आकाश यज्ञपात्र देवों के साथ मिलकर दीप्तिशाली मंत्रों को प्राप्त करें. (२) स इत्स्वपा भुवनेष्वास य इमे द्यावापृथिवी जजान. उर्वी गभीरे रजसी सुमेके अवंशे धीरः शच्या समैरत्.. (३) संसार में वही उत्तम कर्म वाला है, जिसने इस धरती-आकाश को उत्पन्न किया है एवं जिस धैर्यशाली ने विस्तृत, अचंचल, शोभन-रूप-युक्त एवं बिना आधार वाले धरती-आकाश को अपने कुशलतापूर्ण कार्यों द्वारा भली-भांति प्रेरित किया है. (३) ebook converter DEMO Watermarks*
नू रोदसी बृहद्भिर्नो वरूथैः पत्नीवद्भिरिषयन्ती सजोषाः. उरूची विश्वे यजते नि पातं धिया स्याम रथ्यः सदासाः.. (४) हे हमें अन्न देने को इच्छुक एवं परस्पर मिले हुए धरती-आकाश! तुम दोनों विस्तृत, फैले हुए एवं यज्ञ के योग्य होकर हमें पत्नी सहित विशाल धन दो तथा हमारी रक्षा करो. हम अपने यज्ञकर्मों के फल के कारण रथों एवं दासों के स्वामी बनें. (४) प्र वां महि द्यवी अभ्युपस्तुतिं भरामहे. शुची उप प्रशस्तये.. (५) हे द्युतिसंपन्न धरती-आकाश! तुम्हें लक्ष्य करके हम महान् स्तुति करेंगे. हम प्रार्थना करने के लिए तुम शुद्धों के समीप आते हैं. (५) पुनाने तन्वा मिथः स्वेन दक्षेण राजथः. ऊह्याथे सनादृतम्.. (६) हे दिव्य-गुण-सहित धरती-आकाश! तुम अपनी मूर्तियों एवं शक्तियों द्वारा एक-दूसरे को पवित्र करते हुए सुशोभित बनो एवं सदा यज्ञ को वहन करो. (६) मही मित्रस्य साधथस्तरन्ती पिप्रती ऋतम्. परि यज्ञं नि षेदथुः.. (७) हे महान् धरती-आकाश! तुम अपने मित्र स्तोता की अभिलाषा पूरी करो. तुम अन्न का विभाग एवं यज्ञ को पूर्ण करके चारों ओर बैठो. (७) सूक्त—५७ देवता—क्षेत्रपति आदि क्षेत्रस्य पतिना वयं हितेनेव जयामसि. गामश्वं पोषयित्न्वा स नो मृळातीदृशे.. (१) हम बंधु तुल्य क्षेत्रपति की सहायता से क्षेत्र को विजय करेंगे. वे हमारी गायों एवं घोड़ों को पुष्टि प्रदान करते हुए हमें इसी प्रकार सुखी करें. (१) क्षेत्रस्य पते मधुमन्तमूर्मिं धेनुरिव पयो अस्मासु धुक्ष्व. मधुश्चुतं घृतमिव सुपूतमृतस्य नः पतयो मृळयन्तु.. (२) हे क्षेत्रपति! गाएं जिस प्रकार दूध देती हैं, उसी प्रकार तुम मधु टपकाने वाला, घी के समान पवित्र एवं मधुर जल हमें दो. यज्ञ के स्वामी हमें सुखी करें. (२) मधुमतीरोषधीर्द्याव आपो मधुमन्नो भवत्वन्तरिक्षम्. क्षेत्रस्य पतिर्मधुमान्नो अस्त्वरिष्यन्तो अन्वेनं चरेम.. (३) ओषधियां, द्युलोक, जल-समूह, आकाश एवं क्षेत्रपति हमारे लिए मधुयुक्त हों. हम ebook converter DEMO Watermarks*
शत्रुओं की हिंसा से बचकर उनके पीछे चलें. (३) शुनं वाहाः शुनं नरः शुनं कृषतु लाङ्गलम्. शुनं वरत्रा बध्यन्तां शुनमष्ट्रामुदिङ्गय.. (४) हमारे बैल सुखपूर्वक भार वहन करें, सेवकगण सुखपूर्वक खेती का काम करें, हमारे हल सुखपूर्वक धरती जोतें, हमारी रस्सियां सुखपूर्वक बांधी जावें एवं पशुओं को हांकने वाला चाबुक सुखपूर्वक चलाया जावे. (४) शुनासीराविमां वाचं जुषेथां यदिवि चक्रथुः पयः. तेनेमामुप सिञ्चतम्.. (५) हे शुन एवं सीर! तुम हमारी स्तुति को स्वीकार करो. तुमने आकाश में जिस जल का निर्माण किया था, उसीसे तुम इस धरती को सींचो. (५) अर्वाची सुभगे भव सीते वन्दामहे त्वा. यथा नः सुभगाससि यथा नः सुफलाससि.. (६) हे सौभाग्यवती सीता अर्थात् हल की नोक! तुम धरती के नीचे जाओ. हम तुम्हारी वंदना करते हैं, जिससे तुम हमें शोभन फल एवं शोभन धन प्रदान करो. (६) इन्द्रः सीतां नि गृह्णातु तां पूषानु यच्छतु. सा नः पयस्वती दुहामुत्तरामुत्तरां समाम्.. (७) इंद्र सीता को ग्रहण करें एवं पूषा उसकी रक्षा करें. धरती जलपूर्ण बनकर हमें आने वाले वर्षों में फसलें दें. (७) शुनं नः फाला वि कृषन्तु भूमिं शुनं कीनाशा अभि यन्तु वाहैः. शुनं पर्जन्यो मधुना पयोभिः शुनासीरा शुनमस्मासु धत्तम्.. (८) हमारे फाल सुखपूर्वक धरती को जोतें. हलवाहे बैलों के साथ भी सुखपूर्वक चलें. बादल मधुर जल से धरती को सींचें. हे शुन एवं सीर! हमें सुख दो. (८) सूक्त—५८ देवता—अग्नि आदि समुद्रादूर्मिर्मधुमाँ उदारदुपांशुना सममृतत्वमानट्. घृतस्य नाम गुह्यं यदस्ति जिह्वा देवानांममृतस्य नाभिः.. (१) गायों के थन से दूध की मधु भरी धाराएं निकलती हैं. मनुष्य उनके कारण मरणरहित बनते हैं. घृत का नाम रक्षणीय इसीलिए है कि वह देवों की जीभ एवं अमृत का केंद्र है. (१) ebook converter DEMO Watermarks*
वयं नाम प्र ब्रवामा घृतस्यास्मिन्यज्ञे धारयामा नमोभिः. उप ब्रह्मा शृणवच्छस्यमानं चतुः शृङ्गोऽवमीद्गौर एतत्.. (२) हम यजमान घी की प्रशंसा करते हैं एवं उसे इस यज्ञ में आदरपूर्वक धारण करते हैं. ब्रह्मा इस स्तुति को सुनें. गौ देव इस संसार का पालन करते हैं. चारों वेद उनके सींगों के समान हैं. (२) चत्वारि शृङ्गा त्रयो अस्य पादा द्वे शीर्षे सप्त हस्तासो अस्य. त्रिधा बद्धो वृषभो रोरवीति महो देवो मर्त्याँ आ विवेश.. (३) यज्ञात्मक अग्नि के सींगों के समान चार वेद हैं. सवनों के रूप में इसके तीन चरण हैं. ब्रह्मोदन एवं प्रवर्ग्य के रूप में इसके दो सिर हैं. छंदों के रूप में इसके सात हाथ हैं. अभीष्टवर्षी ये अग्नि देवमंत्र, कल्प एवं ब्राह्मण इन तीन बंधनों से बंधे हैं एवं महान् शब्द करते हैं. वे महान् देव मानवों के बीच प्रविष्ट हैं. (३) त्रिधा हितं पणिभिर्गुह्यमानं गवि देवासो घृतमन्वविन्दन्. इन्द्र एकं सूर्य एकं जजान वेनादेकं स्वधया निष्टतक्षुः.. (४) असुरों ने गायों में दूध, दही एवं घी तीन पदार्थ छिपाए थे. देवों ने उन्हें खोज लिया. इंद्र एवं सूर्य ने एक-एक पदार्थ उत्पन्न किया. देवों ने कांतिपूर्ण अग्नि से घृत उत्पन्न किया. (४) एता अर्षन्ति हृद्यात्समुद्राच्छतव्रजा रिपुणा नावचक्षे. घृतस्य धारा अभि चाकशीमि हिरण्ययो वेतसो मध्य आसाम्.. (५) आकाश से असीमित गति वाला जल नीचे गिरता है. रोकने वाला शत्रु इसे नहीं देख सकता. हम उसे देख सकते हैं एवं उसके मध्य में छिपी अग्नि को भी देख सकते हैं. (५) सम्यक्स्रवन्ति सरितो न धेना अन्तर्हृदा मनसा पूयमानाः. एते अर्षन्त्युर्मयो घृतस्य मृगा इव क्षिपणोरीषमाणाः.. (६) प्रसन्नता देने वाली नदी के समान ही घी की धाराएं अग्नि पर गिरती हैं. वे हृदय के बीच रहने वाले मन द्वारा पवित्र हैं. व्याध के डर से जिस प्रकार हिरण भागते हैं, उसी प्रकार घी की धाराएं चलती हैं. (६) सिन्धोरिव प्राध्वने शूघनासो वातप्रमियः पतयन्ति यह्वाः. घृतस्य धारा अरुषो न वाजी काष्ठा भिन्दन्नूर्मिभिः पिन्वमानः.. (७) नदी का जल जिस प्रकार निचले स्थान की ओर तेजी से बहता है, उसी प्रकार घी की धाराएं सीमा को पार करके आगे बढ़ती हैं. (७) ebook converter DEMO Watermarks*
अभि प्रवन्त समनेव योषाः कल्याण्य१ः स्मयमानासो अग्निम्. घृतस्य धाराः समिधो नसन्त ता जुषाणो हर्यति जातवेदाः.. (८) जिस प्रकार कल्याणी नारी मुसकुराती हुई तन्मय चित्त से पति की ओर बढ़ती है, उसी प्रकार घी की धाराएं अग्नि की ओर जाती हैं. वे भली प्रकार दीप्त होकर मिलती हैं. अग्नि उन्हें सेवन करता हुआ उनकी कामना करता है. (८) कन्याइव वहतुमेतवा उ अञ्ज्यञ्जाना अभि चाकशीमि. यत्र सोमः सूयते यत्र यज्ञो घृतस्य धारा अभि तत्पवन्ते.. (९) हम देखते हैं कि जिस प्रकार कन्या पति के समीप जाने के लिए शृंगार करती है, उसी प्रकार घृत की धाराएं अग्नि के समीप जाने के लिए अपना रूप निखारती हैं, जिस स्थान पर सोम निचोड़ा जाता है अथवा यज्ञ आरंभ होता है, उसी स्थान की ओर घी की धाराएं चलती हैं. (९) अभ्यर्षत सुष्टुतिं गव्यमाजिमस्मासु भद्रा द्रविणानि धत्त. इमं यज्ञं नयत देवता नो घृतस्य धारा मधुमत्पवन्ते.. (१०) हे ऋत्विजो! गायों के समीप जाओ एवं उनकी शोभन स्तुति करो. वे हमको कल्याणकारी धन दें एवं हमारे इस यज्ञ को देवों के समीप ले जावें. घृत की धाराएं मधुरतापूर्वक चलती हैं. (१०) धामन्ते विश्वं भुवनमधि श्रितमन्तः समुद्रे हृद्य१न्तरायुषि. अपामनीके समिथे य आभृतस्तमश्याम मधुमन्तं त ऊर्मिम्.. (११) तुम्हारा तेज सारे विश्व में व्याप्त है. वह सागर में वाडवाग्नि, आकाश में सूर्य, हृदय में वैश्वानर, अन्न में आहार, जलों में विद्युत व संग्राम में वीरता के रूप में है. इस प्रकार सभी प्राणी तुम्हारे तेज के आश्रित हैं. उसकी घृतरूपी धारा का मधुर रस हम चखते हैं. (११) eBook converter DEMO Watermarks*
सूक्त—१ देवता—अग्नि
पंचम मंडल सूक्त—१ देवता—अग्नि अबोध्यग्निः समिधा जनानां प्रति धेनुमिवायतीमुषसम्. यह्वाइव प्र वयामुज्जिहानाः प्र भानवः सिस्रते नाकमच्छ.. (१) गाय के समान आने वाली उषा के पश्चात् अध्वर्यु आदि की समिधाओं द्वारा अग्नि प्रज्वलित होते हैं. अग्नि की शिखाएं महान् हैं. अग्नि विस्तृत शाखाओं वाले वृक्ष के समान आकाश की ओर बढ़ते हैं. (१) अबोधि होता यजथाय देवानूर्ध्वो अग्निः सुमनाः प्रातरस्थात्. समिद्धस्य रुशददर्शि पाजो महान्देवस्तमसो निरमोचि.. (२) होता अग्नि देवसंबंधीयज्ञ के निमित्त प्रज्वलित होते हैं. वे प्रातःकाल प्रसन्न मन से ऊपर की ओर उठते हैं. प्रज्वलित अग्नि का तेजस्वी बल दिखाई देता है. इस प्रकार महान् देव तम से मुक्त होते हैं. (२) यदीं गणस्य रशनामजीगः शुचिरङ्क्ते शुचिभिर्गोभिरग्निः. आद्दक्षिणा युज्यते वाजयन्त्युत्तानामूर्ध्वो अधयज्जुहूभिः.. (३) रस्सी के समान संसार के व्यापारों को रोकने वाले अंधकार को अग्नि जब ग्रहण करते हैं, तब वे दीप्त होकर उज्ज्वल किरणों से संसार को प्रकट करते हैं. इसके बाद अग्नि बढ़ी हुई एवं अन्न की कामना करने वाली घृत धारा से मिलते हैं एवं ऊपर उठकर लपटों से उन्हें पीते हैं. (३) अग्निमच्छा देवयतां मनांसि चक्षूंषीव सूर्ये सं चरन्ति. यदीं सुवाते उषसा विरूपे श्वेतो वाजी जायते अग्रे अह्नाम्.. (४) यजमानों का मन उसी प्रकार अग्नि के सम्मुख जाता है, जिस प्रकार प्राणियों की आंखें सूर्य की ओर जाती हैं. धरती-आकाश जब उषा के साथ अग्नि को उत्पन्न करते हैं, उस प्रातःकाल में अग्नि उत्तमवर्ण वाले घोड़ों के समान उत्पन्न होते हैं. (४) जनिष्ठ हि जेन्यो अग्रे अह्नां हितो हितेष्वरुषो वनेषु. ebook converter DEMO Watermarks*
दमेदमे सप्त रत्ना दधानोऽग्निर्होता नि षसादा यजीयान्.. (५) उत्पन्न करने योग्य अग्नि प्रातःकाल उत्पन्न होते हैं एवं दीप्तिशाली बनकर अपने मित्र वनों में स्थित होते हैं. उसके बाद अग्नि सात सुंदर ज्वालाएं धारण करते हैं एवं प्रत्येक यज्ञशाला में होता तथा यजनीय बनकर बैठते हैं. (५) अग्निहोता न्यसीदद्यजीयानुपस्थे मातुः सुरभा उ लोके. युवा कविः पुरुनिःष्ठ ऋतावा धर्ता कृष्टीनामृत मध्य इद्धः.. (६) अग्नि होता एवं यजनीय के रूप में धरती माता की गोद में बने एवं घृत आदि से सुगंधित वेदी नामक स्थान में बैठते हैं. युवा, कवि एवं अनेक स्थानों वाले अग्नि सबके धारक एवं यज्ञस्वामी बनकर यजमानों के बीच प्रज्वलित होते हैं. (६) प्र णु त्यं विप्रमध्वरेषु साधुमग्निं होतारमीळते नमोभिः. आ यस्ततान रोदसी ऋतेन नित्यं मृजन्ति वाजिनं घृतेन.. (७) यजमान मेधावी, यज्ञों का फल देने वाले एवं होता अग्नि की स्तुति वचनों द्वारा प्रशंसा करते हैं. जो अग्नि जल द्वारा नित्य धरती-आकाश का विस्तार करते हैं, यजमान उन अन्नयुक्त-अग्नि की सदा सेवा करते हैं. (७) मार्जाल्यो मृज्यते स्वे दमूनाः कविप्रशस्तो अतिथिः शिवो नः. सहस्रशृङ्गो वृषभस्तदोजा विश्वाँ अग्ने सहसा प्रास्यन्यान.. (८) सबको पवित्र करने वाले अग्नि अपने स्थान में पूजे जाते हैं. कवियों द्वारा प्रशंसित अग्नि हमारे लिए अतिथि के समान पूज्य एवं सुखकर हैं. अग्नि का प्रसिद्ध बल अपरिमित ज्वालाओं वाला, कामवर्षी एवं अन्य सबको पराभूत करने वाला है. (८) प्र सद्यो अग्ने अत्येष्यन्यानाविर्यस्मै चारुतमो बभूथ. ईळेन्यो वपुष्यो विभावा प्रियो विशामतिथिर्मानुषीणाम्.. (९) हे अग्नि! तुम यज्ञ को प्राप्त करके अपने अन्य तेजों को पराजित करते हुए उत्पन्न होते हो. तुम स्तुतियोग्य, दीप्तिकारक, उज्ज्वल, प्राणियों के प्रिय एवं मानवों के अतिथि हो. (९) तुभ्यं भरन्ति क्षितयो यविष्ठ बलिमग्ने अन्तित ओत दूरात्. आ भन्दिष्ठस्य सुमतिं चिकिद्धि बृहत्ते अग्ने महि शर्म भद्रम्.. (१०) हे अतिशय युवा अग्नि! मानव-समूह पास एवं दूर से तुम्हें बलि देते हैं. तुम अतिशय स्तुतिकर्त्ता की स्तुति स्वीकार करते हो. हे अग्नि! तुम्हारे द्वारा दिया हुआ सुख महान् एवं कल्याणकारी है. (१०) ebook converter DEMO Watermarks*
आद्य रथं भानुमो भानुमन्तमग्ने तिष्ठ यजतेभिः समन्तम्. विद्वान्पथीनामुरुवं १न्तरिक्षमेह देवान्हविर्द्याय वक्षि.. (११) हे तेजस्वी अग्नि! तुम आज देवों के साथ दीप्तिशाली एवं सर्वांग सुंदर रथ पर चढ़ो. मार्गों को जानने वाले तुम विशाल आकाश में होकर देवों को हव्य भक्षण के लिए यहां लाते हो. (११) अवोचाम कवये मेध्याय वचो वन्दारु वृषभाय वृष्णे. गविष्ठिरो नमसा स्तोममग्नौ दिवीव रुक्ममुरुव्यञ्चमश्रेत्.. (१२) हम मेधावी, पवित्र, कामवर्षी व युवा अग्नि के निमित्त वंदनापूर्ण स्तोत्र बोलते हैं. गविष्ठिर ऋषि आकाश में दीप्त एवं विस्तृत गति वाले आदित्य के समान अग्नि के प्रति नमस्कारपूर्ण स्तुति बोलते हैं. (१२) सूक्त—२ देवता—अग्नि कुमारं माता युवतिः समुब्धं गुहा बिभर्ति न ददाति पित्रे. अनीकमस्य न मिनज्जनासः पुरः पश्यन्ति निहितमरतौ.. (१) युवती माता ने कुमार को रास्ते में चलते समय घायल हो जाने पर गुफा में रखा, उसके पिता को नहीं दिया, लोग उसके हिंसित रूप को नहीं देखते हैं, किंतु असुंदर स्थान में रखा हुआ देखते हैं. (१) कमेतं त्वं युवते कुमारं पेषी बिभर्षि महिषी जजान. पूर्वीर्हि गर्भः शरदो ववर्धापश्यं जातं यदसूत माता.. (२) हे युवती! तुम हिंसा करने वाली होकर भी कुमार को क्यों धारण करती हो? पूजनीया अरणि ने अग्निरूपी कुमार को जन्म दिया है. अरणि में गर्भरूप अग्नि कई वर्ष तक बढ़ते रहे. माता ने जिस पुत्र को जन्म दिया, उसे हमने देखा. (२) हिरण्यदन्तं शुचिवर्णमारात्क्षेत्रादपश्यमायुधा मिमानम्. ददानो अस्मा अमृतं विप्रृक्वत्किं मामनिन्द्राः कृणवन्ननुक्थाः.. (३) हमने सुनहरी ज्वालारूपी दांतों वाले, उज्ज्वल-वर्ण एवं आयुधों के समान ज्वालाएं बनाने वाले अग्नि को देखा. हमने अग्नि की अविनाशी एवं सर्वव्यापिनी स्तुति की है. इंद्र के विरोधी एवं स्तुति न करने वाले हमारा क्या कर सकते हैं? (३) क्षेत्रादपश्यं सनुतश्चरन्तं सुमद्यूथं न पुरु शोभमानम्. न ता अगृभ्रन्नजनिष्ट हि षः पलिक्रीरिद्युवतयो भवन्ति.. (४) ebook converter DEMO Watermarks*
हमने क्षेत्र में गोसमूह के समान चुपचाप घूमते हुए एवं स्वयं अधिक रूप से सुशोभित अग्नि को देखा है. लोग पिशाची के आक्रमण के समय वाली अग्नि की पीली ज्वालाओं को स्वीकार नहीं करते, अग्नि पुनः उत्पन्न हुए एवं उनकी वृद्धा ज्वालाएं युवा बन गईं. (४) के मे मर्दकं वि यवन्त गोभिर्न येषां गोपा अरणश्चिदास. य ईं जगृभुरव ते सृजन्त्वाजाति पश्च उप नश्चिकित्त्वान्.. (५) हमारे राष्ट्र को गायों से पृथक् किसने किया था? क्या उन गायों के साथ रक्षक नहीं था? हमारे राष्ट्र पर अधिकार करने वाले लोग नष्ट हों. हमारी अभिलाषा को जानने वाले अग्नि हमारे पशुओं को निकट लावें. (५) वसां राजानं वसतिं जनानामरातयो नि दधुर्मर्त्येषु. ब्रह्माण्यत्रे रव तं सृजन्तु निन्दितारो निन्द्यासो भवन्तु.. (६) प्राणियों के राजा एवं मानवों के निवासस्वरूप अग्नि को शत्रुओं ने प्रजाओं में छिपाकर रखा है. अत्रिगोत्र वाले वृक्ष के स्तोत्र अग्नि को उजागर करें एवं हमारे निंदक निंदा के पात्र बनें. (६) शुनश्चिच्छेपं निदितं सहस्राद्यूपादमुञ्चो अशमिष्ट हि षः. एवास्मदग्ने वि मुमुग्धि पाशान्होतश्चिकित्व इह तू निषद्य.. (७) हे अग्नि! तुमने भली प्रकार बंधे हुए शुनःशेप ऋषि को हजारों रूप वाले यूप से छुड़ाया था, क्योंकि उसने तुम्हारी स्तुति की थी. हे होता एवं ज्ञानसंपन्न अग्नि! इस वेदी पर बैठो एवं हमें सभी बंधनों से मुक्त करो. (७) हृणीयमानो अप हि मदैयेः प्र मे देवानां व्रतपा उवाच. इन्द्रो विद्वाँ अनु हि त्वा चचक्ष तेनाहमग्ने अनुशिष्ट आगाम्.. (८) हे अग्नि! तुम क्रुद्ध होने पर हमारे पास से चले जाते हो. देवों का व्रत पालन करने वाले इंद्र ने हमसे यह कहा था. विद्वान् इंद्र ने तुम्हें देखा था. हे अग्नि! उनके अनुशासन में रहकर हम तुम्हारे समीप आवेंगे. (८) वि ज्योतिषा बृहता भात्यग्निरविर्विश्वानि कृणुते महित्वा. प्रादेवीर्मायाः सहते दुरेवाः शिशीते शृङ्गे रक्षसे विनिक्षे.. (९) अग्नि महान् तेज द्वारा विशेष प्रकार से चमकते हैं. एवं अपनी महिमा द्वारा सभी पदार्थों को प्रकट करते हैं. वे प्रज्वलित होकर आसुरी दुःखजनक माया को नष्ट करते हैं एवं राक्षसों को नष्ट करने हेतु ज्वलारूपी सींगों को पैना बनाते हैं. (९) उत स्वानासो दिवि षन्त्वग्नेस्तिग्मायुधा रक्षसे हन्तवा उ. ebook converter DEMO Watermarks*
मदे चिदस्य प्र रुजन्ति भामा न वरन्ते परिबाधो अदेवीः.. (१०) शब्द करने वाली अग्नि की ज्वालाएं तीखे आयुधों के समान राक्षसों को नष्ट करने के लिए स्वर्ग में उत्पन्न होती हैं. हर्षित होने पर अग्नि का प्रकाश राक्षसों को पीड़ा देता है. बाधा पहुंचाने वाली असुर-सेना अग्नि को नहीं रोक पाती. (१०) एतं ते स्तोमं तुविजात विप्रो रथं न धीरः स्वपा अतक्षम्. यदीदग्ने प्रति त्वं देव हर्याः स्वर्वतीरप एना जयेम.. (११) हे अनेकरूप-धारक अग्नि! धीर एवं शोभन कर्म वाले लोग जिस प्रकार रथ बनाते हैं, उसी प्रकार हम स्तोताओं ने तुम्हारे लिए स्तुतियां बनाई हैं. हे अग्नि! यदि तुम इसे स्वीकार कर लो तो हम विस्तृत जय प्राप्त करेंगे. (११) तुविग्रीवो वृषभो वावृधानोऽशत्र्वर्यः समजाति वेदः. इतीममग्निममृता अवोचन्बर्हिष्मते मनवे शर्म यंसद्धविष्मते मनवे शर्म यंसत्.. (१२) अनेक ज्वालाओं वाले, कामवर्षी एवं बढ़ते हुए अग्नि अबाध रूप से शत्रु के धन पर अधिकार करते हैं. यह बात देवों ने अग्नि से कही थी. वे यज्ञ करने वाले एवं हवि देने वाले लोगों को सुख दें. (१२) सूक्त—३ देवता—अग्नि त्वमग्ने वरुणो जायसे यत्त्वं मित्रो भवसि यत्समिद्धः. त्वे विश्वे सहसस्पुत्र देवास्त्वमिन्द्रो दाशुषे मर्त्याय.. (१) हे अग्नि! तुम उत्पन्न होते ही वरुण, (अंधकार निवारक एवं प्रज्वलित) होकर मित्र (हितकारी) बन जाते हो. सब देवगण तुम्हारे पीछे चलते हैं. हे बल के पुत्र! हव्य देने वाले यजमान के इंद्र तुम्हीं हो. (१) त्वमर्यमा भवसि यत्कनीनां नाम स्वधावन्गुह्यं बिभर्षि. अञ्जन्ति मित्रं सुधितं न गोभिर्यद्दम्पती समनसा कृणोषि.. (२) हे अग्नि! तुम कन्याओं के लिए अर्यमा (नियमन करने वाले) बनते हो. हे स्वधावान् अग्नि! तुम ही गोपनीय नाम 'वैश्वानर' धारण करते हो. जब तुम पति-पत्नी को एक मन वाला बना देते हो, तब वे तुम्हें मित्र मानकर गाय के दूध-घी से सींचते हैं. (२) तव श्रिये मरुतो मर्जयन्त रुद्र यत्ते जनिम चारु चित्रम्. पदं यद्विष्णोरुपमं निधायि तेन पासि गुह्यं नाम गोनाम्.. (३) हे अग्नि! तुम्हारे बैठने के लिए मरुद्गण अंतरिक्ष को साफ करते हैं. हे इंद्र! तुम्हारे ebook converter DEMO Watermarks*