भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 764, कुल 1855 में से

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कर्म की प्रशंसा करते हैं. वे अनुज्ञा रूप में भुजाएं फैलाते हैं एवं अपने प्रकाश से प्रतिदिन जगत् को अपने काम में लगाते हैं. (३) अदाभ्यो भुवनानि प्रचाकशद् व्रतानि देवः सविताभि रक्षते. प्रास्राग्बाहू भुवनस्य प्रजाभ्यो धृतव्रतो महो अज्मस्य राजति.. (४) सविता देव अन्य प्राणियों से पराजित न होते हुए सब लोकों को प्रकाशित करते हैं एवं सभी प्राणियों के व्रत की रक्षा करते हैं. वे विश्व की प्रजाओं के कल्याण के निमित्त अपनी भुजाओं को फैलाते हैं एवं व्रत धारण करने वाले इस महान् विश्व के स्वामी हैं. (४) त्रिरन्तरिक्षं सविता महित्वना त्री रजांसि परिभूस्त्रीणि रोचना. तिस्रो दिवः पृथिवीस्तिस्र इन्वति त्रिभिर्व्रतैरभि नो रक्षति त्मना.. (५) सविता देव अपने महत्त्व द्वारा सबको पराजित करते हुए तीनों अंतरिक्षों, तीनों लोकों एवं तीन तेजस्वी तत्त्वों—अग्नि, वायु और आदित्य, तीन स्वर्गों एवं तीन पृथ्वियों को व्याप्त करते हैं. वे तीन व्रतों द्वारा स्वयं हम सबका पालन करें. (५) बृहत्सुम्नः प्रसवीता निवेशनो जगतः स्थातुरुभयस्य यो वशी. स नो देवः सविता शर्म यच्छत्वस्मे क्षयाय त्रिवरूथमंहसः.. (६) पर्याप्त धन के स्वामी, कर्मों की अनुज्ञा देने वाले, सबके द्वारा गंतव्य एवं स्थावर जंगम दोनों को वश में रखने वाले सविता देव हमारे तीनों लोकों में स्थित पाप के नाश के हेतु हमें कल्याण प्रदान करें. (६) आगन्देव ऋतुभिर्वर्धतु क्षयं दधातु नः सविता सुप्रजामिषम्. स नः क्षपाभिरहभिश्च जिन्वतु प्रजावन्तं रयिमस्मे समिन्वतु.. (७) सविता देव ऋतुओं के साथ आवें, हमारे घरों की वृद्धि करें एवं हमें पुत्र-पौत्र से युक्त अन्न दें. वे रात और दिन हमारे प्रति प्रसन्न रहें एवं हमें पुत्र-पौत्र वाला धन प्रदान करें. (७) सूक्त—५४ देवता—सविता अभूद्देवः सविता वन्द्यो नु न इदानीमह उपवाच्यो नृभिः. वि यो रत्ना भजति मानवेभ्यः श्रेष्ठं नो अत्र द्रविणं यथा दधत्.. (१) उदित हुए सविता देव की हम शीघ्र ही वंदना करेंगे. मनुष्य इस समय अर्थात् प्रातः एवं तृतीय सवन में होतागण सूर्य की स्तुति करें. जो सविता मानवों को रक्त प्रदान करते हैं, वे हमें इस यज्ञ में उत्तम धन दें. (१) देवेभ्यो हि प्रथमं यज्ञियेभ्योऽमृतत्वं सुवसि भागमुत्तमम्.

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