ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 763, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंयावयद् द्वेषसं त्वा चिकित्त्वत्सूनृतावरि. प्रति स्तोमैरभुत्स्महि.. (४) हे सत्य वचन वाली एवं शत्रुओं को दूर भगाने वाली उषा! हम स्तुतियों द्वारा तुझ ज्ञान कराने वाली को जगाते हैं. (४) प्रति भद्रा अदृक्षत गवां सर्गा न रश्मय:. ओषा अप्रा उरु ज्रय:.. (५) प्रशंसा के योग्य किरणें दिखाई देती हैं. उषा ने संसार को वर्षा की धारा के समान तेज से भर दिया है. (५) आपप्रुषी विभावरि व्यावर्ज्योतिषा तम:. उषो अनु स्वधामव.. (६) हे कांतिशालिनी उषा! तुम जगत् को तेज से पूर्ण करती हुई अंधकार को दूर भगाओ. इसके पश्चात् हविरूपी अन्न की रक्षा करो. (६) आ द्यां तनोषि रश्मिभिरान्तरिक्षनमुरु प्रियम्. उष: शुक्रेण शोचिषा.. (७) हे उषा! तुम दीप्त आकाश से युक्त होकर किरणों द्वारा स्वर्ग एवं प्रिय अंतरिक्ष को व्याप्त करो. (७) सूक्त—५३ देवता—सविता तद्देवस्य सवितुर्वार्थ महद्वृणीमहे असुरस्य प्रचेतस:. छर्दिर्येन दाशुषे यच्छति त्मना तन्नो महाँ उदयान्देवो अक्तुभि:.. (१) हम बलशाली एवं उत्तम बुद्धि वाले सविता देव के उस वरणीय एवं पूज्य धन की प्रार्थना करते हैं, जिस धन को वे हव्य देने वाले यजमान को अपने आप देते हैं. महान् सविता वह धन हमें प्रदान करें. (१) दिवो धर्त्ता भुवनस्य प्रजापति: पिशङ्गं द्रापिं प्रति मुञ्चते कवि:. विचक्षण: प्रथयन्नापृणन्वूर्वजीजनत्सविता सुन्ममुक्थ्यम्.. (२) स्वर्ग एवं अन्य सब लोकों को धारण करने वाले, प्रजाओं का पालन करने वाले एवं कवि सविता देव पीले रंग का कवच पहनते हैं. अनेक प्रकार से देखने वाले सविता प्रसिद्ध होकर भी जगत् को तेज से भरते हुए चलते हैं एवं प्रशंसा के योग्य सुख उत्पन्न करते हैं. (२) आप्रा रजांसि दिव्यानि पार्थिवा श्लोकं देव: कृणुते स्वाय धर्मणे. प्र बाहू अस्स्राक्सविता सवीमनि निवेशयन्प्रसुवन्नक्तुभिर्जगत्.. (३) सविता देव अपने तेज द्वारा पृथ्वीलोक एवं स्वर्गलोक को पूर्ण करते हुए अपने धारण eBook converter DEMO Watermarks*