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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

सूक्त—११४ देवता—पवमान सोम

यत्रानन्दाश्च मोदाश्च मुदः प्रमुद आसते. कामस्य यत्राप्ताः कामास्तत्र माममृतं कृधीन्द्रायेन्दो परि स्रव.. (११) हे सोम! जिस लोक में आनंद, मोह और सुख रहते हैं व जहां सब अभिलाषाएं पूरी हो जाती हैं, वहां मुझे मरणरहित बनाओ एवं इंद्र के लिए अपना रस नीचे गिराओ. (११) सूक्त—११४ देवता—पवमान सोम य इन्डोः पवमानस्यान् धामान्यक्रमीत्. तमाहुः सुप्रजा इति यस्ते सीमाविधन्मन इन्द्रायेन्दो परि स्रव.. (१) शुद्ध होते हुए सोम के तेज का जो ब्राह्मण अनुगमन करता है, लोग उसे शोभन प्रजा वाला कहते हैं. जो अपना मन सोम के अनुकूल बना लेता है, उसे भी भाग्यशाली कहते हैं. हे सोम! तुम इंद्र के लिए रस टपकाओ. (१) ऋषे मन्त्रकृतां स्तोमैः कश्यपोर्द्ध्वयन्गिरः. सोमं नमस्य राजानं यो जज्ञे वीरुधां पतिरिन्द्रायेन्दो परि स्रव.. (२) हे कश्यप ऋषि! मंत्ररचना करने वालों की स्तुतियों के आधार पर अपने वचनों को बढ़ाते हुए राजा सोम को नमस्कार करो. सोम वनस्पतियों के पालक के रूप में उत्पन्न हुए हैं. हे सोम! तुम इंद्र के लिए टपको. (२) सप्त दिशो नानासूर्याः सप्त होतार ऋत्विजः. देवा आदित्या ये सप्त तेभिः सोमाभि रक्ष न इन्द्रायेन्दो परि स्रव.. (३) हे सोम! ये जो सात दिशाएं सूर्य का आश्रय हैं, होम करने वाले जो सात ऋत्विज् हैं तथा आदित्य आदि जो सात सूर्य हैं, उनके साथ मिलकर हमारी रक्षा करो. हे सोम! इंद्र के लिए रस टपकाओ. (३) यत्ते राजञ्छृतं हविस्तेन सोमाभि रक्ष नः. अरातीवा मा नस्तारीन्मो च नः किं चनाममदिन्द्रायेन्दो परि स्रव.. (४) हे राजा सोम! तुम्हारे लिए जो हवि पकाया गया है, उससे हमारी रक्षा करो. शत्रु हमारा वध न करे एवं हमारा धन आदि कुछ भी नष्ट न करें. तुम इंद्र के लिए रस टपकाओ. (४) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—१ देवता—अग्नि

दशम मंडल सूक्त—१ देवता—अग्नि अग्रे बृहन्नुषसामूर्ध्वो अस्थान्निर्जगन्वान्तमसो ज्योतिषागात्. अग्निर्भानुना रुशता स्वङ्ग आ जातो विश्वा सद्मान्यप्राः.. (१) महान् अग्नि प्रातःकाल में प्रज्वलित होकर ज्वाला के रूप में रहते हैं एवं अंधकार से निकलकर अपने तेज के द्वारा यज्ञस्थल में जाते हैं. शोभन ज्वालाओं वाले एवं यज्ञ के लिए उत्पन्न अग्नि अपने अंधकारनाशक तेज के द्वारा सभी यज्ञगृहों को पूर्ण करते हैं. (१) स जातो गर्भो असि रोदस्योरग्ने चारुर्विभृत ओषधीषु. चित्रः शिशुः परि तमांस्यक्तून्प्र मातृभ्यो अधि कनिक्रदद्गाः.. (२) हे उत्पन्न, कल्याणकारक व अरणियों के मध्य विशेषरूप से मथित अग्नि! तुम द्यावा- पृथिवी के गर्भ हो. हे विचित्र रंग वाले एवं वृक्षों के बालक अग्नि! तुम अपने तेज से अंधकार रूप शत्रु को हराते हो. तुम माता के समान वनस्पतियों में शब्द करते हुए जन्म लेते हो. (२) विष्णुरित्था परममस्य विद्वाञ्जातो बृहन्नभि पाति तृतीयम्. आसा यदस्य पयो अक्रत स्वं सचेतसो अभ्यर्चन्त्यत्र.. (३) जानते हुए, उत्पन्न, महान् एवं व्यापक अग्नि मुझ त्रित ऋषि की रक्षा करें. अपने मुख द्वारा अग्नि से जल की याचना करने वाले यजमान तन्मय होकर अग्नि की पूजा करते हैं. (३) अत उ त्वा पितुभृतो जनित्रीरन्नावृधं प्रति चरन्त्यन्नैः. ता ईं प्रत्येषि पुनरन्यरूपा असि त्वं विक्षु मानुषीषु होता.. (४) हे अन्नवर्धक अग्नि! सारे संसार को धारण करने वाली और उत्पन्न करने वाली ओषधियां अन्न के कारण तुम्हारी सेवा करती हैं. तुम सूखे वृक्षों के पास दावाग्नि के रथ में जाते हो. तुम मानव प्रजाओं के होता हो. (४) होतारं चित्ररथमध्वरस्य यज्ञस्य यज्ञस्य केतुं रुशन्तम्. प्रत्यर्धिं देवस्य देवस्य मह्ना श्रिया त्वग्निमतिथिं जनानाम्.. (५) ebook converter DEMO Watermarks*

हम संपत्ति पाने के लिए देवों को बुलाने वाले, विविध रूप रथ वाले, झंडे के समान यज्ञ के ज्ञापक, श्वेत वर्ण वाले, अपनी महत्ता से इंद्र के पास जाने वाले एवं यजमानों के पूज्य अग्नि की शीघ्र स्तुति करते हैं. (५) स तु वस्त्राण्यध पेशनानि वसानो अग्निर्नाभा पृथिव्याः. अरुषो जातः पद इळायाः पुरोहितो राजन्यक्षीह देवान्.. (६) हे दीप्तिशाली अग्नि! तुम अपने सोने के समान तेजों को धारण करते हुए धरती की नाभि के समान उत्तर वेदी पर उत्पन्न हो. तुम शोभा धारण करके एवं पूर्व दिशा में स्थित होकर देवों की पूजा करो. (६) आ हि द्यावापृथिवी अग्न उभे सदा पुत्रो न मातरा ततन्थ. प्र याह्यच्छोशतो यविष्ठाथा वह सहस्येह देवान्.. (७) हे अग्नि! जिस प्रकार पुत्र माता-पिता को धनों से बढ़ाता है, उसी प्रकार तुम सदा द्यावा-पृथिवी दोनों का विस्तार करते हो. हे अतिशय युवा अग्नि! तुम अपने अभिलाषी लोगों को लक्ष्य करके जाओ. हे शक्तिपुत्र अग्नि! इस यज्ञ में देवों को लाओ. (७) सूक्त—२ देवता—अग्नि पिप्रीहि देवाँ उशतो यविष्ठ विद्वाँ ऋतूँर्रुतूपते यजेह. ये दैव्या ऋत्विजस्तेभिरग्ने त्वं होतॄणामस्यायजिष्ठः.. (१) हे अतिशय युवा अग्नि! तुम स्तुतियां सुनने के अभिलाषी देवों को प्रसन्न करो. हे देवयज्ञों के समय के स्वामी अग्नि! इस यज्ञ में तुम यज्ञ के समयों को जानकर देवों की पूजा करो. हे होताओं में श्रेष्ठ अग्नि! तुम देवों के पुरोहितों के साथ देवों की पूजा करो. (१) वेषि होत्रमुत पोत्रं जनानां मन्धातासि द्रविणोदा ऋतावा. स्वाहा वयं कृणवामा हवींषि देवो देवान्यजत्वग्निरर्हन्.. (२) हे धन देने वाले तथा सत्ययुक्त अग्नि! तुम होता और पोता द्वारा की हुई स्तुतियों की कामना करते हो तथा मेधावी हो. हम स्वाहा शब्द के साथ देवों को जो हवि देते हैं, उससे दीप्तिशाली एवं प्रशंसनीय अग्नि देवों की पूजा करें. (२) आ देवानाामपि पन्थामगन्म यच्छक्नवाम तदनु प्रवोळ्हम्. अग्निर्विद्वान्त्स यजात्सेदु होता सो अध्वरान्त्स ऋतून्कल्पयाति.. (३) हम देवों के मार्ग अथवा वेद-पथ पर चलें. हम जो भी कार्य आरंभ करें, उसे भली प्रकार समाप्त कर सकें. वेद का मार्ग जानने वाले अग्नि वेदों की पूजा करें. मानवों के होता ebook converter DEMO Watermarks*

अग्नि यज्ञों को करें एवं उनका समय निश्चित करें. (३) यद्वो वयं प्रमिनाम व्रतानि विदुषां देवा अविदुष्टरासः. अग्निष्टद्विश्वमा पृणाति विद्वान्येभिर्देवाँ ऋतुभिः कल्पयाति.. (४) हे देवो! आप अतिशय धनवान् हैं और हम अज्ञानी हैं. हमने आपसे संबंधित कर्म त्याग दिए हैं, इसे आप जानते हैं. इस बात को जानने वाले अग्नि हमारे सभी कर्मों को पूर्ण करें. अग्नि यज्ञ के योग्य समयों के द्वारा देवों को समर्थ बनाते हैं. (४) यत्पाकत्रा मनसा दीनदक्षा न यज्ञस्य मन्वते मर्त्यासः. अग्निष्टद्धोता क्रतुविद्विजानन्यजिष्ठो देवाँ ऋतुशो यजाति.. (५) दुर्बल मनुष्य ज्ञानरहित होने के कारण जिन यज्ञकर्मों को नहीं जानते, होता एवं अतिशय यज्ञकर्त्ता अग्नि उनको जानते हैं. वे यज्ञ के योग्य समय में देवों का यज्ञ करें. (५) विश्वेषां ह्यध्वराणामनीकं चित्रं केतुं जनिता त्वा जजान. स आ यजस्व नृवतीरनू क्षाःस्पार्हा इषः क्षुमतीर्विश्वजन्याः.. (६) हे अग्नि! विधाता ने तुम्हें सभी यज्ञों के प्रधान, नाना रूप एवं ज्ञापक के रूप में उत्पन्न किया है. तुम हमें दासों से युक्त भूमि दो. हे अभिलाषा योग्य अग्नि! तुम हमें स्तुतिमंत्रों से युक्त और सर्व हितकारी अन्न दो. (६) यं त्वा द्यावापृथिवी यं त्वापस्त्वष्टा यं त्वा सुजनिमा जजान. पन्थामनु प्रविद्वान्पितृयाणं द्युमदग्ने समिधानो वि भाहि.. (७) हे अग्नि! द्यावा-पृथिवी और अंतरिक्ष ने तुम्हें जन्म दिया. शोभन जन्म वाले प्रजापति ने तुम्हें उत्पन्न किया. हे पितृमार्ग जानने वाले एवं प्रज्वलित अग्नि! तुम दीप्तिशाली होकर विराजते हो. (७) सूक्त—३ देवता—अग्नि इनो राजन्रतिः समिद्धो रौद्रो दक्षाय सुषुमाँ अदर्शि. चिकिद्धि भाति भासा बृहतासिक्रीमेति रुशतीमपाजन्.. (१) हे दीप्तिशाली, सबके स्वामी, देवों के पास हवि लेकर जाने वाले, प्रज्वलित, शत्रुओं के लिए भयानक एवं वनस्पतियों में स्थित अग्नि! तुम्हें लोग यजमानों की धनवृद्धि के लिए देखते हैं. सबको जानने वाले अग्नि विशेष रूप से दीप्ति धारण करते हैं तथा अपने महान् तेज के द्वारा श्वेत वर्ण की दीप्ति फैलाते हुए जाते हैं. (१) कृष्णां यदेनीमभि वर्पसा भूज्जनयन्योषां बृहतः पितुर्जाम्.

ऊर्ध्वं भानुं सूर्यस्य स्तभायन्दिवो वसुभिररतिर्वि भाति.. (२) अग्नि विश्व के पालक सूर्य से उत्पन्न उषा को उत्पन्न करते हुए अपनी ज्वालाओं से काली रात को पराजित करते हैं. गमनशील अग्नि स्वर्ग में फैलने वाली अपनी किरणों द्वारा सूर्य के प्रकाश को ऊपर रोकते हुए विशेषरूप से चमकते हैं. (२) भद्रो भद्रया सचमान आगात्स्वसारं जारो अभ्येति पश्चात्. सुप्रकेतैर्द्युभिरग्निर्विष्ठन्नुशद्भिर्वर्णैरभि राममस्थात्.. (३) दीप्त उषा द्वारा सेवित कल्याणकारी अग्नि आए. इसके शत्रुओं को नष्ट करने वाले अग्नि, अपनी बहिन उषा के पास जाते हैं. अपने शोभन ज्ञानों और दीप्त तेजों के साथ स्थित अग्नि अपने निवारक श्वेत वर्ण के तेजों द्वारा काले अंधकार को मिटाते हैं. (३) अस्य यामासो बृहतो न वग्नूनिन्धाना अग्नेः सख्युः शिवस्य. ईड्यस्य वृष्णो बृहतः स्वासो भामासो यामन्नक्तवश्विकित्रे.. (४) महान् अग्नि की दीप्तियुक्त किरणें स्तुतिकर्त्ताओं को बाधा नहीं पहुंचातीं सखा, कल्याणकर्त्ता, स्तुतिमय, अभिलाषापूरक, महान् एवं शोभन मुख वाले अग्नि की किरणें तीक्ष्ण होकर तप्त करने के लिए देवों के पास जाती हैं एवं प्रसिद्ध होती हैं. (४) स्वना न यस्य भामासः पवन्ते रोचमानस्य बृहतः सुदिवः. ज्येष्ठेभिर्यस्तेजिष्ठैः क्रीळुमद्भिर्वर्षिष्ठेभिर्भानुभिर्नक्षति द्याम्.. (५) तेजस्वी, महान् और शोभन दीप्ति वाले अग्नि की किरणें शब्द करती हुई जाती हैं. अग्नि अपने अत्यंत प्रशंसनीय, परम तेजस्वी, क्रीड़ा करने वाले एवं अधिक बड़े तेजों के द्वारा स्वर्ग को व्याप्त करते हैं. (५) अस्य शुष्मासो ददृशानपवेर्जेहमानस्य स्वनयन्नियुद्भिः. प्रत्नेभिर्यो रुशद्भिर्देवतमो वि रेभद्भिररतिर्भाति विश्वा.. (६) दीप्तिशाली शस्त्रों वाले और देव लोक में गमन की इच्छा वाले अग्नि की किरणें शोषक बनकर शब्दायमान हैं एवं देवों में प्रमुख गमनशील अग्नि श्वेतवर्ण होकर अपनी दीप्ति बिखेरते हैं. (६) स आ वक्षि महि न आ च सत्सि दिवस्पृथिव्योररतिर्युवत्योः. अग्निः सुतुकः सुतुकेभिरश्वै रभस्वद्भी रभस्वाँ एह गम्याः.. (७) हे अग्नि! हमारे यज्ञ में महान् देवों को लाओ. हे परस्पर मिले हुए द्यवा-पृथिवी में सूर्य के रथ से जाने वाले अग्नि! तुम हमारे यज्ञ में बैठो. हे स्तोताओं द्वारा सुखपूर्वक प्राप्त करने योग्य एवं वेगशाली अग्नि! तुम सरल गति वाले एवं तीव्रगामी अश्वों द्वारा हमारे यज्ञ में आओ. ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—४ देवता—अग्नि

(७) सूक्त—४ देवता—अग्नि प्र ते यक्षि प्र त इयर्मि मन्म भुवो यथा वन्द्यो नो इवेषु. धन्वन्निव प्रपा असि त्वमग्न इयक्षवे पूरवे प्रत्न राजन्.. (१) हे अग्नि! मैं तुम्हारे लिए हवि देता हूं एवं सुंदर स्तुतियां बोलता हूं. हे सबके वंदनीय अग्नि! तुम हमारे आह्वानाें में आते हो. हे प्राचीन एवं सबके स्वामी अग्नि! जिस प्रकार मरुस्थल में छोटा जलाशय भी सुखद होता है, उसी प्रकार तुम यज्ञकर्त्ता मनुष्य को धन देकर सुखदाता बनते हो. (१) यं त्वा जनासो अभि सञ्चरन्ति गाव उष्णमिव व्रजं यविष्ठ. दूतो देवानामास मर्त्यानामन्तर्महाँश्चरसि रोचनेन.. (२) हे अतिशय युवा अग्नि! ठंड से परेशान गाएं जिस प्रकार गरम पशुशाला में जाती हैं, उसी प्रकार यजमान फल पाने के लिए तुम्हारी सेवा करते हैं. हे महान् अग्नि! तुम देवों और मानवों के दूत हो एवं द्यावा-पृथिवी के बीच से हवि लेकर अंतरिक्ष में घूमते हो. (२) शिशुं न त्वा जेन्यं वर्धयन्ती माता बिभर्ति सचनस्यमाना. धनोरधि प्रवता यासि हर्यञ्जिगीषसे पशुरिवावसृष्टः.. (३) हे जयशील अग्नि! पुत्र के समान तुम्हारा पोषण करती हुई एवं तुमसे संपर्क चाहती हुई धरती माता तुम्हें धारण करती हैं. हे अभिलाषी अग्नि! तुम अंतरिक्ष के प्रसिद्ध मार्ग से यज्ञ में आते हो. जिस प्रकार छोड़ा हुआ पशु पशुशाला में जाना चाहता है, उसी प्रकार तुम हवि लेकर देवों के पास जाना चाहते हो. (३) मूरा अमूर न वयं चिकित्वो महित्वमग्ने त्वमङ्ग वित्से. शये वव्रिश्चरति जिह्वयादन्नेरिह्यते युवतिं विश्पतिः सन्.. (४) हे मूढ़ता रहित एवं ज्ञानी अग्नि! हम मूर्ख होने के कारण तुम्हारी महिमा नहीं जानते हैं, किंतु तुम हमारा महत्त्व जानते हो. अग्नि ओषधियों में निवास करते हैं एवं ज्वालारूपी जीभ से हव्य खाते हुए चलते हैं. प्रजाओं के स्वामी अग्नि आहुतियों का स्वाद लेते हैं. (४) क्विचिज्जायते सनयासु नव्यो वने तस्थौ पलितो धूमकेतुः. अस्नातापो वृषभो न प्र वेति सचेतसो यं प्रणयन्त मर्ताः.. (५) नवीनतम अग्नि किसी स्थान में उत्पन्न होते हैं तथा प्राचीन वृक्षों में रहते हैं. श्वेतवर्ण वाले एवं धुएं से जाने गए अग्नि वन में रहते हैं. स्नान के बिना ही शुद्ध रहने वाले अग्नि बैल ebook converter DEMO Watermarks*

के समान जल के पास जाते हैं. मनुष्य एकचित्त होकर अग्नि को प्रसन्न करते हैं. (५) तनूत्यजेव तस्करा वनर्गू रशनाभिर्दशभिरभ्यधीताम्. इयं ते अग्ने नव्यसी मनीषा युक्ष्वा रथं न शुचयद्भिरङ्गैः.. (६) हे अग्नि! जिस प्रकार वन में घूमने वाले एवं चोरी के काम में प्राण देने के लिए तैयार दो चोर यात्री को रस्सी से बांधकर खींचते हैं, उसी प्रकार हमारे दो हाथ दस उंगलियों की सहायता से तुम्हें मथते हैं. हे अग्नि! तुम्हारे लिए यह नई स्तुति है. जिस प्रकार रथ में घोड़े जोड़े जाते हैं, उसी प्रकार तुम अपने तेजों को इस यज्ञ में मिलाओ. (६) ब्रह्म च ते जातवेदो नमश्चेयं च गीः सदमिद्धर्धनी भूत्. रक्षाणो अग्ने तनयानि तोका रक्षोत नस्तन्वो३ अप्रयुच्छन्.. (७) हे बुद्धिमान् अग्नि! हमारे द्वारा तुम्हें दिया गया अन्न और की गई स्तुति सदा बढ़ती रहे. तुम हमारे पुत्र-पौत्रों की सदा रक्षा करो तथा सावधानी से हमारे अंगों को रखाओ. (७) सूक्त—५ देवता—अग्नि एकः समुद्रो धरुणो रयीणामस्मद्धृदो भूरिजन्मा वि चष्टे. सिषक्त्यूधर्निण्योरुपस्थ उत्सस्य मध्ये निहितं पदं वेः.. (१) धनों के उद्गम, धनों को धारण करने वाले, अनोखे एवं विविध जन्मों वाले अग्नि हमारे मन की अभिलाषाओं को जानते हैं तथा अंतरिक्ष के समीप वर्तमान रहकर रात्रि का सेवन करते हैं. हे अग्नि! मेघ में छिपे हुए स्थान पर जाओ. (१) समानं नीळं वृषणो वसानाः सं जग्मिरे महिषा अर्वतीभिः. ऋतस्य पदं कवयो नि पान्ति गुहा नामानि दधिरे पराणि.. (२) आहुतियां पूर्ण करने वाले यजमान एकमात्र अग्नि को मंत्रों से आच्छादित करके घोड़ियों को प्राप्त कर चुके हैं. बुद्धिमान् लोग जल के निवासस्थान अग्नि की रक्षा करते हैं एवं अंतरिक्ष में स्थित अग्नि के दिव्य नामों को हृदय में धारण करते हैं. (२) ऋतायिनी मायिनी सं दधाते मित्वा शिशुं जज्ञतुर्वर्धयन्ती. विश्वस्य नाभिं चरतो ध्रुवस्य कवेश्चित्तन्तुं मनसा वियन्तः.. (३) सत्य एवं यज्ञकर्म से युक्त द्यावा-पृथिवी अग्नि को धारण करते हैं एवं समय की सीमा में घिरे शिशुरूप अग्नि को माता-पिता के समान बढ़ाते हैं. मनुष्य सभी स्थावर और जंगम प्राणियों की नाभि के समान प्रधान तथा मेधावी वैश्वानर नामक अग्नि का मन में ध्यान करते हुए सुखी होते हैं. (३) ebook converter DEMO Watermarks*

ऋतस्य हि वर्तनयः सुजातमिषो वाजाय प्रदिवः सचन्ते. अधीवासं रोदसी वावसाने घृतैरन्नैर्वावृधाते मधूनाम्.. (४) यज्ञ आरंभ करने वाले, अभिलषित वस्तुओं के इच्छुक एवं प्राचीन यजमान शक्ति पाने के लिए शोभनजन्म वाले अग्नि की सेवा करते हैं. सारे संसार के ढकने वाले द्यावा-पृथिवी ने तीनों लोकों में तीन रूप में रहने वाले अग्नि को जलों से संबंधित अन्नों की सहायता से बढ़ाया. (४) सप्त स्वसॄरुषीर्वाशानो विद्वान्मध्व उज्जभारा दृशे कम्. अन्तर्येमे अन्तरिक्षे पुराजा इच्छन्वव्रिमविदत्पूषणस्य.. (५) स्तोताओं द्वारा प्रशंसित व सबको जानने वाले अग्नि ने सारी बहिनों के समान दीप्तिपूर्ण सात किरणों को मादकतापूर्ण यज्ञ से इसलिए ऊपर उठाया कि सुखपूर्वक सब पदार्थों को देख सकें. प्राचीन काल में उत्पन्न अग्नि ने द्यावा-पृथिवी के मध्य में स्थित अंतरिक्ष में अपनी किरणों को नियमित किया. यजमानों की अभिलाषा करने वाले अग्नि ने धरती को अपना वर्षावाला रूप दिया. (५) सप्त मर्यादाः कवयस्ततक्षुस्तासामेकामिदभ्यंहुरो गात्. आयोर्ह स्कम्भ उपमस्य नीळे पथां विसर्गे धरुणेषु तस्थौ.. (६) मेधावियों ने सात मर्यादाओं को छोड़ दिया है. इन कार्यों में से एक को करने वाला भी पाप को प्राप्त करता है. मनुष्यों को पाप से रोकने वाले अग्नि समीपवर्ती मानवलोक में, सूर्यकिरणों के विचरने के स्थान में एवं जलों में रहते हैं. (६) असच्च सच्च परमे व्योमन् दक्षस्य जन्मन्नदितेरुपस्थे. अग्निहं नः प्रथमजा ऋतस्य पूर्व आयुनि वृषभश्च धेनुः.. (७) अग्नि सृष्टि से पहले अव्यक्त ओर सृष्टि के पश्चात् व्यक्त रूप में रहते हैं. अग्नि ने परम धाम आकाश में सूर्य से जन्म पाया है. अग्नि हमसे पहले उत्पन्न हुए हैं एवं यज्ञ से पहले वर्तमान थे. वे गाय ओर बैल दोनों रूपों में हैं. (७) सूक्त—६ देवता—अग्नि अयं स यस्य शर्मन्नन्नवोभिरग्नेरेधते जरिताभीष्टौ. ज्येष्ठेभिर्यो भानुभिर्ऋक्षूणां पर्यैति परिवीतो विभावा.. (१) ये वे ही अग्नि हैं, जिनकी रक्षा पाकर यज्ञ के समय स्तोता अपने घर में बढ़ता है. दीप्तिशाली अग्नि सूर्यकिरणों के प्रशंसनीय तेजों से युक्त होकर सब जगह जाते हैं. (१) ebook converter DEMO Watermarks*

यो भानुभिर्विभावा विभात्यग्निर्देवेभिर्ऋतावाजस्रः. आ यो विवाय सख्या सखिभ्योऽपरिह्वृतो अत्यो न सप्तिः.. (२) सत्ययुक्त, अपराजित एवं दीप्तिशाली अग्नि देवों के तेज से अनेक प्रकार से प्रकाशित होते हैं. अग्नि बिना थके हुए अपने मित्र यजमानों के पास उनके काम करने के लिए इस प्रकार जाते हैं, जिस प्रकार घोड़ा लगातार चलता रहता है. (२) ईशे यो विश्वस्य देववीतेरीशे विश्वायुरुषसो व्युष्टौ. आ यस्मिन्मना हवींष्यग्नाव्रिष्टरथः स्कभ्नाति शूषैः... (३) जो अग्नि सभी देवयज्ञों के स्वामी हैं एवं सर्वत्र गतिशील हैं, वे अग्नि प्रातःकाल यजमानों के यज्ञों के भी प्रभु हैं. यजमान अग्नि में उनका मनचाहा हवि डालते हैं, इसलिए यजमानों के रथ शत्रुओं द्वारा रोके नहीं जाते. (३) शूषेभिर्वृधो जुषाणो अर्कैर्देवाँ अच्छा रघुपत्वा जिगाति. मन्द्रो होता स जुह्वा३ यजिष्ठः सम्मिश्लो अग्निरा जिघर्ति देवान्.. (४) हव्यों से बड़े हुए स्तोत्रों से सेवित अग्नि इंद्रादि देवों से मिलने के लिए तेज चलते हुए जाते हैं. स्तुतियोग्य देवों को बुलाने वाले, यज्ञपात्रों में उत्तम एवं देवों से युक्त अग्नि देवों के प्रति हवि ले जाते हैं. (४) तमुक्षामिन्द्रं न रेजमानमग्निं गीर्भिर्नमोभिरा कृणुध्वम्. आ यं विप्रासो मतिभिर्गृणन्ति जातवेदसं जुह्वं सहानाम्.. (५) हे ऋत्विजो! भोगों के देने वाले व ज्वाला के रूप में कांपते हुए अग्नि को इंद्र के समान स्तुतियों एवं हव्यों से हमारे अभिमुख करो. मेधावी स्तोता शत्रुसेनाओं को हराने वाले, देवों को बुलाने वाले एवं जातवेद अग्नि की आदरपूर्वक स्तुति करते हैं. (५) सं यस्मिन्विश्वा वसूनि जग्मुर्वाजे नाश्वाः सप्तीवन्त एवैः. अस्मे ऊतीरिन्द्रवाततमा अर्वाचीना अग्न आ कृणुष्व.. (६) हे अग्नि! शीघ्रगामी अश्व जिस प्रकार संग्राम में एकत्र होते हैं, उसी प्रकार सभी संपत्तियां तुम में मिलती हैं. हे अग्नि! तुम इंद्र के रक्षासाधनों को हमारे अभिमुख करो. (६) अधा ह्यग्ने मह्ना निषद्या सद्यो जज्ञानो हव्यो बभूथ. तं ते देवासो अनु केतमायन्नधावर्धन्त प्रथमास ऊमाः.. (७) हे अग्नि! तुम महत्त्व से प्रज्वलित होते हुए यज्ञशाला में बैठकर उसी समय आहुति डालने योग्य हुए थे, इसलिए हव्यदाता ऋत्विज् और यजमान तुम्हारी इस प्रकार की पहचान का अनुगमन करते हैं. (७) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—७ देवता—अग्नि

सूक्त—७ देवता—अग्नि स्वस्ति नो दिवो अग्ने पृथिव्या विश्वायुर्धेहि यजथाय देव. सचेमहि तव दस्म प्रकेतैरुरुष्या ण उरुभिर्देव शंसैः.. (१) हे दिव्यगुण युक्त अग्नि! हम यज्ञकर्त्ताओं के लिए द्यावा-पृथिवी से लाकर कल्याण प्रदान करो. हे दर्शनीय अग्नि! हम तुम्हें प्राप्त करें. तुम अनेक प्रशंसनीय रक्षासाधनों से हमारी रक्षा करो. (१) इमा अग्ने मतयस्तुभ्यं जाता गोभिरश्वैरभि गृणन्ति राधः. यदा ते मर्तो अनु भोगमानड्वसो दधानो मतिभिः सुजात.. (२) हे अग्नि! ये स्तुतियां तुम्हारे लिए बोली गई हैं. तुम अश्वों और गायों के साथ हमारे लिए धन देते हो, इसलिए हम तुम्हारी स्तुति करते हैं. हे तेज से सबको ढकने वाले, शोभनकर्मों से उत्पन्न एवं हमें धन देने वाले अग्नि! जब लोग तुम्हारा दिया हुआ धन प्राप्त करते हैं, तब तुम्हारी स्तुति की जाती है. (२) अग्निं मन्ये पितरमग्निमापिमग्निं भ्रातरं सदमित्सखायम्. अग्नेरनीकं बृहतः सपर्यं दिवि शुक्रं यजतं सूर्यस्य.. (३) मैं अग्नि को ही पिता, बंधु, भ्राता तथा नित्य मित्र मानता हूं. मैं अग्नि के मुख की उसी प्रकार सेवा करता हूं, जिस प्रकार द्युलोक में स्थित, पूजायोग्य एवं दीप्तिशाली सूर्यमंडल की आराधना की जाती है. (३) सिध्रा अग्ने धियो अस्मे सनुत्रीर्यं त्रायसे दम आ नित्यहोता. ऋतावा स रोहिदश्वः पुरुक्षुर्द्युभिरस्मा अहभिर्वाममस्तु.. (४) हे अग्नि! तुम्हारे विषय में हमारे द्वारा की गई स्तुतियां पूर्ण हुई हैं. हे नित्य होता व यज्ञयुक्त अग्नि! तुम हमारी यज्ञशाला में उपस्थित रहकर हमारी रक्षा करते हो. मैं तुम्हारे सहयोग से यज्ञकर्त्ता बनूं तथा लाल रंग के घोड़े एवं बहुत सा धन प्राप्त करूं, जिससे उत्तम दिवसों में तुम्हें हव्य मिल सके. (४) द्युभिर्हितं मित्रमिव प्रयोगं प्रत्नमृत्विजमध्वरस्य जारम्. बाहुभ्यामग्निमायवोऽजनन्त विक्षु होतारं न्यसादयन्त.. (५) दीप्तियों से युक्त, मित्र के समान युक्त करने योग्य, पुराने ऋत्विज् एवं यज्ञ को समाप्त करने वाले अग्नि को यजमानों ने भुजाओं द्वारा उत्पन्न किया तथा देवों को बुलाने का काम सौंपा. (५)

स्वयं यजस्व दिवि देव देवान्किं ते पाकः कृणवदप्रचेताः. यथायज ऋतुभिर्देव देवानेवा यजस्व तन्वं सुजात.. (६) हे दीप्तिशाली अग्नि! तुम द्युलोक में रहने वाले देवों का यज्ञ करो. कच्ची बुद्धि वाले और ज्ञानरहित लोग तुम्हारे बिना क्या कर सकेंगे? हे शोभन जन्म वाले अग्नि! तुमने जिस प्रकार समयसमय पर देवों के यज्ञ किए हैं, उसी प्रकार अपना भी यज्ञ करो. (६) भवा नो अग्नेऽवितोत गोपा भवा वयस्कृदुत नो वयोधाः. रास्वा च नः सुमहो हव्यदातिं त्रास्वोत नस्तन्वो३ अप्रयुच्छन्.. (७) हे अग्नि! तुम दृष्ट और अदृष्ट दोनों प्रकार के भयों से हमारी रक्षा करो. तुम हमारे लिए अन्न उत्पन्न करो एवं अन्न दो. हे शोभन पूजा योग्य अग्नि! तुम हमें हव्य सामग्री का दान करो एवं हमारे शरीरों का पालन करो. (७) सूक्त—८ देवता—अग्नि व इंद्र प्र केतुना बृहता यात्यग्निरा रोदसी वृषभो रोरवीति. दिवश्चिदन्ताँ उपमाँ उदानळपामुपस्थे महिषो ववर्ध.. (१) अग्नि बड़ा झंडा लेकर द्यावा-पृथिवी के बीच में जाते हैं एवं देवों को बुलाने के लिए बैल के समान शब्द करते हैं. अग्नि द्युलोक से दूर या समीप रहकर उसे व्याप्त करते हैं एवं जल के भंडार अंतरिक्ष में बिजली के रूप में बढ़ते हैं. (१) मुमोद गर्भो वृषभः ककुद्मान्सेमा वत्सः शिमीवाँ अरावीत्. स देवतात्युद्यतानि कृण्वन्त्स्वेषु क्षयेषु प्रथमो जिगाति.. (२) अभिलाषापूरक एवं उन्नत तेज वाले अग्नि द्यावा-पृथिवी के मध्य में प्रसन्न होते हैं. प्रातःकाल एवं निशा के प्रसिद्ध पुत्र एवं यज्ञकर्म करने वाले अग्नि शब्द करते हैं. वे यज्ञ में उत्साहपूर्ण कर्म करते हैं, अपने स्थानों में रहते हैं एवं देवों के प्रमुख बनकर जाते हैं. (२) आ यो मूर्धानं पित्रोररब्ध न्यध्वरे दधिरे सूरो अर्णः. अस्य पत्मन्नरुषीरश्वबुध्ना ऋतस्य योनौ तन्वो जुषन्त.. (३) अग्नि अपने माता-पिता द्यावा-पृथिवी के सिर पर अपने तेज से रमण करते हैं. यज्ञकर्त्ता शोभनशक्ति वाले अग्नि के तेज को यज्ञ में धारण करते हैं. अग्नि के पतन के समय सुशोभित स्तोता यज्ञ के स्थान में व्याप्त अग्नि के शरीर की सेवा करते हैं. (३) उषउषो हि वसो अग्रमेषि त्वं यमयोरभवो विभावा. ऋताय सप्त दधिषे पदानि जनयन्मित्रं तन्वे३ स्वायै.. (४) ebook converter DEMO Watermarks*

हे प्रशंसनीय अग्नि! तुम प्रतिदिन उषाकाल से पहले ही आ जाते हो तथा आपस में मिले हुए रात-दिन को प्रकाशित करते हो. तुम अपने शरीर से सूर्य को उत्पन्न करते हुए यज्ञ के निमित्त सात स्थानों में बैठो. (४) भुवश्चक्षुर्मह ऋतस्य गोपा भुवो वरुणो यदृताय वेषि. भुवो अपां नपाज्जातवेदो भुवो दूतो यस्य हव्यं जुजोषः.. (५) हे अग्नि! तुम चक्षु के समान यज्ञ को प्रकाशित करने वाले तथा रक्षक हो. जब तुम वरुण के रूप में जाते हो तब तुम रक्षक बनते हो. हे जातवेद अग्नि! तुम्हीं जल के नाती एवं उस यजमान के दूत बनते हो, जिसका हवि तुम स्वीकार कर लेते हो. (५) भुवो यज्ञस्य रजसश्च नेता यत्रा नियुद्भिः सचसे शिवाभिः. दिवि मूर्धानं दधिषे स्वर्षां जिह्वामग्ने चकृषे हव्यवाहम्.. (६) हे अग्नि! तुम अंतरिक्ष में कल्याणकारी अश्वों वाले देवों से मिलकर यज्ञ और जल के नेता बनते हो. तुम प्रधान एवं सबका उपभोग करने वाले सूर्य को स्वर्ग में धारण करते हो एवं अपनी जीभ को हव्यवहन करने वाली बनाते हो. (६) अस्य त्रितः क्रतुना वव्रे अन्तरिच्छन्धीतिं पितुरेवैः परस्य. सचस्यमानः पित्रोरुपस्थे जामि ब्रुवाण आयुधानि वेति.. (७) यज्ञ के भाग से बढ़ी हुई शक्ति वाले त्रित ऋषि ने अपने रक्षासाधनों से युक्त होकर, यज्ञ के मध्य में अपना भाग चाहते हुए उत्तम एवं जगत्पालक इंद्र को यज्ञ के द्वारा मित्र बनाया. माता-पितारूप द्यावा-पृथिवी के मध्य में वर्तमान यज्ञ में ऋत्विजों सहित त्रित ने इंद्र के अनुकूल स्तोत्र बोलते हुए आयुध प्राप्त किए. (७) स पित्र्याण्यायुधानि विद्वानिन्द्रेषित आप्त्यो अभ्ययुध्यत्. त्रिशीर्षाणं सप्तरश्मिं जघन्वान्त्वाष्ट्रस्य चिन्निः ससृजे त्रितो गाः.. (८) अपने पिता के आयुधों को जानने वाले एवं इंद्र के द्वारा प्रेरित आप्त्यपुत्र त्रित ने युद्ध किया. उसने सात रश्मियों वाले त्रिशिरा का वध किया और त्वष्टा के पुत्र विश्वरूप की गाएं छीन लीं. (८) भूरीदिन्द्र उदिनक्षन्तमोजोऽवाभिनत् सत्पतिर्मन्यमानम्. त्वाष्ट्रस्य चिद्विश्वरूपस्य गोनामाचक्राणस्त्रीणि शीर्षा परा वर्कू.. (९) सज्जनों के पालक इंद्र ने स्वयं को शूर मानने वाले एवं अतिरिक्त तेज धारण करने वाले त्वष्टापुत्र को मार डाला. इंद्र ने त्वष्टा के पुत्र विश्वरूप की गायों को बुलाते हुए उसके तीन सिरों को काट दिया. (९) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—९ देवता—जल

सूक्त—९ देवता—जल आपो हि ष्ठा मयोभुवस्ता न ऊर्जे दधातन. महे रणाय चक्षसे.. (१) हे सुख के आधार जल! तुम हमें अन्न पाने के योग्य बनाओ तथा हमें महान् व रमणीय ज्ञान दो. (१) यो वः शिवतमो रसस्तस्य भाजयतेह नः. उशतीरिव मातरः.. (२) हे जल! पुत्र की उन्नति चाहने वाली माताएं जिस प्रकार उसे दूध देती हैं, उसी प्रकार तुम अपना सुखकर रस हमें दो. (२) तस्मा अरङ्गमाम वो यस्य क्षयाय जिन्वथ. आपो जनयथा च नः.. (३) हे जल! तुम जिस पाप को नष्ट करने के लिए हमसे प्रसन्न हुए हो, हम उसी पाप के नाश के लिए तुम्हारे पास शीघ्र जाते हैं. तुम हमें प्रजनन के योग्य बनाओ. (३) शं नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये. शं योरभि स्रवन्तु नः.. (४) दिव्य जल हमारे यज्ञ के लिए सुखदाता हों एवं पीने योग्य बनें. जल हमारे ऊपर शुद्धि हेतु बरसें, हमारे उत्पन्न रोगों को मिटावें तथा अनुत्पन्न रोगों को हमसे अलग रखें. (४) ईशाना वार्याणां क्षयन्तीश्चर्षणीनाम्. अपो याचामि भेषजम्.. (५) जल अभिलाषायोग्य वस्तुओं के स्वामी एवं मानवों को निवासस्थान देने वाले हैं. हम जलों से दवाओं की प्रार्थना करें. (५) अप्सु मे सोमो अब्रवीदन्तर्विश्वानि भेषजा. अग्निं च विश्वशम्भुवम्.. (६) सोम ने मुझसे कहा कि जल के भीतर सभी दवाएं एवं संसार को सुखी करने वाले अग्नि रहते हैं. (६) आपः पृणीत भेषजं वरूथं तन्वे३ मम. ज्योक्च सूर्यं दृशे.. (७) हे जल! तुम मेरे शरीर की रक्षा करने वाली दवाओं को पुष्ट करो, जिससे हम बहुत दिन तक सूर्य को देख सकें. (७) इदमापः प्र वहत यत्किं च दुरितं मयि. यद्वाह्मभिदुद्रोह यद्वा शेप उतानृतम्.. (८) हे जल! मुझ में जो कुछ पाप है, मैंने जो द्रोह किया है, मेरा जो पतन हुआ है अथवा मैंने जो झूठ बोला है, उसे मुझसे दूर करो. (८) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—१० देवता—यमयमी

आपो अद्यान्वचारिषं रसेन समगस्महि. पयस्वानग्न आ गहि तं मा सं सृज वर्चसा.. (९) आज मैं जल में घुसा हूं. मैंने जल का रस पिया है. हे अग्नि! तुम जलयुक्त बनकर जाओ एवं मुझे तेजस्वी बनाओ. (९) सूक्त—१० देवता—यमयमी ओ चित्सखायं सख्या ववृत्यां तिरः पुरू चिदर्णवं जगन्वान्. पितुर्नपातमा दधीत वेधा अधि क्षमि प्रतरं दीध्यानः.. (१) यमी बोली- इस निर्जन एवं विस्तृत द्वीप में आकर मैं तुझ सखा से संभोग सुख पाने के लिए सन्मुख हुई हूं. तुम माता के उदर से ही मेरे साथ हो. विधाता यह चाहते हैं कि तुम्हारे संसर्ग से मेरे उदर से जो पुत्र पैदा हो, वह हमारे पिता का योग्य नाती हो. (१) न ते सखा सख्यं वष्ट्येतत्सलक्ष्मा यद्विषुरूपा भवाति. महस्पुत्रासो असुरस्य वीरा दिवो धर्त्तार उर्विया परि ख्यन्.. (२) यम ने उत्तर दिया- तुम्हारा साथी यम तुम्हारे साथ ऐसी मित्रता नहीं चाहता. तुम बहिन होने के कारण इस संबंध के योग्य नहीं हो. महान् एवं शक्तिशाली प्रजापति के स्वर्गधारणकर्त्ता पुत्र अर्थात् देव देख रहे हैं. (२) उशन्ति घा ते अमृतास एतदेकस्य चित्त्यजसं मर्त्यस्य. नि ते मनो मनसि धाय्यस्मे जन्युः पतिस्तन्व१मा विविश्याः.. (३) यमी ने कहा- प्रजापति आदि देव त्याज्य नारियों के साथ इस प्रकार का संबंध रखना चाहते हैं. मानवों के लिए यह संबंध त्याज्य है. तुम अपने मन को मेरे अनुकूल बनाओ एवं प्रजापति के समान तुम भी पुत्र के जन्मदाता के रूप में मेरे शरीर में प्रवेश करो. (३) न यत्पुरा चकृमा कद्ध नूनमृता वदन्तो अनृतं रपेम. गन्धर्वो अप्स्वप्या च योषा सा नो नाभिः परमं जामि तन्नौ.. (४) यम बोला- हमने पहले ऐसा कभी नहीं किया. हम सत्य बोलते हुए असत्य से दूर रहते हैं. अंतरिक्ष में जल धारण करने वाले सूर्य एवं अंतरिक्ष में रहने वाली उनकी पत्नी सरण्यू हमारे पिता-माता हैं. इस प्रकार हम सगे भाईबहिन हैं. (४) गर्भे नु नौ जनिता दम्पती कर्देवस्त्वष्टा सविता विश्वरूपः. नकिरस्य प्र मिनन्ति व्रतानि वेद नावस्य पृथिवी उत द्यौः.. (५) यमी कहने लगी- रूपकर्त्ता, शुभाशुभ प्रेरक एवं सर्वात्मक प्रजापति ने गर्भ में ही हमें ebook converter DEMO Watermarks*

पति-पत्नी बना दिया था. प्रजापति के काम का कोई भी विरोध नहीं करता है. हमारे दंपती होने की बात द्यावा-पृथिवी जानते हैं. (५) को अस्य वेद प्रथमस्याह्नः क ईं ददर्श क इह प्र वोचत्. बृहन्मित्रस्य वरुणस्य धाम कदु ब्रव आहनो वीच्या नॄन्.. (६) यमी बोली- पहले दिन के संभोग को कौन जानता है! उसे किसने देखा है? उसे कौन बताएगा? हे मोक्ष और बंधन का निर्णय करने वाले यम! तुम मित्र और वरुण के स्थान अर्थात् दिन-रात के विषय में क्या कहते हो. (६) यमस्य मा यम्यं१ काम आगन्त्समाने योनौ सहशेय्याय. जायेव पत्ये तन्वं रिरिच्यां वि चिद्वृहेव रथ्येव चक्रा.. (७) तुझ यम की अभिलाषा मुझ यमी के प्रति जागृत हो. एक ही शय्या पर साथ-साथ सोने के लिए पत्नी जिस प्रकार पति के सामने अपना शरीर प्रदर्शित करती है, उसी प्रकार मैं अपना शरीर प्रकाशित करूंगी. आओ, हम दोनों रथ के दो पहियों के समान एक ही कार्य में लगें. (७) न तिष्ठन्ति न नि मिषन्त्येते देवानां स्पश इह ये चरन्ति. अन्येन मदाहनो याहि तूयं तेन वि वृह रथ्येव चक्रा.. (८) यम ने कहा- यहां जो देवों के गुप्तचर घूमते हैं, वे न कभी रुकते हैं और न आंखें बंद करते हैं. हे दुःख देने वाली यमी! तुम मेरे अतिरिक्त किसी अन्य के पास शीघ्र जाओ एवं रथ के पहियों के समान एक रुचिवाला कार्य करो. (८) रात्रीभिरस्मा अहभिर्दशस्येत्सूर्यस्य चक्षुर्मुहुरुन्मिमीयात्. दिवा पृथिव्या मिथुना सबन्धू यमीर्यमस्य बिभृयादजामि.. (९) सभी यजमान रात और दिन का कल्पित भाग यम को दें. सूर्य का तेज यम के लिए बार-बार उदित हो. आपस में संबंध रखने वाले रात-दिन द्यावा और पृथिवी के साथ यम के बंधु हैं. यमी अपने भाई यम के अतिरिक्त किसी अन्य को अपना बनावें. (९) आ घा ता गच्छानुत्तरा युगानि यत्र जामयः कृणवन्नजामि. उप बर्बृहि वृषभाय बाहुमन्यमिच्छस्व सुभगे पतिं मत्.. (१०) आगे चलकर ऐसा समय आएगा, जब बहिनें अपने भाई के अतिरिक्त किसी अन्य व्यक्ति को पति बनावेंगी. हे सुंदरी! मेरे अतिरिक्त किसी अन्य को पति बनाने की कल्पना करो और अपनी भुजा को वीर्याधान करने वाले उस पुरुष का उपधान बनाओ. (१०) किं भ्रातासद्यदनाथं भवाति किमु स्वसा यन्निर्ऋतिर्निगच्छात्. ebook converter DEMO Watermarks*

काममूता बह्वे३ तद्रपामि तन्वा मे तन्वं१ सं पिपृग्धि.. (११) यमी कहने लगी- उस भाई के होने से क्या लाभ है, जिसके रहते हुए भी बहिन पतिविहीन रहे. उस बहिन के होने से क्या लाभ है, जिसके होते हुए भाई दुःख उठाए. मैं काममूर्च्छित होकर ये वचन बोल रही हूं. तुम मेरे शरीर से अपना शरीर भली-भांति मिलाओ. (११) न वा उ ते तन्वा तन्वं१ सं पपृच्यां पापमाहुर्यः स्वसारं निगच्छात्. अन्येन मत्प्रमुदः कल्पयस्व न ते भ्राता सुभगे वष्ट्येतत्.. (१२) यम कहने लगा- हे यमी! मैं तुम्हारे शरीर से अपना शरीर नहीं मिलाना चाहता. जो अपनी बहिन के साथ संभोग करता है, उसे लोग पापी कहते हैं. हे सुंदरी! मेरे अतिरिक्त किसी अन्य पुरुष के साथ आमोदप्रमोद करो. तुम्हारा भाई यह काम करना नहीं चाहता. (१२) बतो बतासि यम नैव ते मनो हृदयं चाविदाम. अन्या किल त्वां कक्ष्येव युक्तं परि ष्वजाते लिबुजेव वृक्षम्.. (१३) यमी बोली- मुझे खेद है कि तुम बहुत कमजोर हो. मैं तुम्हारे मन को नहीं समझ पा रही हूं. रस्सी जिस प्रकार घोड़े को बांधती है और लता जिस प्रकार वृक्ष से लिपट जाती है, उसी प्रकार अन्य स्त्री तुम्हारा आलिंगन करती है. (१३) अन्यम् षु त्वं यम्यन्य उ त्वां परि ष्वजाते लिबुजेव वृक्षम्. तस्य वा त्वं मन इच्छा स वा तवाधा कृणुष्व संविदं सुभद्राम्.. (१४) यम ने कहा- हे यमी! लता जिस प्रकार वृक्ष को लपेटती है, उसी प्रकार तुम मेरे अतिरिक्त अन्य पुरुष का आलिंगन करो. वह पुरुष भी तुम्हारा आलिंगन करे. तुम उस पुरुष का मन जीतने की कामना करो और वह पुरुष तुम्हारा मन जीतने की इच्छा करे. तुम उसी के साथ कल्याणकारी सहवास करो. (१४) सूक्त—११ देवता—अग्नि वृषा वृष्णे दुदुहे दोहसा दिवः पयांसि यह्वो अदितेरदाभ्यः. विश्वं स वेद वरुणो यथा धिया स यज्ञियो यजतु यज्ञियाँ ऋतून्.. (१) वर्षा करने वाले, महान् और अपराजेय अग्नि ने हवि बरसाने वाले यजमान के लिए दोहन क्रिया द्वारा आकाश से जल गिराया. वरुण अपनी बुद्धि से सारे संसार को जानते हैं. यज्ञयोग्य अग्नि अनुकूल ऋतुओं में यज्ञ करें. (१) ebook converter DEMO Watermarks*

रपदगन्धर्वीरप्या च योषणा नदस्य नादे परि पातु मे मनः. इष्टस्य मध्ये अदितिर्नि धातु नो भ्राता नो ज्येष्ठः प्रथमो वि वोचति.. (२) अग्नि के गुणों का वर्णन करने वाली गंधर्वपत्नी एवं जलों से संस्कृत आहुति ने अग्नि को विशेष तृप्त किया है. मेरा मन स्तुतियों के उच्चारण में भली-भांति लगा रहे. खंडनरहित अग्नि हमें यज्ञ के बीच में स्थित करें. यजमानों में मुख्य अर्थात् मेरे बड़े भाई अग्नि की विशेषरूप से स्तुति करें. (२) सो चिन्नु भद्रा क्षुमती यशस्वत्युषा उवास मनवे स्वर्वती. यदीमुशन्तमुशतामनु क्रतुमग्निं होतारं विदथाय जीजनन्.. (३) भद्रा, शब्दयुक्त एवं अन्न वाली उषा यजमान के लिए आदित्य के साथ शीघ्र उदित हुई. उस समय यज्ञाभिलाषियों के ऊपर प्रसन्न होने वाले एवं देवों को बुलाने वाले अग्नि को उत्पन्न किया गया. (३) अध त्यं द्रप्सं विभ्वं विचक्षणं विराभरदिषितः श्येनो अध्वरे. यदी विशो वृणते दस्ममार्या अग्निं होतारमध धीरजायत.. (४) बाज पक्षी अग्नि द्वारा प्रेरित होकर यज्ञ में महान्, सूक्ष्मदर्शी तथा न कम न अधिक सोम को ले आया. जब आर्य यजमान उस दर्शनीय व देवों के आह्वान करने योग्य अग्नि की प्रार्थना करते हैं, तब होता यज्ञक्रिया आरंभ करते हैं. (४) सदासि रण्वो यवसेव पुष्यते होत्राभिरग्ने मनुषः स्वध्वरः. विप्रस्य वा यच्छशमान उक्थ्यं१ वाजं ससवाँ उपयासि भूरिभिः.. (५) हे अग्नि! तुम पशुओं को पुष्ट करने वाली घास के समान सदा रमणीय हो. तुम मनुष्यों के हव्य से शोभन यज्ञ वाले बनो. तुम स्तोता की स्तुतियों की प्रशंसा करते हुए एवं हव्य का उपभोग करते हुए बहुत से देवों के साथ जाते हो. (५) उदीरय पितरा जार आ भगमियक्षति हर्यतो हृत्त इष्यति. विवक्ति वह्निः स्वपस्यते मखस्तविष्यते असुरो वेपते मती.. (६) हे अग्नि! तुम अपना प्रकाश अपने माता-पिता द्यावा-पृथिवी की ओर इस प्रकार भेजो, जिस प्रकार सूर्य अपनी ज्योति इनकी ओर भेजते हैं. यज्ञ की कामना करने वाला यजमान सच्चे मन से यज्ञ करना चाहता है एवं स्तुति वचन बोलने का इच्छुक है. अध्वर्यु यज्ञकर्म को पूरा करने को उत्सुक है. ब्रह्मा स्तोत्र को बढ़ाते हैं एवं उनकी बुद्धि यज्ञ के विषय में कभी- कभी शंका करने लगती है. (६) यस्ते अग्ने सुमतिं मर्तो अक्षत्सहसः सूनो अति स प्र शृण्वे. इषं दधानो वहमानो अश्वैरा स द्युमाँ अमवान्भूषति द्यून्.. (७) ebook converter DEMO Watermarks*

हे बलपुत्र अग्नि! जो मनुष्य तुम्हारी दयादृष्टि चाहता है, वह प्रसिद्ध, अन्नदाता, घोड़ों पर बैठकर चलने वाला, दीप्तिशाली, बली एवं प्रतिदिन सुशोभित होता हुआ तुम्हारी सेवा करता है. (७) यदग्न एषा समितिर्भवाति देवी देवेषु यजता यजत्र. रत्ना च यद्विभजासि स्वधावो भागं नो अत्र वसुमन्तं वीतात्.. (८) हे यज्ञ-योग्य अग्नि! जब हमारी स्तुतियां देवों के बीच में प्रकाशित होती हैं, उस समय तुम हमें रत्न देते हो. हे स्वधायुक्त अग्नि! उस समय हम धन का भाग प्राप्त करें. (८) श्रुधी नो अग्ने सदने सधस्थे युक्ष्वा रथममृतस्य द्रवित्नुम्. आ नो वह रोदसी देवपुत्रे माकिर्देवानाम्प भूरिह स्या.. (९) हे अग्नि! तुम देवों के साथ यज्ञशाला में रहकर हमारे स्तुतिवचनों को सुनो, अमृत बरसाने वाले रथ को जोड़ो व देवों के माता-पिता द्यावा-पृथिवी को हमारे पास लाओ. तुम देवों को छोड़कर मत जाओ. तुम यहीं रहो. (९) सूक्त—१२ देवता—अग्नि द्यावा हक्षामा प्रथमे ऋतेनाभिश्रावे भवतः सत्यवाचा. देवो यन्मर्तान्यजथाय कृण्वन्त्सीदद्धोता प्रत्यङ् स्वमसुं यन्.. (१) सत्य बोलने वाले एवं प्रमुख द्यावा-पृथिवी सबसे पहले यज्ञ में अग्नि का आह्वान करें. अग्नि देव मानवों को यज्ञ के लिए प्रेरित करते हुए एवं देवों को बुलाने के लिए ज्वलारूपी प्राणों को धारण करके वेदी पर बैठें. (१) देवो देवान्परिभूरृतेन वहा नो हव्यं प्रथमश्चिकित्वान्. धूमकेतुः समिधा भ्राभ्रॅजीको मन्द्रो होता नित्यो वाचा यजीयान्.. (२) दीप्तिशाली, सभी देवों में प्रमुख, सब कुछ जानने वाले, धुएं रूपी ध्वजा से युक्त, समिधा के कारण ऊंची ज्वालाओं वाले, स्तुतियोग्य, नित्य एवं वाणी द्वारा यजमानों का यज्ञ करने वाले अग्नि देवों के समीप जाते हुए यज्ञ के साथ-साथ हमारा हव्य ले जावें. (२) स्वावृग्देवस्यामृतं यदी गोरतो जातासो धारयन्त उर्वी. विश्वे देवा अनु तत्ते यजुर्गुर्दुहे यदेनी दिव्यं घृतं वाः.. (३) अग्नि देव के अपने तेज से जो जल उत्पन्न होता है, उस जल से उत्पन्न होने वाले वृक्ष द्यावा-पृथिवी को धारण करते हैं तथा सभी देव तुम्हारे दिए हुए जल की प्रशंसा करते हैं. तुम्हारी उज्ज्वल दीप्ति दिव्य एवं बरसने वाले जल को दुहती है. (३) ebook converter DEMO Watermarks*

अर्चामि वां वर्धायापो घृतस्नू द्यावाभूमी शृणुतं रोदसी मे. अहा यद् द्यावोऽसुनीतिमयन्मध्वा नो अत्र पितरा शिशीताम्.. (४) हे अग्नि! तुम मेरे यज्ञकर्म को बढ़ाओ. हे वर्षा का जल उत्पन्न करने वाले द्यावा-पृथिवी! तुम मेरी स्तुति सुनो. स्तोता जिस समय यज्ञस्तुति करते हैं, उस समय तुम वर्षा करके सबको शुद्ध करो. (४) किं स्विन्नो राजा जगृहे कदस्याति व्रतं चक्रमा को वि वेद. मित्रश्चिद्धि ष्मा जुहुराणो देवाञ्छ्लोको न यातामपि वाजो अस्ति.. (५) क्या दीप्तिशाली अग्नि ने हमारी स्तुतियां और हवि स्वीकार कर लिया है? क्या हमने अग्नि के परिचरण का कर्म किया है? इन बातों को कौन जानता है? मित्र के समान स्नेहपूर्वक बुलाने से अग्नि आ जाते हैं. हमारी यह स्तुति एवं हव्य अन्न देवों के पास जावे. (५) दुर्मन्त्वत्रामृतस्य नाम सलक्ष्मा यद्विषुरूपा भवाति. यमस्य यो मनवते सुमन्त्वग्ने तमृष्व पाह्यप्रयुच्छन्.. (६) मरणरहित सूर्य का अपराधरहित एवं मधुरतायुक्त जल धरती पर नानारूप धारण करता है. यम के अपराध को सूर्य जानते हैं. हे महान् अग्नि! प्रमाद न करते हुए सूर्य की रक्षा करो. (६) यस्मिन्देवा विदथे मादयन्ते विवस्वतः सदने धारयन्ते. सूर्ये ज्योतिरदधुर्मास्य१क्तून्परि द्योतनिं चरतो अजस्रा.. (७) अग्नि के यज्ञ में उपस्थित रहने पर देव प्रसन्न होते हैं एवं सूर्य के यज्ञवेदीरूप स्थान में अपने आपको स्थापित करते हैं. देवों ने सूर्य में तेज तथा चंद्रमा में रातों को स्थापित किया. नष्ट न होने वाले सूर्य और चंद्र प्रकाश पाते हैं. (७) यस्मिन्देवा मन्मनि सञ्चरन्त्यपीच्ये३ न वयमस्य विद्म. मित्रो नो अत्रादितिरनागान् त्सविता देवो वरुणाय वोचत्.. (८) ज्ञानरूपी अग्नि के यज्ञ में उपस्थित रहने पर देवगण अपने-अपने अधिकार में लग जाते हैं. हम अग्नि के छिपे हुए रूप को नहीं जानते. इस यज्ञ में मित्र, अदिति एवं सूर्य पापनाशक अग्नि के सामने हमको पापरहित बतावें. (८) श्रुधी नो अग्ने सदने सधस्थे युक्ष्वा रथममृतस्य द्रवित्नुम्. आ नो वह रोदसी देवपुत्रे माकिर्देवानाम्प भूरिह स्याः.. (९) हे अग्नि! तुम यज्ञशाला में सब देवों के साथ रहकर हमारी स्तुतियां सुनो, अमृत बरसाने ebook converter DEMO Watermarks*

वाले अपने रथ में घोड़े जोड़ो व देवों के माता-पिता द्यावा-पृथिवी को हमारे पास लाओ. तुम देवों को छोड़कर मत जाओ और यहीं रहो. (९) सूक्त—१३ देवता—हविर्धान शकट युजे वां ब्रह्म पूर्व्यं नमोभिर्वि श्लोक एतु पथ्येव सूरे:. शृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्रा आ ये धामानि दिव्यानि तस्थु:.. (१) हे हवि धारण करने वाली गाड़ियों! मैं प्राचीन मंत्रों का उच्चारण करके एवं तुम्हारे ऊपर सोम आदि लादकर पत्नीशाला से ले जाता हूं. स्तोता की आहुति के समान मेरी स्तुतियां देवों के समीप जावें. दिव्यधाम में रहने वाले देव एवं अमरपुत्र इस बात को सुनें. (१) यमे इव यतमाने यदैतं प्र वां भरन्मानुषा देवयन्तः. आ सीदतं स्वमु लोकं विदाने स्वासस्थे भवतमिन्दवे न:.. (२) हे गाड़ियों! जब तुम जुड़वां संतान के समान एक साथ जाती हो, तब देवपूजक लोग तुम्हारे ऊपर बहुत सी हवन की सामग्री लादते हैं. तुम अपने स्थान को जानती हुई वहां रहो एवं हमारे सोम के लिए शोभन स्थान वाली बनो. (२) पञ्च पदानि रुपो अन्वरोहं चतुष्पदीमन्वेमि व्रतेन. अक्षरेण प्रति मिम एतामृतस्य नाभावधि सं पुनामि... (३) हे गाड़ियों! मैं तुम्हारे ऊपर यज्ञ के पांच उपकरणों को रखता हूं, नियमपूर्वक चार छंदों का प्रयोग करता हूं, ओम् का उच्चारण करके यज्ञकार्य पूरा करता हूं एवं यज्ञ की नाभि पर सोमरस को शुद्ध करता हूं. (३) देवेभ्य: कमवृणीत मृत्युं प्रजायै कममृतं नावॄणीत. बृहस्पतिं यज्ञमकृण्वत ऋषिं प्रियां यमस्तन्वं१ प्ररिरेचीत्.. (४) देवों में किसे मृत्यु के पास भेजा जाए एवं प्रजा में से किसे अमर न बनाया जाए? यजमान देवों के पालक एवं फलदाता विशाल यज्ञ को करते हैं. इस कारण यम हमारे शरीर को मौत के पास नहीं भेजते. (४) सप्त क्षरन्ति शिशवे मरुत्वते पित्रे पुत्रासो अप्यवीवतन्नृतम्. उभे इदस्योभयस्य राजत उभे यतेते उभयस्य पुष्यतः.. (५) स्तोतागण पिता के समान एवं प्रशंसायोग्य सोम के लिए सातों छंदों वाली स्तुतियां बोलते हैं. सोम के पुत्र तुल्य ऋत्विज् भी सच्ची स्तुतियां बोलते हैं. हवि ढोने वाली दोनों गाड़ियां देव और मानव दोनों की ईश हैं, यज्ञकर्म पूरा करने का प्रयत्न करती हैं तथा दोनों ebook converter DEMO Watermarks*