ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1560, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंऋतस्य हि वर्तनयः सुजातमिषो वाजाय प्रदिवः सचन्ते. अधीवासं रोदसी वावसाने घृतैरन्नैर्वावृधाते मधूनाम्.. (४) यज्ञ आरंभ करने वाले, अभिलषित वस्तुओं के इच्छुक एवं प्राचीन यजमान शक्ति पाने के लिए शोभनजन्म वाले अग्नि की सेवा करते हैं. सारे संसार के ढकने वाले द्यावा-पृथिवी ने तीनों लोकों में तीन रूप में रहने वाले अग्नि को जलों से संबंधित अन्नों की सहायता से बढ़ाया. (४) सप्त स्वसॄरुषीर्वाशानो विद्वान्मध्व उज्जभारा दृशे कम्. अन्तर्येमे अन्तरिक्षे पुराजा इच्छन्वव्रिमविदत्पूषणस्य.. (५) स्तोताओं द्वारा प्रशंसित व सबको जानने वाले अग्नि ने सारी बहिनों के समान दीप्तिपूर्ण सात किरणों को मादकतापूर्ण यज्ञ से इसलिए ऊपर उठाया कि सुखपूर्वक सब पदार्थों को देख सकें. प्राचीन काल में उत्पन्न अग्नि ने द्यावा-पृथिवी के मध्य में स्थित अंतरिक्ष में अपनी किरणों को नियमित किया. यजमानों की अभिलाषा करने वाले अग्नि ने धरती को अपना वर्षावाला रूप दिया. (५) सप्त मर्यादाः कवयस्ततक्षुस्तासामेकामिदभ्यंहुरो गात्. आयोर्ह स्कम्भ उपमस्य नीळे पथां विसर्गे धरुणेषु तस्थौ.. (६) मेधावियों ने सात मर्यादाओं को छोड़ दिया है. इन कार्यों में से एक को करने वाला भी पाप को प्राप्त करता है. मनुष्यों को पाप से रोकने वाले अग्नि समीपवर्ती मानवलोक में, सूर्यकिरणों के विचरने के स्थान में एवं जलों में रहते हैं. (६) असच्च सच्च परमे व्योमन् दक्षस्य जन्मन्नदितेरुपस्थे. अग्निहं नः प्रथमजा ऋतस्य पूर्व आयुनि वृषभश्च धेनुः.. (७) अग्नि सृष्टि से पहले अव्यक्त ओर सृष्टि के पश्चात् व्यक्त रूप में रहते हैं. अग्नि ने परम धाम आकाश में सूर्य से जन्म पाया है. अग्नि हमसे पहले उत्पन्न हुए हैं एवं यज्ञ से पहले वर्तमान थे. वे गाय ओर बैल दोनों रूपों में हैं. (७) सूक्त—६ देवता—अग्नि अयं स यस्य शर्मन्नन्नवोभिरग्नेरेधते जरिताभीष्टौ. ज्येष्ठेभिर्यो भानुभिर्ऋक्षूणां पर्यैति परिवीतो विभावा.. (१) ये वे ही अग्नि हैं, जिनकी रक्षा पाकर यज्ञ के समय स्तोता अपने घर में बढ़ता है. दीप्तिशाली अग्नि सूर्यकिरणों के प्रशंसनीय तेजों से युक्त होकर सब जगह जाते हैं. (१) ebook converter DEMO Watermarks*