ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1556, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंअग्नि यज्ञों को करें एवं उनका समय निश्चित करें. (३) यद्वो वयं प्रमिनाम व्रतानि विदुषां देवा अविदुष्टरासः. अग्निष्टद्विश्वमा पृणाति विद्वान्येभिर्देवाँ ऋतुभिः कल्पयाति.. (४) हे देवो! आप अतिशय धनवान् हैं और हम अज्ञानी हैं. हमने आपसे संबंधित कर्म त्याग दिए हैं, इसे आप जानते हैं. इस बात को जानने वाले अग्नि हमारे सभी कर्मों को पूर्ण करें. अग्नि यज्ञ के योग्य समयों के द्वारा देवों को समर्थ बनाते हैं. (४) यत्पाकत्रा मनसा दीनदक्षा न यज्ञस्य मन्वते मर्त्यासः. अग्निष्टद्धोता क्रतुविद्विजानन्यजिष्ठो देवाँ ऋतुशो यजाति.. (५) दुर्बल मनुष्य ज्ञानरहित होने के कारण जिन यज्ञकर्मों को नहीं जानते, होता एवं अतिशय यज्ञकर्त्ता अग्नि उनको जानते हैं. वे यज्ञ के योग्य समय में देवों का यज्ञ करें. (५) विश्वेषां ह्यध्वराणामनीकं चित्रं केतुं जनिता त्वा जजान. स आ यजस्व नृवतीरनू क्षाःस्पार्हा इषः क्षुमतीर्विश्वजन्याः.. (६) हे अग्नि! विधाता ने तुम्हें सभी यज्ञों के प्रधान, नाना रूप एवं ज्ञापक के रूप में उत्पन्न किया है. तुम हमें दासों से युक्त भूमि दो. हे अभिलाषा योग्य अग्नि! तुम हमें स्तुतिमंत्रों से युक्त और सर्व हितकारी अन्न दो. (६) यं त्वा द्यावापृथिवी यं त्वापस्त्वष्टा यं त्वा सुजनिमा जजान. पन्थामनु प्रविद्वान्पितृयाणं द्युमदग्ने समिधानो वि भाहि.. (७) हे अग्नि! द्यावा-पृथिवी और अंतरिक्ष ने तुम्हें जन्म दिया. शोभन जन्म वाले प्रजापति ने तुम्हें उत्पन्न किया. हे पितृमार्ग जानने वाले एवं प्रज्वलित अग्नि! तुम दीप्तिशाली होकर विराजते हो. (७) सूक्त—३ देवता—अग्नि इनो राजन्रतिः समिद्धो रौद्रो दक्षाय सुषुमाँ अदर्शि. चिकिद्धि भाति भासा बृहतासिक्रीमेति रुशतीमपाजन्.. (१) हे दीप्तिशाली, सबके स्वामी, देवों के पास हवि लेकर जाने वाले, प्रज्वलित, शत्रुओं के लिए भयानक एवं वनस्पतियों में स्थित अग्नि! तुम्हें लोग यजमानों की धनवृद्धि के लिए देखते हैं. सबको जानने वाले अग्नि विशेष रूप से दीप्ति धारण करते हैं तथा अपने महान् तेज के द्वारा श्वेत वर्ण की दीप्ति फैलाते हुए जाते हैं. (१) कृष्णां यदेनीमभि वर्पसा भूज्जनयन्योषां बृहतः पितुर्जाम्.