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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

सूक्त—१७२ देवता—मरुद्गण

हे इंद्र! तुम मरुतों की रक्षा करो. तुम्हारी कृपा से ही वे अधिक शक्तिशाली बने हैं. मरुतों के साथ-साथ हमारे प्रति भी क्रोधरहित बनो. शोभन बुद्धि वाले मरुतों के साथ मिलकर तुम शत्रुओं को हराते हुए हमारे प्रति कृपालु बनो. हम अन्न, बल और दीर्घ आयु प्राप्त करें. (६) सूक्त—१७२ देवता—मरुद्गण चित्रो वोऽस्तु यामश्चित्र ऊती सुदानवः. मरुतो अभिभानवः.. (१) हे मरुतो! हमारे यज्ञ में तुम्हारा आगमन आश्चर्यजनक हो. हे शोभन दान एवं उत्तम प्रकाश वाले मरुतो! आपका शुभ आगमन हमारी रक्षा करे. (१) आरे सा वः सुदानवो मरुत ऋञ्जती शरुः. आरे अश्मा यमस्यथ.. (२) हे शोभनदानशील मरुतो! तुम्हारे चमकते हुए एवं हिंसक आयुध हमसे दूर रहें. तुम्हारे द्वारा फेंका गया पाषाणमय आयुध हमसे दूर रहे. (२) तृणस्कन्दस्य नु विशः परिवृङ्क्त सुदानवः. ऊर्ध्वान्नः कर्त जीवसे.. (३) हे शोभन दान वाले मरुतो! यद्यपि मेरी प्रजा तिनकों के समान तुच्छ हैं तथापि उनकी रक्षा करो तथा हमें चिरकाल तक जीवित रहने के लिए उन्नत करो. (३) सूक्त—१७३ देवता—इंद्र गायत्साम नभन्यं१ यथा वेरर्चाम तद्वावृधानं स्वर्वत्. गावो धेनवो बर्हिष्यदब्धा आ यत्सद्मानं दिव्यं विवासान्.. (१) हे इंद्र! उद्गाता सामवेद को इस प्रकार गाता है कि वह आकाश में गूंज जाए और आप उसे समझ लें. हम उस बढ़ते हुए सामगान की पूजा स्वर्ग के समान करते हैं. जिस प्रकार दुधारू और हिंसारहित गाएं अपने स्थान पर बैठती हैं, उसी प्रकार मैं तुम्हारी सेवा करता हूं. (१) अर्चद्वृषा वृषभिः स्वेदुहव्यैर्मृगो नाश्वो अति यज्जगुर्यात्. प्र मन्द्युर्मनां गूर्त होता भरते मर्यो मिथुना यजत्रः.. (२) यजमान हव्य देने वाले अध्वर्यु को साथ लेकर इंद्र की पूजा करते हैं. वे सोचते हैं कि इंद्र प्यासे मृग के समान हव्य के प्रति शीघ्र आ जाएंगे. हे बलशाली इंद्र! स्तोत्र की इच्छा करने वाले देवों की स्तुति करता हुआ होता, यजमान एवं उसकी पत्नी भली प्रकार यज्ञ पूरा करते हैं. (२) ebook converter DEMO Watermarks*

नक्षद्धोता परि सद्म मिता यन्भरद्गर्भमा शरदः पृथिव्याः. क्रन्ददश्वो नयमानो रुवद्गौरन्तर्दूतो न रोदसी चरद्वाक्.. (३) हवन पूर्ण करने वाले अग्नि, गार्हपत्य आदि स्थानों के चारों ओर फैले हैं एवं वर्ष भर में धरती से उत्पन्न होने वाले अन्न को धारण करते हैं. अग्नि घोड़े और बैल की तरह शब्द करते हुए हवि का अन्न लेकर धरती और आकाश के मध्य में दूत के समान बातें करते हैं. (३) ता कर्माषितरास्मै प्र च्यौत्नानि देवयन्तो भरन्ते. जुजोषदिन्द्रो दस्मवर्चा नासत्येव सुगम्यो रथेष्ठाः.. (४) हम इंद्र को लक्ष्य करके अत्यंत व्यापक हवि प्रदान करेंगे. देवों को अपने अनुकूल बनाने के लिए यजमान उत्तम स्तोत्र पढ़ते हैं. अश्विनीकुमारों के समान तेजस्वी, सुंदर एवं सुख से प्राप्त करने योग्य इंद्र रथ पर बैठकर हमारी स्तुतियों को सुनें. (४) तमु ष्टुहीन्द्रं यो ह सत्वा यः शूरो मघवा यो रथेष्ठाः. प्रतीचश्चिद्घोधीयान्व्ऋषण्वान्ववृषश्चित्तमसो विहन्ता.. (५) हे होता! इंद्र की स्तुति करो. वे अनंत शक्ति वाले, शूर, धनवान्, रथ पर स्थिर, सामने लड़ने वाले योद्धाओं में उत्तम, वज्रधारणकर्त्ता एवं मेघ के विनाशक हैं. (५) प्र यदित्था महिना नृभ्यो अस्त्यरं रोदसी कक्ष्यें३ नास्मै. सं विव्य इन्द्रो वृजनं न भूमा भर्ति स्वधावाँ ओपशमिव द्याम्.. (६) इंद्र अपने महत्त्व के कारण यज्ञकर्त्ता यजमानों को स्वर्ग प्रदान करने में समर्थ हैं. धरती और आकाश उनके संचरण के लिए पर्याप्त नहीं हैं. जैसे बैल सींगों को धारण करता है, उसी प्रकार अन्न के स्वामी इंद्र स्वर्ग को धारण करते हैं. जैसे आकाश धरती को घेरे हुए है, उसी प्रकार इंद्र तीनों लोकों को व्याप्त करते हैं. (६) समत्सु त्वा शूर सतामुराणं प्रपथिन्तमं परितंसयध्यै. सजोषस इन्द्रं मदे क्षोणीः सूरिं चिद्ये अनुमदन्ति वाजैः.. (७) हे शूर इंद्र! तुम युद्धों में उन लोगों को बल प्रदान करते हो एवं उत्तम मार्ग दिखाते हो, जो तुम्हारा ही आश्रय लेकर युद्ध में प्रवृत्त होते हैं. तुम्हारी सेवा करके प्रसन्न होने वाले मरुद्गण युद्ध में प्रयत्न करते हैं. (७) एवा हि ते शं सवना समुद्र आपो यत्त आसु मदन्ति देवीः. विश्वा ते अनु जोष्या भूद्गौः सूरीँश्चिद्यदि धिषा वेषि जनान्.. (८) हे इंद्र! तुम्हारे उद्देश्य से किए गए सोम याग इस प्रकार सुखकर हों कि आकाश में स्थित दिव्य-जल प्रजाओं के कल्याण के लिए तुम्हें प्रसन्न करें. स्तोत्र रूपी समस्त वाणी तुम्हें ebook converter DEMO Watermarks*

प्रसन्न करे और तुम वर्षा करके स्तुतिकर्त्ता भक्तों की इच्छा पूरी करो. (८) असाम यथा सुखखाय एन स्वभिष्टयो नरां न शंसै:. असद्यथा न इन्द्रो वन्दनेष्ठास्तुरो न कर्म नयमान उक्था.. (९) हे स्वामी इंद्र! ऐसी कृपा करो कि हम तुम्हारे सखा बनकर अपनी स्तुतियों द्वारा उसी प्रकार अपनी अभिलाषाएं पूर्ण कर सकें, जिस प्रकार राजा की स्तुति से करते हैं. हे इंद्र! हम जिस समय स्तुति करें, उस समय तुम उपस्थित होकर हमारी स्तुतियों के साथ ही हमारे यज्ञ को भी शीघ्र स्वीकार करो. (९) विष्पर्धसो नरां न शंसैरस्माकासदिन्द्रो वज्रहस्त:. मित्रायुवो न पूर्षतिं सुशिष्ठौ मध्यायुव उप शिक्षन्ति यज्ञै:.. (१०) मनुष्य जिस प्रकार स्तुति द्वारा विरोधियों को मित्र बना लेते हैं. उसी प्रकार हम भी इंद्र को सखा बनाएंगे. वज्रधारी इंद्र की शक्ति हमारी बनेगी. जिस प्रकार मित्र बनने के इच्छुक लोग नगर के योग्य शासक स्वामी की पूजा करते हैं, उसी प्रकार हम श्री और यश प्राप्त करने की इच्छा वाले अध्वर्यु इंद्र की पूजा करते हैं. (१०) यज्ञो हि ष्मेन्द्रं कश्चिदृन्धञ्जुहुराणश्चिन्मनसा परियन्. तीर्थे नाच्छा तातृषाणमोको दीर्घो न सिध्रमा कृणोत्यध्वा.. (११) यज्ञ का अनुष्ठान करने वाला यज्ञ द्वारा इंद्र की ओर बढ़ता है एवं कुटिल गति व्यक्ति सदा मन में दु:खी रहता है, जैसे मार्ग में स्वच्छ जल सामने पाकर प्यासा व्यक्ति प्रसन्न होता है एवं जल तक देर में पहुंचने वाला टेढ़ा मार्ग प्यासे को दु:खी करता है. (११) मो षू ण इन्द्रात्र पृत्सु देवैरस्ति हि ष्मा ते शुष्मिन्नवया:. महश्चिद्यस्य मीळ्हुषो यव्या हविष्मतो मरुतो वन्दते गी:.. (१२) हे इंद्र! संग्राम उपस्थित होने पर मरुद्गणों के साथ हमें छोड़ मत देना. हे शक्तिशाली! तुम्हारा यज्ञभाग मरुतों से अलग है. हमारी फलों से मिली हुई स्तुति हवियुक्त एवं दानशील मरुतों की वंदना करती है. (१२) एष स्तोम इन्द्र तुभ्यमस्मे एतेन गातुं हरिवो विदो न:. आ नो ववृत्या: सुविताय देव विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम्.. (१३) हे इंद्र! यह स्तुतिसमूह तुम्हारे लिए है. हे अश्वस्वामी इंद्र! इस स्तोत्र रूपी मार्ग से हमारे यज्ञ को जानो और सहज ही हमारे समीप आओ. हम अन्न, बल और दीर्घ आयु प्राप्त करें. (१३) सूक्त—१७४ देवता—इंद्र ebook converter DEMO Watermarks*

त्वं राजेन्द्रे ये च देवा रक्षा नॄन्पाह्यसुर त्वमस्मान्. त्वं सत्पतिर्मघवा नस्तरुत्रस्त्वं सत्यो वसवानः सहोदाः.. (१) हे इंद्र! तुम समस्त विश्व और देवों के राजा हो. तुम मनुष्यों की रक्षा करो. हे शत्रुनाशक! तुम हमारा पालन करो. तुम सज्जनों के पालक, धन के स्वामी एवं हमारे उद्धारकर्त्ता हो. तुम सत्य फल वाले, अपने तेज से सबको ढकने वाले एवं स्तुतिकर्ताओं के शक्तिदाता हो. (१) दनो विश इन्द्र मृध्रवाचः सप्त यत्पुरः शर्म शारदीर्दत्. ऋणोरपो अनवद्यार्णा यूने वृत्रं पुरुकुत्साय रन्धीः.. (२) हे इंद्र! जिस समय तुमने पूरे वर्ष तक दृढ़ की गई सात नगरियों को नष्ट किया था, उस समय वहां रहने वाली एवं क्षमायाचना करती हुई प्रजा का सुख से दमन किया था. हे अनिंदित इंद्र! तुमने बहने वाला जल दिया एवं तरुण अवस्था वाले राजा पुरुकुत्स के कल्याण के निमित्त वृत्र का हनन किया था. (२) अजा वृत इन्द्र शूरपत्नीर्द्यां च येभिः पुरुहूत नूनम्. रक्षो अग्निमशुषं तूर्वयाणं सिंहो न दमे अपांसि वस्तोः.. (३) हे बहुतों द्वारा स्तुत्य इंद्र! तुम असुरों द्वारा रक्षित पुरियों को जीतते जाते हो. तुम वहां से मरुत् आदि अनुचरों सहित स्वर्ग में जाते हो. वहां तुम अशांत एवं शीघ्रगंता अग्नि की इसलिए रक्षा करते हो कि वे यज्ञगृह में अपना यज्ञकर्म पूरा कर सकें. जैसे सिंह वन की रक्षा करता है, उसी प्रकार तुम अग्नि की रक्षा करते हो. (३) शेषन्नु त इन्द्र सस्मिन्योन्नौ प्रशस्तये पवीरवस्य मह्ना. सृजदर्णांस्यव यद्युधा गास्तिष्ठद्धरी धृषता मृष्ट वाजान्.. (४) हे इंद्र! तुम्हारे शत्रु वज्र की प्रशंसा के बहाने तुम्हारी महिमा का वर्णन करते हुए अपने उत्पत्ति स्थान में सो जावें. जब तुम प्रहार का साधन वज्र लेकर जाते हो, तब नीचे की ओर जल बरसाते हो और अपने अश्वों वाले रथ पर बैठते हो. तुम अपनी शक्ति से फसलों की वृद्धि करते हो. (४) वह कुत्समिन्द्र यस्मिञ्चाकन्च्यूमन्यू ऋञ्ज्रा वातस्याश्वा. प्र सूरश्चक्रं वृहतादभीकेऽभि स्पृधो यासिषद्वज्रबाहुः.. (५) हे इंद्र! जिस यज्ञ में तुम कुत्स ऋषि की इच्छा करते हो एवं अपने सततगामी, सरलगति वाले एवं वायुवेग वाले घोड़ों को हांककर ले जाते हो, सूर्य अपने रथ का चक्र उस यज्ञ के समीप ले जावें एवं वज्र हाथ में पकड़ने वाले इंद्र संग्राम करने वाले शत्रुओं का सामना करें. (५) जघन्वाँ इन्द्र मित्रैरूचोदप्रवृद्धो हरिवो अदाशून्. ebook converter DEMO Watermarks*

प्र ये पश्यन्नर्यमणं सचायोस्त्वया शूर्ता वहमाना अपत्यम्.. (६) हे अश्वस्वामी इंद्र! तुमने स्तोत्रों से वृद्धि प्राप्त करके ऐसे लोगों का वध किया जो दान नहीं देते थे और तुम्हारे मित्र यजमानों के शत्रु थे. जो तुम्हें आश्रयदाता के रूप में देखते एवं जो हव्य देने के लिए तुम्हारे सामने आते हैं, वे तुमसे संतान पाते हैं. (६) रपत्कविरिन्द्रार्कसातौ क्षां दासायोपबर्हणीं कः. करत्तिस्रो मघवा दानुचित्रा नि दुर्योणे कुयवाचं मृधि श्रेत्.. (७) हे इंद्र! अन्न प्राप्ति के निमित्त क्रांतदर्शी होता तुम्हारी स्तुति करता है. तुमने दास असुर का वध करके धरती को उसकी शय्या बनाया था. इंद्र ने तीन भूमियों का दानरूपी विचित्र कार्य करके दुर्योणि राजा के कल्याण के लिए कुयवाच को मारा था. (७) सना ता त इन्द्र नव्या आगुः सहो नभोऽविरणाय पूर्वीः. भिनत्पुरो न भिदो अदेवीर्ननमो वधरदेवस्य पीयोः.. (८) हे इंद्र! नवीनतम ऋषि तुम्हारे अति प्राचीन वीरकर्मों की स्तुति करते हैं. तुमने युद्ध समाप्त करने के लिए अनेक हिंसकों को समाप्त किया है. तुमने विरोधियों के देवशून्य नगरों को नष्ट किया तथा दानरहित विरोधी वृत्र के ऊपर अपना वज्र झुकाया. (८) त्वं धुनिरिन्द्र धुनिमतीर्ऋणोरपः सीरा न स्रवन्तीः. प्र यत्समुद्रमति शूर पर्षि पारया तुर्वशं यदुं स्वस्ति.. (९) हे इंद्र! तुम शत्रुओं को कंपित करने वाले हो, इसलिए बहती हुई सीरा नदी के समान तरंगों वाला जल धरती पर बहाते हो. हे शूर! तुमने सागर को जल से पूर्ण करते समय यदु और तुर्वसु राजाओं का पालन करके उनका कल्याण किया. (९) त्वमस्माकमिन्द्र विश्वध स्या अवृकतमो नरां नृपाता. स नो विश्वासां स्पृधां सहोदा विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम्.. (१०) हे इंद्र! तुम सदा हमारे उत्तम रक्षक एवं मनुष्यों के रक्षक बनो, तुम हमारी सेना को बल प्रदान करो. हम अन्न, धन और दीर्घ आयु प्राप्त करें. (१०) सूक्त—१७५ देवता—इंद्र मत्स्यपायि ते महः पात्रस्येव हरिवो मत्सरो मदः. वृषा ते वृष्ण इन्दुवाजी सहस्रसातमः.. (१) हे अश्वस्वामी इंद्र! महान् एवं पूज्य सोमरस जिस प्रकार पात्र में रखा है, उसी प्रकार तुम भी इसे स्वीकार करो. तुम इसे पीकर प्रसन्नता प्राप्त करोगे. हे कामवर्षी इंद्र! यह सोम तुम्हारी

अभिलाषा पूर्ण करके अभिमत सुख देगा. (१) आ नस्ते गन्तुमत्सरो वृषा मदो वरेण्यः. सहावाँ इन्द्र सानसिः पृतनाषाळमर्त्यः.. (२) हे इंद्र! प्रसन्नतादाता, कामवर्षी, तृप्त करने वाला, श्रेष्ठ, शक्तिशाली, शत्रु सेनाओं का नाश करने वाला एवं अविनाशी सोमरस तुम्हें मिले. (२) त्वं हि शूरः सनिता चोदयो मनुषो रथम्. सहावान्दस्युमव्रतमोषः पात्रं न शोचिषा.. (३) हे शूर एवं दाता इंद्र! मुझ मनुष्य की अभिलाषा पूरी करो. सोमरस तुम्हारा सहायक है. अग्नि जिस प्रकार अपनी लपटों से अपने ही आधारभूत पात्र को जलाता है, उसी प्रकार तुम व्रतहीन असुर को नष्ट करो. (३) मुषाय सूर्य कवे चक्रमीशान ओजसा. वह शुष्णाय वधं कुत्सं वातस्याश्वैः.. (४) हे मेधावी एवं समर्थ इंद्र! तुमने अपनी शक्ति से सूर्य के एक पहिए को चुरा लिया था. तुम शुष्ण नामक असुर का वध करने के लिए वायु के समान तेज चलने वाले घोड़ों की सहायता से वज्र लेकर आओ. (४) शुष्मिन्तमो हि ते मदो द्युम्निन्तम उत क्रतुः. वृत्रघ्ना वरिवोविदा मंसीष्ठा अश्वसातमः.. (५) हे इंद्र! तुम्हारी प्रसन्नता सबसे अधिक शक्तिशाली है एवं तुम्हारे यज्ञ में सबसे अधिक अन्न होता है. हे अश्व रूप अनेक धन देने वाले इंद्र! तुम वृत्रघाती एवं धन देने वाले दोनों यज्ञों का समर्थन करो. (५) यथा पूर्वेभ्यो जरितृभ्य इन्द्र मयड्वापो न तृष्यते बभूथ. तामनु त्वा निविदं जोहवीमि विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम्.. (६) हे इंद्र! तुमने प्राचीन स्तोताओं को उसी प्रकार सुख दिया, जिस प्रकार जल प्यासे व्यक्ति को प्रसन्न करता है. इसी कारण हम बार-बार तुम्हारी स्तुति करते हैं कि हम अन्न, बल और दीर्घ आयु प्राप्त कर सकें. (६) सूक्त—१७६ देवता—इंद्र मत्सि नो वस्यइष्टय इन्द्रमिन्दो वृषा विश. ऋघायमाण इन्वसि शत्रु्रमन्ति न विन्दसि.. (१) हे सोम! तुम हमारी धनप्राप्ति के लिए इंद्र को प्रसन्न करो एवं कामवर्षी इंद्र के भीतर प्रवेश करो. तुम शत्रुओं की हिंसा करते हुए उन्हें घेर लेते हो. कोई भी शत्रु तुम्हारे समीप नहीं ebook converter DEMO Watermarks*

आता. (१) तस्मिन्ना वेशया गिरो य एकश्चर्षणीनाम्. अनु स्वधा यमुप्यते यवं न चर्कृषद्वृषा.. (२) हे होता! अपनी स्तुतिरूपी वाणी को इंद्र में स्थापित करो. वे ज्ञान वाले मनुष्यों के एकमात्र आश्रय हैं. स्वधा शब्द के बाद उन्हें भी हव्य अन्न दिया जाता है. किसान जिस प्रकार पके जौ को ग्रहण करता है, उसी प्रकार इंद्र हमारा हव्य स्वीकार करते हैं. (२) यस्य विश्वानि हस्तयोः पञ्च क्षितीनां वसु. स्पाशयस्व यो अस्मध्रुग्दिव्येनाशनिर्जहि.. (३) जिन इंद्र के हाथों में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और निषाद पांचों प्रकार के जनों को प्रसन्न करने वाला सभी प्रकार का अन्न है, वे इंद्र हमसे द्रोह करने वाले को वज्र बनकर नष्ट करें. (३) असुन्वन्तं समं जहि दूणाशं यो न ते मयः. अस्मभ्यमस्य वेदनं दद्धि सूरिश्चिदोहते.. (४) हे इंद्र! सोमरस न निचोड़ने वालों, दुःसाध्य विनाश वालों एवं सुख न पहुंचाने वालों का नाश करो. ऐसे लोगों का धन हमें दो. तुम्हारा स्तोता ही धन पाता है. (४) आवो यस्य द्विबर्हसोऽर्केषु सानुषगसत्. आजाविन्द्रस्येन्दो प्रावो वाजेषु वाजिनम्.. (५) हे सोम! उस यजमान की रक्षा करो, जिसके स्तोत्र और हव्य संबंधी मंत्रों में तुम सदा स्थित रहते हो. हे सोम! धन के लिए होने वाले युद्धों में अन्न के स्वामी इंद्र की रक्षा करो. (५) यथा पूर्वेभ्यो जरितृभ्य इन्द्र मयइवापो न तृष्यते बभूथ. तामनु त्वा निविदं जोहवीमि विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम्.. (६) हे इंद्र! जिस प्रकार जल प्यासे को प्रसन्न करता है, उसी प्रकार तुमने प्राचीन स्तुतिकर्त्ता पर कृपा की थी. इसीलिए मैं तुम्हारी सुखदायक स्तुति बार-बार कर रहा हूं. मैं अन्न, बल एवं दीर्घ आयु प्राप्त करूं. (६) सूक्त—१७७ देवता—इंद्र आ चर्षणिप्रा वृषभो जनानां राजा कृष्टीनां पुरुहूत इन्द्रः. स्तुतः श्रवस्यन्नवसोप मद्रिग्र्युक्त्वा हरी वृषणा याह्यर्वाङ्.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*

धन आदि द्वारा सभी मनुष्यों को प्रसन्न करने वाले, कामवर्षी, सब लोगों के स्वामी एवं बहुतों द्वारा स्तुत इंद्र हमारे पास आवें. हे इंद्र! हमारी स्तुति सुनकर हव्य अन्न की इच्छा करते हुए दोनों कामवर्षी घोड़ों को रथ में जोड़कर हमारी रक्षा के लिए सामने आओ. (१) ये ते वृषणो वृषभास इन्द्र ब्रह्मयुजो वृषरथासो अत्याः. ताँ आ तिष्ठ तेभिरा याह्यर्वाङ् हवामहे त्वा सुत इन्द्र सोमे.. (२) हे इंद्र! तुम्हारे घोड़े तरुण, उत्तम, कामवर्षी, मंत्रयुक्त एवं रथ में जोड़ने योग्य हैं. तुम उन पर सवार होकर, उनके साथ हमारे सम्मुख आओ. (२) आ तिष्ठ रथं वृषणं वृषा ते सुतः सोमः परिषिक्ता मधूनि. युक्त्वा वृषभ्यां वृषभ क्षितीनां हरिभ्यां याहि प्रवतोप मद्रिक्.. (३) हे इंद्र! अपने कामवर्षी रथ पर बैठो, क्योंकि तुम्हारे लिए निचोड़ा हुआ सोमरस और मधुर घृत तैयार है. हे कामवर्षी इंद्र! अपने घोड़ों को रथ में जोड़ो और सत्कर्म करने वाले यजमानों पर अनुग्रह करने के लिए शीघ्रगामी रथ से हमारे सम्मुख आओ. (३) अयं यज्ञो देवया अयं मियेध इमा ब्रह्माrootययमिन्द्र सोमः. स्तीर्णं बर्हिरा तु शक्र प्र याहि पिबा निषद्य वि मुचा हरी इह.. (४) हे इंद्र! यह यज्ञ देवों को प्राप्त करने वाला है. यह यज्ञ-संबंधी पशु, ये मंत्र, यह निचोड़ा हुआ सोमरस और बिछे हुए कुश, सब तुम्हारे लिए हैं. हे शतक्रतु! तुम शीघ्र आओ और कुशों पर बैठकर सोमरस पिओ. तुम इस यज्ञ में अपने घोड़ों को रथ से अलग करो. (४) ओ सुष्टुत इन्द्र याह्यर्वाङुप ब्रह्माणि मान्यस्य कारोः. विद्याम वस्तोरवसा गृणन्तो विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम्.. (५) हे भली प्रकार स्तुत्य इंद्र! आदरणीय स्तोता के मंत्रों को स्वीकार करके हमारे सामने आओ. स्तुति करते हुए हम तुम्हारी रक्षा पाकर निवासस्थान के साथ ही अन्न, बल और दीर्घ आयु प्राप्त करेंगे. (५) सूक्त—१७८ देवता—इंद्र यद्ध स्या त इन्द्र शृष्टिरस्ति यया बभूथ जरितृभ्य ऊती. मा नः कामं महयन्तमा धग्विश्वा ते अश्यां पर्याप आयोः.. (१) हे इंद्र! तुम्हारी वह समृद्धि सब जगह प्रसिद्ध है, जिसके द्वारा तुम स्तोताओं की रक्षा में समर्थ होते हो. हमें महान् बनाने की अपनी अभिलाषा तुम समाप्त मत करो. तुम्हारी सभी मानवोचित वस्तुओं को हम प्राप्त करें. (१) ebook converter DEMO Watermarks*

न घा राजेन्द्र आ दभन्नो या नु स्वसारा कृणवन्त योनी. आपश्चिदस्मै सुतुका अवेष्णन्गम्न इन्द्रः सख्या वयश्च.. (२) हे राजा इंद्र! परस्पर बहिन-भाई बने हुए रात-दिन अपने उत्पत्ति स्थल में वर्षादि कर्म करके हमारे यज्ञकर्म को समाप्त न करें. शक्तिदायक हवि इंद्र को प्राप्त होती है. इंद्र हमें अपनी मित्रता एवं अन्न दें. (२) जेता नृभिरिन्द्रः पृत्सु शूरः श्रोता हवं नाधमानस्य कारोः. प्रभर्ता रथं दाशुष उपाक उद्यन्ता गिरो यदि च त्मना भूत्.. (३) शूर इंद्र युद्ध के नेता मरुतों के साथ युद्ध में विजय प्राप्त करते हैं एवं कृपा की अभिलाषा करने वाले स्तोता की पुकार सुनते हैं. वे जिस समय अपनी इच्छा से स्तुतिवचन सुनना चाहते हैं, उस समय अपना रथ हव्य देने वाले यजमान के पास ले आते हैं. (३) एवा नृभिरिन्द्रः सुश्रवस्या प्रखादः पृक्षो अभि मित्रिणो भूत्. समर्ध इषः स्तवते विवाचि सत्राकरो यजमानस्य शंसः.. (४) यजमान उत्तम धन पाने की इच्छा से जो अन्न देता है, उसे इंद्र अधिक मात्रा में खाते हैं और अपने भक्त यजमान के शत्रुओं को पराजित करते हैं. वे भांति-भांति के शब्दों वाले युद्ध में यजमान के यज्ञकर्म की प्रशंसा करते हैं एवं सच्चा फल देने के लिए हवि ग्रहण करते हैं. (४) त्वया वयं मघवन्निन्द्र शत्रूनभि ष्याम महतो मन्यमानान्. त्वं त्राता त्वमु नो वृधे भूर्विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम्.. (५) हे इंद्र! तुम्हारी सहायता से हम उन शत्रुओं का वध करें, जो अपने आपको बड़ा शक्तिशाली मानते हैं. तुम हमारे रक्षक एवं पालनकर्त्ता बनो. हम अन्न, बल और दीर्घ-आयु प्राप्त करें. (५) सूक्त—१७९ देवता—रति पूर्वीरहं शरदः शश्रमाणा दोषा वस्तोरुषसो जरयन्तीः. मिनाति श्रियं जरिमा तनूनामप्यू नु पत्नीर्वृषणो जगम्युः.. (१) लोपामुद्रा बोली—“हे अगस्त्य! मैं पूर्वकालिक अनेक वर्षों से रात, दिन और उषा काल में शरीर को जीर्ण करती हुई तुम्हारी सेवा में लगी रही हूं. इस समय बुढ़ापा मेरे अंगों का सौंदर्य नष्ट कर रहा है. क्या इस अवस्था में पुरुष नारियों के साथ समागम न करें? (१) ये चिद्धि पूर्व ऋतसाप आसन्त्साकं देवेभिरवदन्नृतानि. ebook converter DEMO Watermarks*

ते चिदवासुर्ऋह्यन्तमापुः समू नु पत्नीर्वृषभिर्जगम्युः.. (२) “हे अगस्त्य! प्राचीन महर्षियों ने सत्य को प्राप्त किया. वे देवों के साथ सत्य बोलते थे. उन्होंने भी पत्नियों में वीर्य का स्खलन किया और इस कार्य को समाप्त नहीं किया. तपस्या करती हुई पत्नियां भोग समर्थ पतियों के समीप जाती थीं.” (२) न मृषा श्रान्तं यदवन्ति देवा विश्वा इत्स्पृधो अभ्यश्नवाव. जयावेदत्र शतनीथमाजिं यत्सम्पृञ्चा मिथुनावभ्यजाव.. (३) अगस्त्य ने उत्तर दिया—“हे पत्नी! हम लोग व्यर्थ ही नहीं थके हैं. हमारी तपस्या से प्रसन्न देव हमारी रक्षा करते हैं. हम सभी भोगों को भोगने में समर्थ हैं. यदि हम और तुम इच्छा करें तो इस संसार में अब भी सुखसंभोग के सैकड़ों साधन प्राप्त कर सकते हैं. (३) नदस्य मा रुधतः काम आगन्नित आजातो अमुतः कुतश्चित्. लोपामुद्रा वृषणं नी रिणाति धीरमधीरा धयति श्वसन्तम्.. (४) “हे पत्नी! मैं मंत्रों के जप और ब्रह्मचर्य पालन में लगा रहा. फिर भी न जाने किस कारण मुझमें काम भाव उत्पन्न हो गया. तुम लोपामुद्रा वीर्य सेचन समर्थ मुझ पति के साथ संगत हो जाओ. तुम अधीर नारी बनकर मुझ महाप्राण पुरुष का भोग करो.” (४) इमं नु सोममन्तितो हृत्सु पीतमुप ब्रुवे. यत्सीमांगश्चकृमा तत्सु मृळतु पुलुकामो हि मर्त्यः.. (५) शिष्य कहने लगा—“उदर में पिया हुआ सोमरस मुझे सब पापों से छुड़ाकर सुखी करे, यह प्रार्थना मैं सच्चे मन से कर रहा हूं. मैंने जो पाप किया है, उससे मेरी रक्षा हो. क्यों मनुष्य मन में बहुत सी कामनाएं करता है? (५) अगस्त्यः खनमानः खनित्रैः प्रजामपत्यं बलमिच्छमानः. उभौ वर्णावृषिरुगः पुपोष सत्या देवेष्वाशिषो जगाम.. (६) “मेरे गुरु अगस्त्य ने यज्ञों द्वारा अभिमत फल एवं बहुत सी संतान की इच्छा की. उन्होंने काम और संयम दोनों उत्तम गुण प्राप्त किए एवं देवों से सच्चा आशीर्वाद पाया.” (६) सूक्त—१८० देवता—अश्विनीकुमार युवो रजांसि सुयमासो अश्वा रथो यद्वां पर्यर्णांसि दीयत्. हिरण्यया वां पवयः पृषायन्मध्वः पिबन्ता उषसः सचेथे.. (१) हे अश्विनीकुमारो! तीनों लोकों में जाने वाले तुम्हारे रथ के घोड़े तुम्हें अभिमत स्थान में पहुंचा देते हैं. उस समय तुम्हारे सुनहरे रथ की नेमियां तुम्हारी इच्छा पूरी करती हैं. तुम ebook converter DEMO Watermarks*

प्रातःकाल सोमरस पीते हुए हमसे मिलो. (१) युवमत्स्यस्याव नक्षथो यद्दिपत्मनो नर्यस्य प्रयज्योः. स्वसा यद्वां विश्वगूर्त्ती भराति वाजायेष्टे मधुपाविषे च.. (२) हे सबके द्वारा स्तुत्य एवं मधुपानकर्त्ता अश्विनीकुमारो! तुम्हारी बहिन उषा जिस समय तुम्हारे आने के लिए प्रभात करती है एवं यजमान अन्न और बल पाने के लिए तुम्हारी स्तुति करता है, उस समय तुम दोनों का नित्यगामी, विविध गतियों वाला, मनुष्यों का हितकारक एवं विशेष रूप से पूज्य रथ पहले ही चल देता है. (२) युवं पय उस्रियायामधत्तं पक्वमामायामव पूर्व्यं गोः. अन्तर्यद्दिनिनो वामृतप्सू ह्वारो न शुचिर्यजते हविष्मान्.. (३) हे अश्विनीकुमारो! तुमने गायों को दुधारू बनाया है. तुम गायों के थनों में पहले से पके हुए दूध को स्थापित करते हो. हे सत्यरूप! चोर वन के वृक्षों में जिस सावधानी से छिपा रहता है, उसी सावधानी से शुद्ध एवं हव्ययुक्त यजमान तुम्हारी स्तुति करता है. (३) युवं ह घर्मं मधुमन्तमत्रयेऽपो न क्षोदोऽवृणीतमेषे. तद्वां नरावश्विना पश्वइष्टी रथ्येव चक्रा प्रति यन्ति मध्वः.. (४) हे अश्विनीकुमारो! तुमने सुख के इच्छुक अत्रि मुनि के लिए गरम दूध और घी की नदियां बहा दी थीं. हे नेताओ! हम इसीलिए तुम्हारे लिए अग्नि में यज्ञ करते हैं. रथ का पहिया जिस प्रकार ढालू मार्ग पर अपने आप चलता है, उसी प्रकार सोमरस तुम्हें स्वतः प्राप्त होता है. (४) आ वां दानाय ववृतीय दस्रा गोरोहेण तौग्र्यो न जिब्रिः. अपः क्षोणी सचते माहिना वां जूर्णो वामक्षुरंहसो यजत्रा.. (५) हे शत्रुनाशक अश्विनीकुमारो! तुग्र राजा के पुत्र भुज्यु ने जिस प्रकार तुम्हें बुलाया था, उसी प्रकार मैं अपनी स्तुतियों द्वारा तुम्हें अपने यज्ञ में बुला लूंगा. तुम्हारी कृपा से ही धरती और आकाश मिले हैं. हे यज्ञ स्वामियो! यह बूढ़ा दुर्बल ऋषि पाप से छूट कर दीर्घ जीवन प्राप्त करे. (५) नि यद्युवेथे नियुतः सुदानू उप स्वधाभिः सृजथः पुरन्धिम्. प्रेषद्वेषद्वातो न सूरिरा महे ददे सुव्रतो न वाजम्.. (६) हे शोभनदानशील अश्विनीकुमारो! जब तुम अपने नियुत नाम के घोड़ों को रथ में जोड़ते हो, उस समय धरती को अन्न से पूर्ण बना देते हो. यह यजमान तुम्हें वायु के समान शीघ्र प्रसन्न करे एवं तुम्हारी कामना करे. इसके बाद यजमान उत्तम कर्म करने वाले व्यक्ति के समान अन्न प्राप्त करता है. (६) ebook converter DEMO Watermarks*

वयं चिद्धि वां जरितारः सत्या विपन्यामहे वि पणिर्हितावान्. अधा चिद्धि ष्माश्विनावन्दिन्द्या पाथो हिष्मा वृषणावन्तिदेवम्.. (७) हम भी तुम्हारे स्तोता एवं सत्य बोलने वाले हैं. हम तुम्हारी स्तुति कर रहे हैं. तुम यज्ञ न करने वाले परम धनी का त्याग करो. हे प्रशंसनीय एवं कामवर्षी अश्विनीकुमारो! तुम देवों के समीप सोमरस पिओ. (७) युवां चिद्धि ष्माश्विनावनु द्यून्विरुद्रस्य प्रस्रवणस्य सातौ. अगस्त्यो नरां नृतृ प्रशस्तः काराधुनीव चितयत्सहस्रैः.. (८) हे अश्विनीकुमारो! जिस प्रकार शंख शब्द करता है, उसी प्रकार यज्ञकर्त्ता मनुष्यों में उत्तम अगस्त्य ऋषि हजारों स्तुतियों द्वारा प्रतिदिन तुम्हें जगाते हैं. वे ग्रीष्म का दुःख दूर करने वाला वर्षा का जल चाहते हैं. (८) प्र यद्वहेथे महिना रथस्य प्र स्यन्द्रा याथो मनुषो न होता. धत्तं सूरिभ्य उत वा स्वश्व्यं नासत्या रयिषाचः स्याम.. (९) हे अश्विनीकुमारो! तुम अपने रथ की महिमा से हमारा यज्ञ पूर्ण करते हो. हे गतिशीलो! तुम यजमान के होता के समान यज्ञ के आरंभ में आकर यज्ञ के अंत में जाओ. तुम स्तोताओं को उत्तम अश्व प्रदान करो. हम भी धन प्राप्त करेंगे. (९) तं वां रथं वयमद्या हुवेम स्तोमैरश्विना सुविताय नव्यम्. अरिष्टनेमिं परि द्यामियानं विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम्.. (१०) हे अश्विनीकुमारो! हम स्तुतियों द्वारा तुम्हारे शीघ्रगति वाले, प्रशंसनीय, आकाश में उड़ने वाले तथा न टूटने योग्य नेमि वाले रथ को अपने यज्ञ में बुलाते हैं, जिससे हम अन्न, बल और दीर्घ आयु प्राप्त कर सकें. (१०) सूक्त—१८१ देवता—अश्विनीकुमार कदु प्रेष्ठाविषां रयीणामध्वर्यन्ता यदुन्निनीथो अपाम्. अयं वां यज्ञो अकृत प्रशस्तिं वसुधिती अवितारा जनानाम्.. (१) हे प्रियतम अश्विनीकुमारो! तुम यज्ञ के अन्नरूपी धन को कब ऊपर ले जाओगे और यज्ञ को पूर्ण करने की इच्छा से वर्षा का जल नीचे गिराओगे? तुम धन धारणकर्त्ता एवं मनुष्यों के आश्रयदाता हो. यह यज्ञ तुम्हारी प्रशंसा के रूप में ही किया जा रहा है. (१) आ वामश्वासः शुचयः पयस्पा वातरंहसो दिव्यासो अत्याः. मनोजुवो वृषणो वीतपृष्ठा एह स्वराजो अश्विना वहन्तु.. (२) ebook converter DEMO Watermarks*

हे अश्विनीकुमारो! तुम्हारे घोड़े शुद्ध, वर्षा का जल पीने वाले, वायु के समान शीघ्रगामी, दिव्य, मन के समान तेज चाल वाले, जवान और सुंदर पीठ वाले हैं. वे तुम्हें इस यज्ञ में लावें. (२) आ वां रथोऽवनिर्न प्रवत्वान्तृप्रवन्धुरः सुविताय गम्याः. वृष्णः स्थांतारा मनसो जवीयानहम्पूवों यजतो धिष्ण्या यः.. (३) हे ऊंचे स्थान के योग्य एवं अपने रथ में बैठे हुए अश्विनीकुमारो! तुम धरती के समान विस्तृत, बड़े जुआर वाले, वर्षा करने में समर्थ, मन के समान होड़ने वाले, अहंकारी एवं यज्ञ के योग्य अपने रथ को यज्ञस्थल में ले आओ. (३) इहेह जाता समवावशीतामरेपसा तन्वा३ नामभिः स्वैः. जिष्णुर्वामन्यः सुमखस्य सूरिर्दिवो अन्यः सुभगः पुत्र ऊहे.. (४) हे सूर्यचंद्र रूप में जन्म ग्रहण करने वाले पापरहित अश्विनीकुमारो! तुम्हारे शरीर की सुंदरता एवं माहात्म्य के कारण मैं बार-बार तुम्हारी स्तुति कर रहा हूं. तुम में से एक चंद्र बनकर यज्ञ प्रवर्तक के रूप में संसार को धारण करता है और दूसरा सूर्य के रूप में आकाश का पुत्र बनकर शोभन रश्मियों से संसार का पालन करता है. (४) प्र वां निचेरुः ककुहो वशाँ अनु पिशङ्गरूपः सदनानि गम्याः. हरी अन्यस्य पीपयन्त वाजैर्मथ्ना रजांस्यश्विना वि घोषैः.. (५) हे अश्विनीकुमारो! तुम में से एक का पीले रंग का श्रेष्ठ रथ हमारी इच्छा के अनुसार यज्ञभूमि में आ जाए एवं दूसरे को मनुष्य स्तुतियां तथा उसके घोड़ों को मथा हुआ खाद्य देकर प्रसन्न करे. (५) प्र वां शरद्वान्वृषभो न निष्षाट् पूर्वीरिषश्चरति मध्व इष्णन्. एवैरन्यस्य पीपयन्त वाजैर्वेषन्तीरूध्र्वां नद्यो न आगुः.. (६) हे अश्विनीकुमारो! तुम में से एक बादलों को तोड़ते हुए इंद्र के समान शत्रुओं को भगाते हैं एवं बहुत से अन्नों की अभिलाषा करते हुए जाते हैं दूसरे को गमन के लिए यजमान लोग हव्य द्वारा प्रसन्न करते हैं. उनके प्रसन्न होने पर किनारों को तोड़ने वाली जल से भरी नदियां हमारे पास आती हैं. (६) असर्जि वां स्थविरा वेधसा गीर्वाळ्हे अश्विना त्रेधा क्षरन्ती. उपस्तुताववतं नाधमानं यामन्नयामञ्छृणुतं हवं मे.. (७) हे विधाता अश्विनीकुमारो! तुम्हें दृढ़ बनाने के लिए अत्यंत उत्तम स्तुतियां बनाई गई हैं. वे तीन प्रकार से तुम्हारे पास पहुंचती हैं. तुम स्तुति सुनकर अभीष्ट फल चाहने वाले यजमान की रक्षा करो एवं जाते हुए अथवा खड़े होकर उसकी पुकार सुनो. (७) ebook converter DEMO Watermarks*

उत स्या वां रुशतो वप्ससो गीस्त्रिबर्हिषि सदसि पिन्वते नॄन्. वृषां वां मेघो वृषणा पीपाय गोर्न सेके मनुषो दशस्यन्.. (८) हे अश्विनीकुमारो! तुम तेजस्वी हो. तुम्हारी स्तुति तीन कुशों से युक्त यज्ञगृह में यजमान को प्रसन्न करे. हे कामवर्षको! तुमसे संबंधित बादल वर्षा करता हुआ मनुष्यों को धन देकर प्रसन्न करे. (८) युवां पूषेवाश्विना पुरन्धिरग्निर्मुषां न जरते हविष्मान्. हुवे यद्वां वरिवस्या गृणानो विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम्.. (९) हे अश्विनीकुमारो! पूषा के समान बुद्धिमान् एवं हव्य धारण करने वाला तुम्हारा यजमान अग्नि और उषा के समान तुम्हारी स्तुति करता है. सेवापरायण स्तोता के साथ-साथ यजमान भी तुम्हारी स्तुति करता है, जिससे हम अन्न, बल एवं दीर्घ आयु प्राप्त कर सकें. (९) सूक्त—१८२ देवता—अश्विनीकुमार अभूदिदं वयुनमो षु भूषता रथो वृषण्वान्मदता मनीषिणः. धियञ्जिन्वा धिष्ण्या विश्पलावसू दिवो नपाता सुकृते शुचिव्रता.. (१) हे मेधावी ऋत्विजो! मेरे मन में यह ज्ञान उत्पन्न हुआ है कि अश्विनीकुमारों का कामवर्षी रथ आ गया है. उनके सामने जाकर उन्हें स्तुति से प्रसन्न करो. वे मुझ पुण्यवान् को कर्मबुद्धि देने वाले, स्तुतियोग्य, विश्पला का कल्याण करने वाले, आदित्य के नाती एवं पवित्रकर्म करने वाले हैं. (१) इन्द्रतमा हि धिष्ण्या मरुत्तमा दस्रा दंसिष्ठा रथ्या रथीतमा. पूर्णं रथं वहेथे मध्व आचितं तेन दाश्वांसमुप याथो अश्विना.. (२) हे अश्विनीकुमारो! तुम निश्चय ही उत्तम स्वामी, स्तुति के योग्य, मरुतों में श्रेष्ठ, शत्रुनाशक, कर्म करने में अतिशय कुशल, रथ के स्वामी एवं रक्षा करने वालों में श्रेष्ठ हो. तुम मधु से भरे हुए रथ को सभी जगह ले जाते हो. तुम उसी रथ पर बैठकर यज्ञ में आओ. (२) किमत्र दस्रा कृणुथः किमासाथे जनो यः कश्चिदहविर्महीयते. अति क्रमिष्टं जुरतं पणेरसुं ज्योतिर्विप्राय कृणुतं वचस्यवे.. (३) हे अश्विनीकुमारो! तुम यहां क्या कर रहे हो? तुम इस मनुष्य के समीप क्यों ठहरे हो? यदि व्यक्ति यज्ञरहित होकर भी लोगों में आदर पा रहा हो तो उसे हराओ. उस पणि के प्राणों का नाश करो. मैं मेधावी तुम्हारी स्तुति कर रहा हूं. मुझे प्रकाश दो. (३) जम्भयतमभितो रायतः शुनो हतं मृधो विदथुस्तान्यश्विना.

वाचंवाचं जरितू रत्निनों कृतमुभा शंसं नासत्यावतं मम.. (४) हे अश्विनीकुमारो! उनको मार डालो जो कुत्ते के समान बुरी तरह भौंकते हुए हमें मारने आते हैं अथवा हमसे युद्ध करना चाहते हैं. जो तुम्हारी स्तुति करता है, उसकी प्रत्येक बात को सफल करो. हे नासत्यो! मेरी स्तुति की रक्षा करो. (४) युवमेतं चक्रथुः सिन्धुषु प्लवमात्मन्वन्तं पक्षिणं तौग्र्याय कम्. येन देवत्रा मनसा निरूहथुः सुपप्तनी पेतथुः क्षोदसो महः.. (५) हे अश्विनीकुमारो! तुमने तुग्र राजा के पुत्र के लिए सागर में तैरने वाली, दृढ़ एवं डांड़ों वाली नाव बनाई थी. सब देवों में तुम्हीं ने कृपा करके उसे सागर से निकाला एवं तुमने सहसा आकर विशाल सागर से उसका उद्धार किया था. (५) अवविद्धं तौग्र्यमप्स्व१न्तरनारम्भणे तमसि प्रविद्धम्. चतस्रो नावो जठलस्य जुष्टा उदश्विभ्यामिषिताः पारयन्ति.. (६) तुग्र का पुत्र भुज्यु शत्रु द्वारा नीचे को मुंह करके पानी में गिराया गया था, इसलिए अंधकार में बहुत दुःखी था. सागर में उसे चार नावें मिलीं जो अश्विनीकुमारों ने भेजी थीं. (६) कः स्विद्वृक्षो निष्ठितो मध्ये अर्णसो यं तौग्र्यो नाधितः पर्यषस्वजत्. पर्णा मृगस्य पतरोरिवारभ उदश्विना ऊहथुः श्रोमताय कम्.. (७) याचना करते हुए तुग्रपुत्र ने जल के मध्य एवं वृक्ष निर्मित जिस निश्चल रथ का सहारा लिया था. वह क्या था? जिस प्रकार गिरते हुए बलि पशु को सींग आदि से पकड़कर उठाते हैं, उसी प्रकार भुज्यु की रक्षा करके तुमने बहुत यश पाया. (७) तद्वां नरा नासत्यावनु ष्याद्यद्वां मानास उचथमवोचन्. अस्मादद्य सदसः सोम्यादा विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम्.. (८) हे नेता अश्विनीकुमारो! तुम अपने भक्तों द्वारा किए गए स्तुति वचनों को स्वीकार करो. तुम आज हमारे द्वारा किए जाते हुए सोम मार्ग के स्तोत्र को स्वीकार करो, जिससे हम अन्न, बल और दीर्घ आयु प्राप्त करें. (८) सूक्त—१८३ देवता—अश्विनीकुमार तं युञ्जाथां मनसो यो जवीयान् त्रिवन्धुरो वृषणा यस्त्रिचक्रः. येनोपयाथः सुकृतो दुरोणं त्रिधातुना पतथो विर्न पर्णैः.. (१) हे कामवर्षी अश्विनीकुमारो! उस रथ में घोड़े जोड़ो जो मन की अपेक्षा अधिक वेगशील, सारथि के बैठने के तीन स्थानों से युक्त, तीन पहियों वाला, तीन धातुओं से मढ़ा हुआ एवं ebook converter DEMO Watermarks*

इच्छा पूरी करने वाला है. जैसे पक्षी पंखों के सहारे तेजी से उड़ता है, उसी प्रकार तुम उस रथ से यज्ञ करने वाले यजमान के पास जाते हो. (१) सुवृद्रथो वर्तते यन्नभि क्षां यत्तिष्ठथः क्रतुमन्तानु पृक्षे. वपुर्वपुष्या सचतामियं गीर्दिवो दुहित्रोषसा सचेथे.. (२) हे अश्विनीकुमारो! तुम यज्ञ में हवि प्राप्त करने के निमित्त यज्ञ की ओर जिस रथ पर सवार होते हो, उसके पहिए सरलता से घूमते चलते हैं. तुम्हारे शरीर का हित करने वाली हमारी स्तुति तुम्हें प्राप्त हो एवं तुम आकाश की पुत्री उषा के साथ मिलन करो. (२) आ तिष्ठतं सुवृतं यो रथो वामनु व्रतानि वर्तते हविष्मान्. येन नरा नासत्येषयध्यै वर्तिर्याथस्तनयाय त्मने च.. (३) हे नेता अश्विनीकुमारो! हवि वाले यजमान की ओर जाने वाले अपने उस रथ पर बैठो, जिसके द्वारा तुम यज्ञ में पहुंचना चाहते हो, उसी के द्वारा यजमान को पुत्रलाभ कराने एवं अपना कल्याण करने के लिए यज्ञस्थल में आओ. (३) मा वां वृको मा वृकीरा दधर्षीन्मा परि वर्क्तमुत माति धक्तम्. अयं वां भागो निहित इयं गीर्दस्राविमे वां निधयो मधूनाम्.. (४) हे शत्रुनाशक अश्विनीकुमारो! तुम्हारी कृपा से हिंसक मादा एवं नर पशु मुझे दुःखी न करें. तुम अपना धनादि दूसरे किसी को मत देना. यह तुम्हारी स्तुति है, यह हव्य का भाग है और यह सोमरस का पात्र है. (४) युवां गोतमः पुरुमीळ्हो अत्रिर्दस्रा हवतेऽवसे हविष्मान्. दिशं न दिष्टामृजूयेव यन्ता मे हवं नासत्योप यातम्.. (५) हे अश्विनीकुमारो! गौतम, पुरुमीढ एवं अत्रि ऋषि हव्य हाथ में लेकर तुम्हें प्रसन्न करने के लिए उसी प्रकार बुलाते हैं, जिस प्रकार पथिक मार्ग जानने की इच्छा से दिशा बताने वाले को बुलाता है. आप मेरे आह्वान को सुनकर आइए. (५) अतारिष्म तमसस्पारमस्य प्रति वां स्तोमो अश्विनावधायि. एह यातं पथिभिर्देवयानैर्विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम्.. (६) हे अश्विनीकुमारो! हम तुम्हारे कारण अंधकार से पार हो जाएंगे. यह स्तोत्र तुम्हारे लिए ही बनाया गया है. यज्ञरूपी देवमार्ग पर आ जाओ, जिससे हम अन्न, बल और दीर्घ आयु प्राप्त करें. (६) सूक्त—१८४ देवता—अश्विनीकुमार eBook converter DEMO Watermarks*

ता वामद्य तावपरं हुवेमोच्छन्त्यामुषसि वह्निरुक्थैः. नासत्या कुह चित्सन्तावर्यो दिवो नपाता सुदास्तराय.. (१) जब उषा अंधकार का नाश करती है, तब आज के आगामी दिनों के यज्ञों में हम होता स्तुतियों द्वारा तुम्हें बुलाते हैं. हे असत्यरहित एवं स्वर्ग के नेता अश्विनीकुमारो! तुम जहां भी रहो, मैं उत्तम दान देने वाले यजमान के कल्याण के लिए तुम्हें बुलाता हूं. (१) अस्मे ऊ षु वृषणा मादयेथामुत्पणीँ र्हतमूर्ध्या मदन्ता. श्रुतं मे अच्छोक्तिभिर्मतीनामेष्टा नरा निचेतारा च कर्णैः.. (२) हे कामवर्षक अश्विनीकुमारो! सोमरस से प्रसन्न होकर तुम हमें संतुष्ट करो एवं पणियों का समूल नाश करो. तुम मेरी उन स्तुतियों को सुनो जो तुम्हें अनुकूल करने एवं तृप्ति प्रदान करने के लिए की गई हैं. हे नेताओ! तुम स्तुतियों का अन्वेषण एवं संचय करते हो. (२) श्रिये पूषन्निषुकृतेव देवा नासत्या वहतुं सूर्यायाः. वच्यन्ते वां ककुहा अप्सु जाता युगा जूर्णेव वरुणस्य भूरेः.. (३) हे पोषक एवं असत्यहीन अश्विनीकुमारो! स्तुतिसमूह एवं कन्या के लाभ के लिए तीर के समान जल्दी पहुंचो और सूर्यपुत्री को ले आओ. वरुण संबंधी यज्ञ में जो स्तुतियां की जाती हैं, वे वास्तव में तुम्हारे ही अभिमुख जाती हैं. (३) अस्मे सा वां माध्वी रातिरस्तु स्तोमं हिनोतं मान्यस्य कारोः. अनु यद्वा श्रवस्या सुदानू सूवीर्याय चर्ष॑णयो मदन्ति.. (४) हे मधुपूर्र्ण पात्र वाले अश्विनीकुमारो! मान्य स्तोता अगस्त्य की स्तुति सुनकर अपना प्रसिद्ध दान हमें दो. हे शोभनदानशीलो! अन्न की इच्छा से पुरोहित शक्तिशाली यजमान के कल्याण के लिए तुम्हारे साथ प्रसन्न हो. (४) एष वां स्तोमो अश्विनावकारि मानेभिर्मघवाना सुवृक्ति. यातं वर्तिस्तनयाय त्मने चागस्त्ये नासत्या मदन्ता.. (५) हे धन के स्वामी अश्विनीकुमारो! तुम्हारे सम्मान के लिए हव्य के साथ ही इस पाप विनाशकारी स्तोत्र की रचना की गई है. हे सत्यस्वरूपो! मुझ अगस्त्य ऋषि से प्रसन्न होकर पुत्रलाभ एवं अपने हित के लिए यज्ञस्थल में आओ. (५) अतारिष्म तमस्सपारमस्य प्रति वां स्तोमो अश्विनावधायि. एह यातं पथिभिर्देवयानैर्विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम्.. (६) हे अश्विनीकुमारो! तुम्हारी कृपा से हम अंधकार को पार करेंगे. इसीलिए तुम्हारे लिए ये स्तुतियां बनाई गई हैं. तुम देवों के मार्ग से यज्ञ में आओ, जिससे हम अन्न, बल और दीर्घ ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—१८५ देवता—द्यावा व पृथ्वी

आयु प्राप्त कर सकें. (६) सूक्त—१८५ देवता—द्यावा व पृथ्वी कतरा पूर्वा कतरापरायोः कथा जाते कवयः को वि वेद. विश्वं त्मना बिभृतो यद्ध नाम वि वर्तेते अहनी चक्रियेव.. (१) हे क्रांतदर्शियो! धरती और आकाश में कौन पहले उत्पन्न हुआ है, कौन बाद में? इनके उत्पन्न होने का क्या कारण है? संसार के समस्त पदार्थों को ये स्वयं ही धारण किए हुए हैं एवं पहियों के समान घूमते रहते हैं. (१) भूरिं द्वे अचरन्ती चरन्तं पद्द्वन्तं गर्भमपदी दधाते. नित्यं न सूनूं पित्रोरुपस्थे द्यावा रक्षतं पृथिवी नो अभ्वात्.. (२) अचल एवं चरणसहित धरती और आकाश चलने वाले तथा चरणयुक्त प्राणियों को गर्भ के समान धारण करते हैं. जैसे माता-पिता की गोद में बालक रहता है, उसी प्रकार ये सबको रखते हैं. हे धरती और आकाश! हमें महापाप से बचाओ. (२) अनेहो दात्रमदितेरनर्वं हुवे स्वर्वदवधं नमस्वत्. तद्रोदसी जनयतं जरित्रे द्यावा रक्षतं पृथिवी नो अभ्वात्.. (३) हे धरती और आकाश! हम अदिति से जिस पापरहित, अक्षीण, स्वर्ग के तुल्य हिंसाशून्य एवं अन्नयुक्त धन की प्रार्थना करते हैं, तुम वही धन स्तुतिकर्त्ता यजमानों को देते हो. हे धरती और आकाश! हमें पाप से बचाओ. (३) अतप्यमाने अवसावन्ती अनु ष्याम रोदसी देवपुत्रे. उभे देवानामुभयेभिरह्नां द्यावा रक्षतं पृथिवी नो अभ्वात्.. (४) प्रकाशयुक्त दिन और रात्रि के दोनों प्रकार के धन के लिए दुःखरहित एवं अन्न द्वारा रक्षा करने वाले धरती और आकाश का हम अनुगमन करें. हे धरती और आकाश! हमें पाप से बचाओ. (४) सङ्गच्छमाने युवती समन्ते स्वसारा जामी पित्रोरुपस्थे. अभिजिघ्रन्ती भुवनस्य नाभिं द्यावा रक्षतं पृथिवी नो अभ्वात्.. (५) हे एक-दूसरे से मिले हुए, नित्य तरुण, समान सीमा वाले, बहिन और भाई के समान माता और पिता की गोदी में स्थित, प्राणियों की नाभिरूप जल को सूंघते हुए धरती और आकाश! हमें पाप से बचाओ. (५) उर्वी सझनी बृहती ऋतेन हुवे देवानामवसा जनित्री. ebook converter DEMO Watermarks*

दधाते ये अमृतं सुप्रतीके द्यावा रक्षतं पृथिवी नो अभ्वात्.. (६) धरती और आकाश विस्तृत, निवास करने योग्य, महान् एवं शस्य आदि को उत्पन्न करने वाले हैं. मैं देवों की प्रसन्नता के लिए इन्हें यज्ञ में बुलाता हूं. ये विचित्र रूप वाले एवं जल धारणकर्त्ता हैं. हे धरती और आकाश! हमें पाप से बचाओ. (६) उर्वी पृथ्‍वी बहुले दूरेअन्ते उप ब्रुवे नमसा यज्ञे अस्मिन्. दधाते ये सुभगे सुप्रतूर्ती द्यावा रक्षतं पृथिवी नो अभ्वात्.. (७) मैं इस यज्ञ में नमस्कार संबंधी मंत्रों द्वारा विस्तृत, महान्, अनेक आकारों वाले तथा अंतहीन धरती और आकाश की स्तुति करता हूं. हे सौभाग्यसंपन्न एवं सुखपूर्वक तरने वाले धरती और आकाश! हमें पाप से बचाओ. (७) देवान्वा यच्चकृमा कच्चिदागः सखायं वा सदमिज्जास्पतिं वा. इयं धीर्भूया अवयानमेषां द्यावा रक्षतं पृथिवी नो अभ्वात्.. (८) हे धरती और आकाश! हम देवों, बंधुओं एवं जमाता के प्रति नित्य जो अपराध करते हैं, हमारे उन अपराधों को दूर करो. तुम हमें पाप से बचाओ. (८) उभा शंसा नर्या मामविष्ठामुभे मामूती अवसा सचेताम्. भूरि चिदर्यः सुदास्तरायेषा मदन्त इषयेम देवाः.. (९) स्तुति के योग्य एवं मानवों के हितकारी धरती और आकाश के प्रति की गई स्तुतियां मेरी रक्षा करें. उक्त दोनों रक्षक मेरी रक्षा के लिए मिलें. हे देवो! तुम्हारे स्तुतिकर्त्ता हम हव्य अन्न द्वारा तुम्हें संतुष्ट करते हैं एवं दान करने के लिए अन्न की अभिलाषा करते हैं. (९) ऋतं दिवे तदवोचं पृथिव्या अभिश्रावाय प्रथमं सुमेधाः. पातामवद्याद्दुरितादभीके पिता माता च रक्षतामवोभिः.. (१०) मुझ बुद्धिमान् ने धरती और आकाश के प्रति ऐसी स्तुतियां की हैं, जो चारों दिशाओं में प्रकाशित हैं. धरती और आकाश रूपी माता-पिता मुझे निंदा-योग्य पाप से बचावें एवं अपने समीप रखकर मनचाही वस्तुओं से मेरा पालन करें. (१०) इदं द्यावापृथिवी सत्यमस्तु पितर्मातर्यदिहोपब्रुवे वाम्. भूतं देवानाभवमे अवोभिर्विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम्.. (११) हे माता और पितारूपी धरती और आकाश! इस यज्ञ में मेरे द्वारा की गई स्तुतियों को सार्थक करो. तुम रक्षा साधनों द्वारा हम स्तुतिकर्त्ताओं के पास आओ, जिससे हम अन्न, बल और दीर्घ आयु प्राप्त करें. (११) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—१८६ देवता—विश्वेदेव

सूक्त—१८६ देवता—विश्वेदेव आ न इळाभिर्विदथे सुशस्ति विश्वानरः सविता देव एतु. अपि यथा युवानो मत्सथा नो विश्वं जगदभिपित्वे मनीषा.. (१) अग्नि और सविता देव हमारी स्तुतियों को सुनकर धरती के देवों के साथ हमारे यज्ञ में पधारें. हे नित्य-युवाओ! तुम जिस प्रकार सारे संसार की रक्षा करते हो, उसी प्रकार हमारे यज्ञ में अपनी इच्छा से आकर हमारी रक्षा करो. (१) आ नो विश्व आस्क्रा गमन्तु देवा मित्रो अर्यमा वरुणः सजोषाः. भुवन्यथा नो विश्वे वृधासः करन्त्सुषाहा विथुरं न शवः.. (२) शत्रुओं पर आक्रमण करने वाले मित्र, वरुण और अर्यमादेव समान प्रसन्नता द्वारा हमारे यज्ञ में पधारें. सब देव हमारी वृद्धि करें, शत्रुओं को हरावें एवं हमें अन्न का स्वामी बनावें. (२) प्रेष्ठं वो अतिथिं गृणीषेऽग्निं शस्तिभिस्तुर्वणिः सजोषाः. असद्यथा नो वरुणः सुकीर्तिरिषश्च पर्षदरिगूर्तः सूरिः.. (३) हे देवो! मैं शीघ्रता करता हुआ एवं तुम्हारे साथ प्रसन्न होकर मंत्रों द्वारा तुम्हारे उत्तम अतिथि अग्नि की स्तुति करता हूं. शोभन कीर्ति संपन्न वरुण देव हमारे बनकर शत्रुओं के प्रति इनकार करें एवं हमारे लिए अन्नदाता बनें. (३) उप व एषे नमसा जिगीषोषासानक्ता सुदुघेव धेनुः. समाने अहन्विमिमानो अर्कं विषुरूपे पयसि सस्मिन्नूधन्.. (४) हे देवो! जिस प्रकार दुधारू गाय सवेरे और शाम दूध काढ़ने के स्थान में जाती है, उसी प्रकार हम पापों को जीतने की इच्छा से स्तुतिवचन के साथ प्रातःसायं तुम्हारे सामने उपस्थित होते हैं. हम गाय के थनों से उत्पन्न घी, दूध आदि पदार्थों को मिलाकर प्रतिदिन लाते हैं. (४) उत नोऽहिर्बुध्न्यो३ मयस्कः शिशुं न पिप्युषीव वेति सिन्धुः. येन नपातमपां जुनाम मनोजुवो वृषणो यं वहन्ति.. (५) अहिर्बुध्न हमें सुख दें. गाय जिस प्रकार बछड़े को तृप्त करती हुई आती है, उसी प्रकार सिंधु नदी हमें तृप्त करती हुई आवे. हम स्तुति करते हुए जल के नाती अग्नि से मिलें. मन के समान तेज चलने वाले बादल उन्हें ले जाते हैं. (५) उत न ईं त्वष्टा गन्त्वच्छा स्मत्सूरिभिरभिपित्वे सजोषाः. आ वृत्रहेन्द्रश्चर्षणिप्रास्तुविष्टमो नरां न इह गम्याः.. (६) ebook converter DEMO Watermarks*