ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 481, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूक्त—१८६ देवता—विश्वेदेव आ न इळाभिर्विदथे सुशस्ति विश्वानरः सविता देव एतु. अपि यथा युवानो मत्सथा नो विश्वं जगदभिपित्वे मनीषा.. (१) अग्नि और सविता देव हमारी स्तुतियों को सुनकर धरती के देवों के साथ हमारे यज्ञ में पधारें. हे नित्य-युवाओ! तुम जिस प्रकार सारे संसार की रक्षा करते हो, उसी प्रकार हमारे यज्ञ में अपनी इच्छा से आकर हमारी रक्षा करो. (१) आ नो विश्व आस्क्रा गमन्तु देवा मित्रो अर्यमा वरुणः सजोषाः. भुवन्यथा नो विश्वे वृधासः करन्त्सुषाहा विथुरं न शवः.. (२) शत्रुओं पर आक्रमण करने वाले मित्र, वरुण और अर्यमादेव समान प्रसन्नता द्वारा हमारे यज्ञ में पधारें. सब देव हमारी वृद्धि करें, शत्रुओं को हरावें एवं हमें अन्न का स्वामी बनावें. (२) प्रेष्ठं वो अतिथिं गृणीषेऽग्निं शस्तिभिस्तुर्वणिः सजोषाः. असद्यथा नो वरुणः सुकीर्तिरिषश्च पर्षदरिगूर्तः सूरिः.. (३) हे देवो! मैं शीघ्रता करता हुआ एवं तुम्हारे साथ प्रसन्न होकर मंत्रों द्वारा तुम्हारे उत्तम अतिथि अग्नि की स्तुति करता हूं. शोभन कीर्ति संपन्न वरुण देव हमारे बनकर शत्रुओं के प्रति इनकार करें एवं हमारे लिए अन्नदाता बनें. (३) उप व एषे नमसा जिगीषोषासानक्ता सुदुघेव धेनुः. समाने अहन्विमिमानो अर्कं विषुरूपे पयसि सस्मिन्नूधन्.. (४) हे देवो! जिस प्रकार दुधारू गाय सवेरे और शाम दूध काढ़ने के स्थान में जाती है, उसी प्रकार हम पापों को जीतने की इच्छा से स्तुतिवचन के साथ प्रातःसायं तुम्हारे सामने उपस्थित होते हैं. हम गाय के थनों से उत्पन्न घी, दूध आदि पदार्थों को मिलाकर प्रतिदिन लाते हैं. (४) उत नोऽहिर्बुध्न्यो३ मयस्कः शिशुं न पिप्युषीव वेति सिन्धुः. येन नपातमपां जुनाम मनोजुवो वृषणो यं वहन्ति.. (५) अहिर्बुध्न हमें सुख दें. गाय जिस प्रकार बछड़े को तृप्त करती हुई आती है, उसी प्रकार सिंधु नदी हमें तृप्त करती हुई आवे. हम स्तुति करते हुए जल के नाती अग्नि से मिलें. मन के समान तेज चलने वाले बादल उन्हें ले जाते हैं. (५) उत न ईं त्वष्टा गन्त्वच्छा स्मत्सूरिभिरभिपित्वे सजोषाः. आ वृत्रहेन्द्रश्चर्षणिप्रास्तुविष्टमो नरां न इह गम्याः.. (६) ebook converter DEMO Watermarks*