ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 463, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंनक्षद्धोता परि सद्म मिता यन्भरद्गर्भमा शरदः पृथिव्याः. क्रन्ददश्वो नयमानो रुवद्गौरन्तर्दूतो न रोदसी चरद्वाक्.. (३) हवन पूर्ण करने वाले अग्नि, गार्हपत्य आदि स्थानों के चारों ओर फैले हैं एवं वर्ष भर में धरती से उत्पन्न होने वाले अन्न को धारण करते हैं. अग्नि घोड़े और बैल की तरह शब्द करते हुए हवि का अन्न लेकर धरती और आकाश के मध्य में दूत के समान बातें करते हैं. (३) ता कर्माषितरास्मै प्र च्यौत्नानि देवयन्तो भरन्ते. जुजोषदिन्द्रो दस्मवर्चा नासत्येव सुगम्यो रथेष्ठाः.. (४) हम इंद्र को लक्ष्य करके अत्यंत व्यापक हवि प्रदान करेंगे. देवों को अपने अनुकूल बनाने के लिए यजमान उत्तम स्तोत्र पढ़ते हैं. अश्विनीकुमारों के समान तेजस्वी, सुंदर एवं सुख से प्राप्त करने योग्य इंद्र रथ पर बैठकर हमारी स्तुतियों को सुनें. (४) तमु ष्टुहीन्द्रं यो ह सत्वा यः शूरो मघवा यो रथेष्ठाः. प्रतीचश्चिद्घोधीयान्व्ऋषण्वान्ववृषश्चित्तमसो विहन्ता.. (५) हे होता! इंद्र की स्तुति करो. वे अनंत शक्ति वाले, शूर, धनवान्, रथ पर स्थिर, सामने लड़ने वाले योद्धाओं में उत्तम, वज्रधारणकर्त्ता एवं मेघ के विनाशक हैं. (५) प्र यदित्था महिना नृभ्यो अस्त्यरं रोदसी कक्ष्यें३ नास्मै. सं विव्य इन्द्रो वृजनं न भूमा भर्ति स्वधावाँ ओपशमिव द्याम्.. (६) इंद्र अपने महत्त्व के कारण यज्ञकर्त्ता यजमानों को स्वर्ग प्रदान करने में समर्थ हैं. धरती और आकाश उनके संचरण के लिए पर्याप्त नहीं हैं. जैसे बैल सींगों को धारण करता है, उसी प्रकार अन्न के स्वामी इंद्र स्वर्ग को धारण करते हैं. जैसे आकाश धरती को घेरे हुए है, उसी प्रकार इंद्र तीनों लोकों को व्याप्त करते हैं. (६) समत्सु त्वा शूर सतामुराणं प्रपथिन्तमं परितंसयध्यै. सजोषस इन्द्रं मदे क्षोणीः सूरिं चिद्ये अनुमदन्ति वाजैः.. (७) हे शूर इंद्र! तुम युद्धों में उन लोगों को बल प्रदान करते हो एवं उत्तम मार्ग दिखाते हो, जो तुम्हारा ही आश्रय लेकर युद्ध में प्रवृत्त होते हैं. तुम्हारी सेवा करके प्रसन्न होने वाले मरुद्गण युद्ध में प्रयत्न करते हैं. (७) एवा हि ते शं सवना समुद्र आपो यत्त आसु मदन्ति देवीः. विश्वा ते अनु जोष्या भूद्गौः सूरीँश्चिद्यदि धिषा वेषि जनान्.. (८) हे इंद्र! तुम्हारे उद्देश्य से किए गए सोम याग इस प्रकार सुखकर हों कि आकाश में स्थित दिव्य-जल प्रजाओं के कल्याण के लिए तुम्हें प्रसन्न करें. स्तोत्र रूपी समस्त वाणी तुम्हें ebook converter DEMO Watermarks*