ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 471, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंते चिदवासुर्ऋह्यन्तमापुः समू नु पत्नीर्वृषभिर्जगम्युः.. (२) “हे अगस्त्य! प्राचीन महर्षियों ने सत्य को प्राप्त किया. वे देवों के साथ सत्य बोलते थे. उन्होंने भी पत्नियों में वीर्य का स्खलन किया और इस कार्य को समाप्त नहीं किया. तपस्या करती हुई पत्नियां भोग समर्थ पतियों के समीप जाती थीं.” (२) न मृषा श्रान्तं यदवन्ति देवा विश्वा इत्स्पृधो अभ्यश्नवाव. जयावेदत्र शतनीथमाजिं यत्सम्पृञ्चा मिथुनावभ्यजाव.. (३) अगस्त्य ने उत्तर दिया—“हे पत्नी! हम लोग व्यर्थ ही नहीं थके हैं. हमारी तपस्या से प्रसन्न देव हमारी रक्षा करते हैं. हम सभी भोगों को भोगने में समर्थ हैं. यदि हम और तुम इच्छा करें तो इस संसार में अब भी सुखसंभोग के सैकड़ों साधन प्राप्त कर सकते हैं. (३) नदस्य मा रुधतः काम आगन्नित आजातो अमुतः कुतश्चित्. लोपामुद्रा वृषणं नी रिणाति धीरमधीरा धयति श्वसन्तम्.. (४) “हे पत्नी! मैं मंत्रों के जप और ब्रह्मचर्य पालन में लगा रहा. फिर भी न जाने किस कारण मुझमें काम भाव उत्पन्न हो गया. तुम लोपामुद्रा वीर्य सेचन समर्थ मुझ पति के साथ संगत हो जाओ. तुम अधीर नारी बनकर मुझ महाप्राण पुरुष का भोग करो.” (४) इमं नु सोममन्तितो हृत्सु पीतमुप ब्रुवे. यत्सीमांगश्चकृमा तत्सु मृळतु पुलुकामो हि मर्त्यः.. (५) शिष्य कहने लगा—“उदर में पिया हुआ सोमरस मुझे सब पापों से छुड़ाकर सुखी करे, यह प्रार्थना मैं सच्चे मन से कर रहा हूं. मैंने जो पाप किया है, उससे मेरी रक्षा हो. क्यों मनुष्य मन में बहुत सी कामनाएं करता है? (५) अगस्त्यः खनमानः खनित्रैः प्रजामपत्यं बलमिच्छमानः. उभौ वर्णावृषिरुगः पुपोष सत्या देवेष्वाशिषो जगाम.. (६) “मेरे गुरु अगस्त्य ने यज्ञों द्वारा अभिमत फल एवं बहुत सी संतान की इच्छा की. उन्होंने काम और संयम दोनों उत्तम गुण प्राप्त किए एवं देवों से सच्चा आशीर्वाद पाया.” (६) सूक्त—१८० देवता—अश्विनीकुमार युवो रजांसि सुयमासो अश्वा रथो यद्वां पर्यर्णांसि दीयत्. हिरण्यया वां पवयः पृषायन्मध्वः पिबन्ता उषसः सचेथे.. (१) हे अश्विनीकुमारो! तीनों लोकों में जाने वाले तुम्हारे रथ के घोड़े तुम्हें अभिमत स्थान में पहुंचा देते हैं. उस समय तुम्हारे सुनहरे रथ की नेमियां तुम्हारी इच्छा पूरी करती हैं. तुम ebook converter DEMO Watermarks*