भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 470, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 470

न घा राजेन्द्र आ दभन्नो या नु स्वसारा कृणवन्त योनी. आपश्चिदस्मै सुतुका अवेष्णन्गम्न इन्द्रः सख्या वयश्च.. (२) हे राजा इंद्र! परस्पर बहिन-भाई बने हुए रात-दिन अपने उत्पत्ति स्थल में वर्षादि कर्म करके हमारे यज्ञकर्म को समाप्त न करें. शक्तिदायक हवि इंद्र को प्राप्त होती है. इंद्र हमें अपनी मित्रता एवं अन्न दें. (२) जेता नृभिरिन्द्रः पृत्सु शूरः श्रोता हवं नाधमानस्य कारोः. प्रभर्ता रथं दाशुष उपाक उद्यन्ता गिरो यदि च त्मना भूत्.. (३) शूर इंद्र युद्ध के नेता मरुतों के साथ युद्ध में विजय प्राप्त करते हैं एवं कृपा की अभिलाषा करने वाले स्तोता की पुकार सुनते हैं. वे जिस समय अपनी इच्छा से स्तुतिवचन सुनना चाहते हैं, उस समय अपना रथ हव्य देने वाले यजमान के पास ले आते हैं. (३) एवा नृभिरिन्द्रः सुश्रवस्या प्रखादः पृक्षो अभि मित्रिणो भूत्. समर्ध इषः स्तवते विवाचि सत्राकरो यजमानस्य शंसः.. (४) यजमान उत्तम धन पाने की इच्छा से जो अन्न देता है, उसे इंद्र अधिक मात्रा में खाते हैं और अपने भक्त यजमान के शत्रुओं को पराजित करते हैं. वे भांति-भांति के शब्दों वाले युद्ध में यजमान के यज्ञकर्म की प्रशंसा करते हैं एवं सच्चा फल देने के लिए हवि ग्रहण करते हैं. (४) त्वया वयं मघवन्निन्द्र शत्रूनभि ष्याम महतो मन्यमानान्. त्वं त्राता त्वमु नो वृधे भूर्विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम्.. (५) हे इंद्र! तुम्हारी सहायता से हम उन शत्रुओं का वध करें, जो अपने आपको बड़ा शक्तिशाली मानते हैं. तुम हमारे रक्षक एवं पालनकर्त्ता बनो. हम अन्न, बल और दीर्घ-आयु प्राप्त करें. (५) सूक्त—१७९ देवता—रति पूर्वीरहं शरदः शश्रमाणा दोषा वस्तोरुषसो जरयन्तीः. मिनाति श्रियं जरिमा तनूनामप्यू नु पत्नीर्वृषणो जगम्युः.. (१) लोपामुद्रा बोली—“हे अगस्त्य! मैं पूर्वकालिक अनेक वर्षों से रात, दिन और उषा काल में शरीर को जीर्ण करती हुई तुम्हारी सेवा में लगी रही हूं. इस समय बुढ़ापा मेरे अंगों का सौंदर्य नष्ट कर रहा है. क्या इस अवस्था में पुरुष नारियों के साथ समागम न करें? (१) ये चिद्धि पूर्व ऋतसाप आसन्त्साकं देवेभिरवदन्नृतानि. ebook converter DEMO Watermarks*

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