भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 473, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 473

वयं चिद्धि वां जरितारः सत्या विपन्यामहे वि पणिर्हितावान्. अधा चिद्धि ष्माश्विनावन्दिन्द्या पाथो हिष्मा वृषणावन्तिदेवम्.. (७) हम भी तुम्हारे स्तोता एवं सत्य बोलने वाले हैं. हम तुम्हारी स्तुति कर रहे हैं. तुम यज्ञ न करने वाले परम धनी का त्याग करो. हे प्रशंसनीय एवं कामवर्षी अश्विनीकुमारो! तुम देवों के समीप सोमरस पिओ. (७) युवां चिद्धि ष्माश्विनावनु द्यून्विरुद्रस्य प्रस्रवणस्य सातौ. अगस्त्यो नरां नृतृ प्रशस्तः काराधुनीव चितयत्सहस्रैः.. (८) हे अश्विनीकुमारो! जिस प्रकार शंख शब्द करता है, उसी प्रकार यज्ञकर्त्ता मनुष्यों में उत्तम अगस्त्य ऋषि हजारों स्तुतियों द्वारा प्रतिदिन तुम्हें जगाते हैं. वे ग्रीष्म का दुःख दूर करने वाला वर्षा का जल चाहते हैं. (८) प्र यद्वहेथे महिना रथस्य प्र स्यन्द्रा याथो मनुषो न होता. धत्तं सूरिभ्य उत वा स्वश्व्यं नासत्या रयिषाचः स्याम.. (९) हे अश्विनीकुमारो! तुम अपने रथ की महिमा से हमारा यज्ञ पूर्ण करते हो. हे गतिशीलो! तुम यजमान के होता के समान यज्ञ के आरंभ में आकर यज्ञ के अंत में जाओ. तुम स्तोताओं को उत्तम अश्व प्रदान करो. हम भी धन प्राप्त करेंगे. (९) तं वां रथं वयमद्या हुवेम स्तोमैरश्विना सुविताय नव्यम्. अरिष्टनेमिं परि द्यामियानं विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम्.. (१०) हे अश्विनीकुमारो! हम स्तुतियों द्वारा तुम्हारे शीघ्रगति वाले, प्रशंसनीय, आकाश में उड़ने वाले तथा न टूटने योग्य नेमि वाले रथ को अपने यज्ञ में बुलाते हैं, जिससे हम अन्न, बल और दीर्घ आयु प्राप्त कर सकें. (१०) सूक्त—१८१ देवता—अश्विनीकुमार कदु प्रेष्ठाविषां रयीणामध्वर्यन्ता यदुन्निनीथो अपाम्. अयं वां यज्ञो अकृत प्रशस्तिं वसुधिती अवितारा जनानाम्.. (१) हे प्रियतम अश्विनीकुमारो! तुम यज्ञ के अन्नरूपी धन को कब ऊपर ले जाओगे और यज्ञ को पूर्ण करने की इच्छा से वर्षा का जल नीचे गिराओगे? तुम धन धारणकर्त्ता एवं मनुष्यों के आश्रयदाता हो. यह यज्ञ तुम्हारी प्रशंसा के रूप में ही किया जा रहा है. (१) आ वामश्वासः शुचयः पयस्पा वातरंहसो दिव्यासो अत्याः. मनोजुवो वृषणो वीतपृष्ठा एह स्वराजो अश्विना वहन्तु.. (२) ebook converter DEMO Watermarks*