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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

वयं चिद्धि वां जरितारः सत्या विपन्यामहे वि पणिर्हितावान्. अधा चिद्धि ष्माश्विनावन्दिन्द्या पाथो हिष्मा वृषणावन्तिदेवम्.. (७) हम भी तुम्हारे स्तोता एवं सत्य बोलने वाले हैं. हम तुम्हारी स्तुति कर रहे हैं. तुम यज्ञ न करने वाले परम धनी का त्याग करो. हे प्रशंसनीय एवं कामवर्षी अश्विनीकुमारो! तुम देवों के समीप सोमरस पिओ. (७) युवां चिद्धि ष्माश्विनावनु द्यून्विरुद्रस्य प्रस्रवणस्य सातौ. अगस्त्यो नरां नृतृ प्रशस्तः काराधुनीव चितयत्सहस्रैः.. (८) हे अश्विनीकुमारो! जिस प्रकार शंख शब्द करता है, उसी प्रकार यज्ञकर्त्ता मनुष्यों में उत्तम अगस्त्य ऋषि हजारों स्तुतियों द्वारा प्रतिदिन तुम्हें जगाते हैं. वे ग्रीष्म का दुःख दूर करने वाला वर्षा का जल चाहते हैं. (८) प्र यद्वहेथे महिना रथस्य प्र स्यन्द्रा याथो मनुषो न होता. धत्तं सूरिभ्य उत वा स्वश्व्यं नासत्या रयिषाचः स्याम.. (९) हे अश्विनीकुमारो! तुम अपने रथ की महिमा से हमारा यज्ञ पूर्ण करते हो. हे गतिशीलो! तुम यजमान के होता के समान यज्ञ के आरंभ में आकर यज्ञ के अंत में जाओ. तुम स्तोताओं को उत्तम अश्व प्रदान करो. हम भी धन प्राप्त करेंगे. (९) तं वां रथं वयमद्या हुवेम स्तोमैरश्विना सुविताय नव्यम्. अरिष्टनेमिं परि द्यामियानं विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम्.. (१०) हे अश्विनीकुमारो! हम स्तुतियों द्वारा तुम्हारे शीघ्रगति वाले, प्रशंसनीय, आकाश में उड़ने वाले तथा न टूटने योग्य नेमि वाले रथ को अपने यज्ञ में बुलाते हैं, जिससे हम अन्न, बल और दीर्घ आयु प्राप्त कर सकें. (१०) सूक्त—१८१ देवता—अश्विनीकुमार कदु प्रेष्ठाविषां रयीणामध्वर्यन्ता यदुन्निनीथो अपाम्. अयं वां यज्ञो अकृत प्रशस्तिं वसुधिती अवितारा जनानाम्.. (१) हे प्रियतम अश्विनीकुमारो! तुम यज्ञ के अन्नरूपी धन को कब ऊपर ले जाओगे और यज्ञ को पूर्ण करने की इच्छा से वर्षा का जल नीचे गिराओगे? तुम धन धारणकर्त्ता एवं मनुष्यों के आश्रयदाता हो. यह यज्ञ तुम्हारी प्रशंसा के रूप में ही किया जा रहा है. (१) आ वामश्वासः शुचयः पयस्पा वातरंहसो दिव्यासो अत्याः. मनोजुवो वृषणो वीतपृष्ठा एह स्वराजो अश्विना वहन्तु.. (२) ebook converter DEMO Watermarks*

हे अश्विनीकुमारो! तुम्हारे घोड़े शुद्ध, वर्षा का जल पीने वाले, वायु के समान शीघ्रगामी, दिव्य, मन के समान तेज चाल वाले, जवान और सुंदर पीठ वाले हैं. वे तुम्हें इस यज्ञ में लावें. (२) आ वां रथोऽवनिर्न प्रवत्वान्तृप्रवन्धुरः सुविताय गम्याः. वृष्णः स्थांतारा मनसो जवीयानहम्पूवों यजतो धिष्ण्या यः.. (३) हे ऊंचे स्थान के योग्य एवं अपने रथ में बैठे हुए अश्विनीकुमारो! तुम धरती के समान विस्तृत, बड़े जुआर वाले, वर्षा करने में समर्थ, मन के समान होड़ने वाले, अहंकारी एवं यज्ञ के योग्य अपने रथ को यज्ञस्थल में ले आओ. (३) इहेह जाता समवावशीतामरेपसा तन्वा३ नामभिः स्वैः. जिष्णुर्वामन्यः सुमखस्य सूरिर्दिवो अन्यः सुभगः पुत्र ऊहे.. (४) हे सूर्यचंद्र रूप में जन्म ग्रहण करने वाले पापरहित अश्विनीकुमारो! तुम्हारे शरीर की सुंदरता एवं माहात्म्य के कारण मैं बार-बार तुम्हारी स्तुति कर रहा हूं. तुम में से एक चंद्र बनकर यज्ञ प्रवर्तक के रूप में संसार को धारण करता है और दूसरा सूर्य के रूप में आकाश का पुत्र बनकर शोभन रश्मियों से संसार का पालन करता है. (४) प्र वां निचेरुः ककुहो वशाँ अनु पिशङ्गरूपः सदनानि गम्याः. हरी अन्यस्य पीपयन्त वाजैर्मथ्ना रजांस्यश्विना वि घोषैः.. (५) हे अश्विनीकुमारो! तुम में से एक का पीले रंग का श्रेष्ठ रथ हमारी इच्छा के अनुसार यज्ञभूमि में आ जाए एवं दूसरे को मनुष्य स्तुतियां तथा उसके घोड़ों को मथा हुआ खाद्य देकर प्रसन्न करे. (५) प्र वां शरद्वान्वृषभो न निष्षाट् पूर्वीरिषश्चरति मध्व इष्णन्. एवैरन्यस्य पीपयन्त वाजैर्वेषन्तीरूध्र्वां नद्यो न आगुः.. (६) हे अश्विनीकुमारो! तुम में से एक बादलों को तोड़ते हुए इंद्र के समान शत्रुओं को भगाते हैं एवं बहुत से अन्नों की अभिलाषा करते हुए जाते हैं दूसरे को गमन के लिए यजमान लोग हव्य द्वारा प्रसन्न करते हैं. उनके प्रसन्न होने पर किनारों को तोड़ने वाली जल से भरी नदियां हमारे पास आती हैं. (६) असर्जि वां स्थविरा वेधसा गीर्वाळ्हे अश्विना त्रेधा क्षरन्ती. उपस्तुताववतं नाधमानं यामन्नयामञ्छृणुतं हवं मे.. (७) हे विधाता अश्विनीकुमारो! तुम्हें दृढ़ बनाने के लिए अत्यंत उत्तम स्तुतियां बनाई गई हैं. वे तीन प्रकार से तुम्हारे पास पहुंचती हैं. तुम स्तुति सुनकर अभीष्ट फल चाहने वाले यजमान की रक्षा करो एवं जाते हुए अथवा खड़े होकर उसकी पुकार सुनो. (७) ebook converter DEMO Watermarks*

उत स्या वां रुशतो वप्ससो गीस्त्रिबर्हिषि सदसि पिन्वते नॄन्. वृषां वां मेघो वृषणा पीपाय गोर्न सेके मनुषो दशस्यन्.. (८) हे अश्विनीकुमारो! तुम तेजस्वी हो. तुम्हारी स्तुति तीन कुशों से युक्त यज्ञगृह में यजमान को प्रसन्न करे. हे कामवर्षको! तुमसे संबंधित बादल वर्षा करता हुआ मनुष्यों को धन देकर प्रसन्न करे. (८) युवां पूषेवाश्विना पुरन्धिरग्निर्मुषां न जरते हविष्मान्. हुवे यद्वां वरिवस्या गृणानो विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम्.. (९) हे अश्विनीकुमारो! पूषा के समान बुद्धिमान् एवं हव्य धारण करने वाला तुम्हारा यजमान अग्नि और उषा के समान तुम्हारी स्तुति करता है. सेवापरायण स्तोता के साथ-साथ यजमान भी तुम्हारी स्तुति करता है, जिससे हम अन्न, बल एवं दीर्घ आयु प्राप्त कर सकें. (९) सूक्त—१८२ देवता—अश्विनीकुमार अभूदिदं वयुनमो षु भूषता रथो वृषण्वान्मदता मनीषिणः. धियञ्जिन्वा धिष्ण्या विश्पलावसू दिवो नपाता सुकृते शुचिव्रता.. (१) हे मेधावी ऋत्विजो! मेरे मन में यह ज्ञान उत्पन्न हुआ है कि अश्विनीकुमारों का कामवर्षी रथ आ गया है. उनके सामने जाकर उन्हें स्तुति से प्रसन्न करो. वे मुझ पुण्यवान् को कर्मबुद्धि देने वाले, स्तुतियोग्य, विश्पला का कल्याण करने वाले, आदित्य के नाती एवं पवित्रकर्म करने वाले हैं. (१) इन्द्रतमा हि धिष्ण्या मरुत्तमा दस्रा दंसिष्ठा रथ्या रथीतमा. पूर्णं रथं वहेथे मध्व आचितं तेन दाश्वांसमुप याथो अश्विना.. (२) हे अश्विनीकुमारो! तुम निश्चय ही उत्तम स्वामी, स्तुति के योग्य, मरुतों में श्रेष्ठ, शत्रुनाशक, कर्म करने में अतिशय कुशल, रथ के स्वामी एवं रक्षा करने वालों में श्रेष्ठ हो. तुम मधु से भरे हुए रथ को सभी जगह ले जाते हो. तुम उसी रथ पर बैठकर यज्ञ में आओ. (२) किमत्र दस्रा कृणुथः किमासाथे जनो यः कश्चिदहविर्महीयते. अति क्रमिष्टं जुरतं पणेरसुं ज्योतिर्विप्राय कृणुतं वचस्यवे.. (३) हे अश्विनीकुमारो! तुम यहां क्या कर रहे हो? तुम इस मनुष्य के समीप क्यों ठहरे हो? यदि व्यक्ति यज्ञरहित होकर भी लोगों में आदर पा रहा हो तो उसे हराओ. उस पणि के प्राणों का नाश करो. मैं मेधावी तुम्हारी स्तुति कर रहा हूं. मुझे प्रकाश दो. (३) जम्भयतमभितो रायतः शुनो हतं मृधो विदथुस्तान्यश्विना.

वाचंवाचं जरितू रत्निनों कृतमुभा शंसं नासत्यावतं मम.. (४) हे अश्विनीकुमारो! उनको मार डालो जो कुत्ते के समान बुरी तरह भौंकते हुए हमें मारने आते हैं अथवा हमसे युद्ध करना चाहते हैं. जो तुम्हारी स्तुति करता है, उसकी प्रत्येक बात को सफल करो. हे नासत्यो! मेरी स्तुति की रक्षा करो. (४) युवमेतं चक्रथुः सिन्धुषु प्लवमात्मन्वन्तं पक्षिणं तौग्र्याय कम्. येन देवत्रा मनसा निरूहथुः सुपप्तनी पेतथुः क्षोदसो महः.. (५) हे अश्विनीकुमारो! तुमने तुग्र राजा के पुत्र के लिए सागर में तैरने वाली, दृढ़ एवं डांड़ों वाली नाव बनाई थी. सब देवों में तुम्हीं ने कृपा करके उसे सागर से निकाला एवं तुमने सहसा आकर विशाल सागर से उसका उद्धार किया था. (५) अवविद्धं तौग्र्यमप्स्व१न्तरनारम्भणे तमसि प्रविद्धम्. चतस्रो नावो जठलस्य जुष्टा उदश्विभ्यामिषिताः पारयन्ति.. (६) तुग्र का पुत्र भुज्यु शत्रु द्वारा नीचे को मुंह करके पानी में गिराया गया था, इसलिए अंधकार में बहुत दुःखी था. सागर में उसे चार नावें मिलीं जो अश्विनीकुमारों ने भेजी थीं. (६) कः स्विद्वृक्षो निष्ठितो मध्ये अर्णसो यं तौग्र्यो नाधितः पर्यषस्वजत्. पर्णा मृगस्य पतरोरिवारभ उदश्विना ऊहथुः श्रोमताय कम्.. (७) याचना करते हुए तुग्रपुत्र ने जल के मध्य एवं वृक्ष निर्मित जिस निश्चल रथ का सहारा लिया था. वह क्या था? जिस प्रकार गिरते हुए बलि पशु को सींग आदि से पकड़कर उठाते हैं, उसी प्रकार भुज्यु की रक्षा करके तुमने बहुत यश पाया. (७) तद्वां नरा नासत्यावनु ष्याद्यद्वां मानास उचथमवोचन्. अस्मादद्य सदसः सोम्यादा विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम्.. (८) हे नेता अश्विनीकुमारो! तुम अपने भक्तों द्वारा किए गए स्तुति वचनों को स्वीकार करो. तुम आज हमारे द्वारा किए जाते हुए सोम मार्ग के स्तोत्र को स्वीकार करो, जिससे हम अन्न, बल और दीर्घ आयु प्राप्त करें. (८) सूक्त—१८३ देवता—अश्विनीकुमार तं युञ्जाथां मनसो यो जवीयान् त्रिवन्धुरो वृषणा यस्त्रिचक्रः. येनोपयाथः सुकृतो दुरोणं त्रिधातुना पतथो विर्न पर्णैः.. (१) हे कामवर्षी अश्विनीकुमारो! उस रथ में घोड़े जोड़ो जो मन की अपेक्षा अधिक वेगशील, सारथि के बैठने के तीन स्थानों से युक्त, तीन पहियों वाला, तीन धातुओं से मढ़ा हुआ एवं ebook converter DEMO Watermarks*

इच्छा पूरी करने वाला है. जैसे पक्षी पंखों के सहारे तेजी से उड़ता है, उसी प्रकार तुम उस रथ से यज्ञ करने वाले यजमान के पास जाते हो. (१) सुवृद्रथो वर्तते यन्नभि क्षां यत्तिष्ठथः क्रतुमन्तानु पृक्षे. वपुर्वपुष्या सचतामियं गीर्दिवो दुहित्रोषसा सचेथे.. (२) हे अश्विनीकुमारो! तुम यज्ञ में हवि प्राप्त करने के निमित्त यज्ञ की ओर जिस रथ पर सवार होते हो, उसके पहिए सरलता से घूमते चलते हैं. तुम्हारे शरीर का हित करने वाली हमारी स्तुति तुम्हें प्राप्त हो एवं तुम आकाश की पुत्री उषा के साथ मिलन करो. (२) आ तिष्ठतं सुवृतं यो रथो वामनु व्रतानि वर्तते हविष्मान्. येन नरा नासत्येषयध्यै वर्तिर्याथस्तनयाय त्मने च.. (३) हे नेता अश्विनीकुमारो! हवि वाले यजमान की ओर जाने वाले अपने उस रथ पर बैठो, जिसके द्वारा तुम यज्ञ में पहुंचना चाहते हो, उसी के द्वारा यजमान को पुत्रलाभ कराने एवं अपना कल्याण करने के लिए यज्ञस्थल में आओ. (३) मा वां वृको मा वृकीरा दधर्षीन्मा परि वर्क्तमुत माति धक्तम्. अयं वां भागो निहित इयं गीर्दस्राविमे वां निधयो मधूनाम्.. (४) हे शत्रुनाशक अश्विनीकुमारो! तुम्हारी कृपा से हिंसक मादा एवं नर पशु मुझे दुःखी न करें. तुम अपना धनादि दूसरे किसी को मत देना. यह तुम्हारी स्तुति है, यह हव्य का भाग है और यह सोमरस का पात्र है. (४) युवां गोतमः पुरुमीळ्हो अत्रिर्दस्रा हवतेऽवसे हविष्मान्. दिशं न दिष्टामृजूयेव यन्ता मे हवं नासत्योप यातम्.. (५) हे अश्विनीकुमारो! गौतम, पुरुमीढ एवं अत्रि ऋषि हव्य हाथ में लेकर तुम्हें प्रसन्न करने के लिए उसी प्रकार बुलाते हैं, जिस प्रकार पथिक मार्ग जानने की इच्छा से दिशा बताने वाले को बुलाता है. आप मेरे आह्वान को सुनकर आइए. (५) अतारिष्म तमसस्पारमस्य प्रति वां स्तोमो अश्विनावधायि. एह यातं पथिभिर्देवयानैर्विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम्.. (६) हे अश्विनीकुमारो! हम तुम्हारे कारण अंधकार से पार हो जाएंगे. यह स्तोत्र तुम्हारे लिए ही बनाया गया है. यज्ञरूपी देवमार्ग पर आ जाओ, जिससे हम अन्न, बल और दीर्घ आयु प्राप्त करें. (६) सूक्त—१८४ देवता—अश्विनीकुमार eBook converter DEMO Watermarks*

ता वामद्य तावपरं हुवेमोच्छन्त्यामुषसि वह्निरुक्थैः. नासत्या कुह चित्सन्तावर्यो दिवो नपाता सुदास्तराय.. (१) जब उषा अंधकार का नाश करती है, तब आज के आगामी दिनों के यज्ञों में हम होता स्तुतियों द्वारा तुम्हें बुलाते हैं. हे असत्यरहित एवं स्वर्ग के नेता अश्विनीकुमारो! तुम जहां भी रहो, मैं उत्तम दान देने वाले यजमान के कल्याण के लिए तुम्हें बुलाता हूं. (१) अस्मे ऊ षु वृषणा मादयेथामुत्पणीँ र्हतमूर्ध्या मदन्ता. श्रुतं मे अच्छोक्तिभिर्मतीनामेष्टा नरा निचेतारा च कर्णैः.. (२) हे कामवर्षक अश्विनीकुमारो! सोमरस से प्रसन्न होकर तुम हमें संतुष्ट करो एवं पणियों का समूल नाश करो. तुम मेरी उन स्तुतियों को सुनो जो तुम्हें अनुकूल करने एवं तृप्ति प्रदान करने के लिए की गई हैं. हे नेताओ! तुम स्तुतियों का अन्वेषण एवं संचय करते हो. (२) श्रिये पूषन्निषुकृतेव देवा नासत्या वहतुं सूर्यायाः. वच्यन्ते वां ककुहा अप्सु जाता युगा जूर्णेव वरुणस्य भूरेः.. (३) हे पोषक एवं असत्यहीन अश्विनीकुमारो! स्तुतिसमूह एवं कन्या के लाभ के लिए तीर के समान जल्दी पहुंचो और सूर्यपुत्री को ले आओ. वरुण संबंधी यज्ञ में जो स्तुतियां की जाती हैं, वे वास्तव में तुम्हारे ही अभिमुख जाती हैं. (३) अस्मे सा वां माध्वी रातिरस्तु स्तोमं हिनोतं मान्यस्य कारोः. अनु यद्वा श्रवस्या सुदानू सूवीर्याय चर्ष॑णयो मदन्ति.. (४) हे मधुपूर्र्ण पात्र वाले अश्विनीकुमारो! मान्य स्तोता अगस्त्य की स्तुति सुनकर अपना प्रसिद्ध दान हमें दो. हे शोभनदानशीलो! अन्न की इच्छा से पुरोहित शक्तिशाली यजमान के कल्याण के लिए तुम्हारे साथ प्रसन्न हो. (४) एष वां स्तोमो अश्विनावकारि मानेभिर्मघवाना सुवृक्ति. यातं वर्तिस्तनयाय त्मने चागस्त्ये नासत्या मदन्ता.. (५) हे धन के स्वामी अश्विनीकुमारो! तुम्हारे सम्मान के लिए हव्य के साथ ही इस पाप विनाशकारी स्तोत्र की रचना की गई है. हे सत्यस्वरूपो! मुझ अगस्त्य ऋषि से प्रसन्न होकर पुत्रलाभ एवं अपने हित के लिए यज्ञस्थल में आओ. (५) अतारिष्म तमस्सपारमस्य प्रति वां स्तोमो अश्विनावधायि. एह यातं पथिभिर्देवयानैर्विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम्.. (६) हे अश्विनीकुमारो! तुम्हारी कृपा से हम अंधकार को पार करेंगे. इसीलिए तुम्हारे लिए ये स्तुतियां बनाई गई हैं. तुम देवों के मार्ग से यज्ञ में आओ, जिससे हम अन्न, बल और दीर्घ ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—१८५ देवता—द्यावा व पृथ्वी

आयु प्राप्त कर सकें. (६) सूक्त—१८५ देवता—द्यावा व पृथ्वी कतरा पूर्वा कतरापरायोः कथा जाते कवयः को वि वेद. विश्वं त्मना बिभृतो यद्ध नाम वि वर्तेते अहनी चक्रियेव.. (१) हे क्रांतदर्शियो! धरती और आकाश में कौन पहले उत्पन्न हुआ है, कौन बाद में? इनके उत्पन्न होने का क्या कारण है? संसार के समस्त पदार्थों को ये स्वयं ही धारण किए हुए हैं एवं पहियों के समान घूमते रहते हैं. (१) भूरिं द्वे अचरन्ती चरन्तं पद्द्वन्तं गर्भमपदी दधाते. नित्यं न सूनूं पित्रोरुपस्थे द्यावा रक्षतं पृथिवी नो अभ्वात्.. (२) अचल एवं चरणसहित धरती और आकाश चलने वाले तथा चरणयुक्त प्राणियों को गर्भ के समान धारण करते हैं. जैसे माता-पिता की गोद में बालक रहता है, उसी प्रकार ये सबको रखते हैं. हे धरती और आकाश! हमें महापाप से बचाओ. (२) अनेहो दात्रमदितेरनर्वं हुवे स्वर्वदवधं नमस्वत्. तद्रोदसी जनयतं जरित्रे द्यावा रक्षतं पृथिवी नो अभ्वात्.. (३) हे धरती और आकाश! हम अदिति से जिस पापरहित, अक्षीण, स्वर्ग के तुल्य हिंसाशून्य एवं अन्नयुक्त धन की प्रार्थना करते हैं, तुम वही धन स्तुतिकर्त्ता यजमानों को देते हो. हे धरती और आकाश! हमें पाप से बचाओ. (३) अतप्यमाने अवसावन्ती अनु ष्याम रोदसी देवपुत्रे. उभे देवानामुभयेभिरह्नां द्यावा रक्षतं पृथिवी नो अभ्वात्.. (४) प्रकाशयुक्त दिन और रात्रि के दोनों प्रकार के धन के लिए दुःखरहित एवं अन्न द्वारा रक्षा करने वाले धरती और आकाश का हम अनुगमन करें. हे धरती और आकाश! हमें पाप से बचाओ. (४) सङ्गच्छमाने युवती समन्ते स्वसारा जामी पित्रोरुपस्थे. अभिजिघ्रन्ती भुवनस्य नाभिं द्यावा रक्षतं पृथिवी नो अभ्वात्.. (५) हे एक-दूसरे से मिले हुए, नित्य तरुण, समान सीमा वाले, बहिन और भाई के समान माता और पिता की गोदी में स्थित, प्राणियों की नाभिरूप जल को सूंघते हुए धरती और आकाश! हमें पाप से बचाओ. (५) उर्वी सझनी बृहती ऋतेन हुवे देवानामवसा जनित्री. ebook converter DEMO Watermarks*

दधाते ये अमृतं सुप्रतीके द्यावा रक्षतं पृथिवी नो अभ्वात्.. (६) धरती और आकाश विस्तृत, निवास करने योग्य, महान् एवं शस्य आदि को उत्पन्न करने वाले हैं. मैं देवों की प्रसन्नता के लिए इन्हें यज्ञ में बुलाता हूं. ये विचित्र रूप वाले एवं जल धारणकर्त्ता हैं. हे धरती और आकाश! हमें पाप से बचाओ. (६) उर्वी पृथ्‍वी बहुले दूरेअन्ते उप ब्रुवे नमसा यज्ञे अस्मिन्. दधाते ये सुभगे सुप्रतूर्ती द्यावा रक्षतं पृथिवी नो अभ्वात्.. (७) मैं इस यज्ञ में नमस्कार संबंधी मंत्रों द्वारा विस्तृत, महान्, अनेक आकारों वाले तथा अंतहीन धरती और आकाश की स्तुति करता हूं. हे सौभाग्यसंपन्न एवं सुखपूर्वक तरने वाले धरती और आकाश! हमें पाप से बचाओ. (७) देवान्वा यच्चकृमा कच्चिदागः सखायं वा सदमिज्जास्पतिं वा. इयं धीर्भूया अवयानमेषां द्यावा रक्षतं पृथिवी नो अभ्वात्.. (८) हे धरती और आकाश! हम देवों, बंधुओं एवं जमाता के प्रति नित्य जो अपराध करते हैं, हमारे उन अपराधों को दूर करो. तुम हमें पाप से बचाओ. (८) उभा शंसा नर्या मामविष्ठामुभे मामूती अवसा सचेताम्. भूरि चिदर्यः सुदास्तरायेषा मदन्त इषयेम देवाः.. (९) स्तुति के योग्य एवं मानवों के हितकारी धरती और आकाश के प्रति की गई स्तुतियां मेरी रक्षा करें. उक्त दोनों रक्षक मेरी रक्षा के लिए मिलें. हे देवो! तुम्हारे स्तुतिकर्त्ता हम हव्य अन्न द्वारा तुम्हें संतुष्ट करते हैं एवं दान करने के लिए अन्न की अभिलाषा करते हैं. (९) ऋतं दिवे तदवोचं पृथिव्या अभिश्रावाय प्रथमं सुमेधाः. पातामवद्याद्दुरितादभीके पिता माता च रक्षतामवोभिः.. (१०) मुझ बुद्धिमान् ने धरती और आकाश के प्रति ऐसी स्तुतियां की हैं, जो चारों दिशाओं में प्रकाशित हैं. धरती और आकाश रूपी माता-पिता मुझे निंदा-योग्य पाप से बचावें एवं अपने समीप रखकर मनचाही वस्तुओं से मेरा पालन करें. (१०) इदं द्यावापृथिवी सत्यमस्तु पितर्मातर्यदिहोपब्रुवे वाम्. भूतं देवानाभवमे अवोभिर्विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम्.. (११) हे माता और पितारूपी धरती और आकाश! इस यज्ञ में मेरे द्वारा की गई स्तुतियों को सार्थक करो. तुम रक्षा साधनों द्वारा हम स्तुतिकर्त्ताओं के पास आओ, जिससे हम अन्न, बल और दीर्घ आयु प्राप्त करें. (११) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—१८६ देवता—विश्वेदेव

सूक्त—१८६ देवता—विश्वेदेव आ न इळाभिर्विदथे सुशस्ति विश्वानरः सविता देव एतु. अपि यथा युवानो मत्सथा नो विश्वं जगदभिपित्वे मनीषा.. (१) अग्नि और सविता देव हमारी स्तुतियों को सुनकर धरती के देवों के साथ हमारे यज्ञ में पधारें. हे नित्य-युवाओ! तुम जिस प्रकार सारे संसार की रक्षा करते हो, उसी प्रकार हमारे यज्ञ में अपनी इच्छा से आकर हमारी रक्षा करो. (१) आ नो विश्व आस्क्रा गमन्तु देवा मित्रो अर्यमा वरुणः सजोषाः. भुवन्यथा नो विश्वे वृधासः करन्त्सुषाहा विथुरं न शवः.. (२) शत्रुओं पर आक्रमण करने वाले मित्र, वरुण और अर्यमादेव समान प्रसन्नता द्वारा हमारे यज्ञ में पधारें. सब देव हमारी वृद्धि करें, शत्रुओं को हरावें एवं हमें अन्न का स्वामी बनावें. (२) प्रेष्ठं वो अतिथिं गृणीषेऽग्निं शस्तिभिस्तुर्वणिः सजोषाः. असद्यथा नो वरुणः सुकीर्तिरिषश्च पर्षदरिगूर्तः सूरिः.. (३) हे देवो! मैं शीघ्रता करता हुआ एवं तुम्हारे साथ प्रसन्न होकर मंत्रों द्वारा तुम्हारे उत्तम अतिथि अग्नि की स्तुति करता हूं. शोभन कीर्ति संपन्न वरुण देव हमारे बनकर शत्रुओं के प्रति इनकार करें एवं हमारे लिए अन्नदाता बनें. (३) उप व एषे नमसा जिगीषोषासानक्ता सुदुघेव धेनुः. समाने अहन्विमिमानो अर्कं विषुरूपे पयसि सस्मिन्नूधन्.. (४) हे देवो! जिस प्रकार दुधारू गाय सवेरे और शाम दूध काढ़ने के स्थान में जाती है, उसी प्रकार हम पापों को जीतने की इच्छा से स्तुतिवचन के साथ प्रातःसायं तुम्हारे सामने उपस्थित होते हैं. हम गाय के थनों से उत्पन्न घी, दूध आदि पदार्थों को मिलाकर प्रतिदिन लाते हैं. (४) उत नोऽहिर्बुध्न्यो३ मयस्कः शिशुं न पिप्युषीव वेति सिन्धुः. येन नपातमपां जुनाम मनोजुवो वृषणो यं वहन्ति.. (५) अहिर्बुध्न हमें सुख दें. गाय जिस प्रकार बछड़े को तृप्त करती हुई आती है, उसी प्रकार सिंधु नदी हमें तृप्त करती हुई आवे. हम स्तुति करते हुए जल के नाती अग्नि से मिलें. मन के समान तेज चलने वाले बादल उन्हें ले जाते हैं. (५) उत न ईं त्वष्टा गन्त्वच्छा स्मत्सूरिभिरभिपित्वे सजोषाः. आ वृत्रहेन्द्रश्चर्षणिप्रास्तुविष्टमो नरां न इह गम्याः.. (६) ebook converter DEMO Watermarks*

त्वष्टा देव हमारे सामने आवें और यज्ञ के कारण स्तोता और ऋत्विजों के प्रति प्रसन्न हों. वृत्रनाशक, यजमानों की इच्छा पूर्ण करने वाले एवं महान् इंद्र हमारे इस यज्ञ में आवें. (६) उत न ईं मतयोऽश्वयोगाः शिशुं न गावस्तरुणं रिहन्ति. तमीं गिरो जनयो न पत्नीः सुरभिष्टमं नरां नसन्त.. (७) जिस प्रकार गाएं बछड़ों को चाटती हैं, उसी प्रकार घोड़ों के समान वेगशाली हमारी बुद्धियां नित्ययुवा इंद्र को घेरती हैं. स्त्रियां जिस प्रकार पति को पाकर संतान उत्पन्न करती हैं, उसी प्रकार हमारी स्तुतियां इंद्र के पास पहुंचकर फलों को जन्म दें. (७) उत न ईं मरुतो वृद्धसेनाः स्मद्रोदसी समनसः सदन्तु. पृषदश्वासोऽवनयो न रथा रिशादसो मित्रयुजो न देवाः.. (८) परम शक्तिशाली, हमारे समान ही प्रीतियुक्त, पृषत नामक घोड़ों वाले, नम्र एवं शत्रुनाशक मरुद्गण धरती और आकाश से हमारे पास इस प्रकार आवें, जिस प्रकार मित्रता करने वाले एक-दूसरे के समीप जाते हैं. (८) प्र नु यदेषां महिना चिकित्रे प्र युञ्जते प्रयुजस्ते सुवृक्ति. अध यदेषां सुदिने न शरुर्विश्वम्प्रैरिणं पृषायन्त सेनाः.. (९) मरुद्गण स्तुति का प्रयोग जानते हैं, इसलिए उनकी महिमा से सभी परिचित हैं. जिस प्रकार सुदिन में आकाश में प्रकाश फैल जाता है, उसी प्रकार मरुतों की वर्षा करने वाली सेना सारी ऊसर धरती को उपजाऊ बना देती है. (९) प्रो अश्विनाववसे कृणुध्वं प्र पूषणं स्वतवसो हि सन्ति. अद्वेषो विष्णुर्वात ऋभुक्षा अच्छा सुम्नाय ववृतीय देवान्.. (१०) हे ऋत्विजो! हमारी रक्षा के लिए अश्विनीकुमारों एवं पूषा के अतिरिक्त स्वाधीन शक्ति वाले तथा द्वेषरहित विष्णु, वायु और इंद्र की भी स्तुति करो. मैं सुख प्राप्ति के लिए सब देवों के सामने स्तुति करूंगा. (१०) इयं सा वो अस्मे दीधितिर्यजत्रा अपिप्राणी च सदनी च भूयाः. नि या देवेषु यतते वसूयुर्विद्यामेषं वृजनं जीरदानुभ्.. (११) हे यज्ञयोग्य देवो! तुम्हारी प्रसिद्ध ज्योति हमें प्राण और शरण देने वाली बने. तुम्हारी हव्य अन्न सहित स्तुति देवों को प्राप्त हो, जिससे हम अन्न, बल और दीर्घ आयु प्राप्त करें. (११) सूक्त—१८७ देवता—पितृ ebook converter DEMO Watermarks*

पितुं नु स्तोषं महो धर्माणं तविषीम्. यस्य त्रितो व्योजसा वृत्रं विपर्वमर्दयत्.. (१) मैं सबके धारणकर्त्ता एवं बलरूप पालक अन्न की शीघ्र स्तुति करता हूं. अन्न की शक्ति से इंद्र ने वृत्र असुर के टुकड़े कर दिए थे. (१) स्वादो पितो मधो पितो वयं त्वा ववृमहे. अस्माकमविता भव.. (२) हे स्वादिष्ट एवं मधुर पितः! हम तुम्हारी स्तुति करते हैं. तुम हमारे रक्षक बनो. (२) उप नः पितवा चर शिवः शिवाभिरूतिभिः. मयोभुरद्विषेण्यः सखा सुशेवो अद्वयाः.. (३) हे मंगलरूप पितः! कल्याणकारी रक्षा साधनों के साथ हमारे पास आओ और हमें सुख दो. तुम हमारे लिए प्रिय रस वाले मित्र एवं अनोखे सुखदाता बनो. (३) तव त्ये पितो रसा रजांस्यनु विष्ठिताः. दिवि वाताइव श्रिताः.. (४) हे पितः अर्थात् अन्न! जिस प्रकार आकाश में हवा व्याप्त है, उसी प्रकार तुम्हारा रस सारे संसार में फैला हुआ है. (४) तव त्ये पितो ददतस्तव स्वादिष्ठ ते पितो. प्र स्वाद्मानो रसानां तुविग्रीवाइवेरते.. (५) हे परम स्वादिष्ट पितः! तुम्हारी प्रार्थना करने वाले मनुष्य तुम्हारा भोग करते हैं. तुम्हारी कृपा से ही वे तुम्हारा दान करते हैं. तुम्हारे रस का भोग करने वाले मनुष्य गरदन ऊंची करके चलते हैं. (५) त्वे पितो महानां देवानां मनो हितम्. अकारि चारु केतुना तवाहिमवसावधीत्.. (६) हे पितः! महान् देवों का मन तुम्हीं में लगा हुआ है. इंद्र ने तुम्हारी रक्षा एवं बुद्धि का सहारा लेकर ही वृत्र का वध किया था. (६) यददो पितो अजगन्विवस्व पर्वतानाम्. अत्रा चिन्नो मधो पितोऽरं भक्षाय गम्याः.. (७) हे मधुर पितः! जब बादल प्रसिद्ध जल बरसाने को लावें, उस समय तुम पर्याप्त भोजन के रूप में हमारे समीप आना. (७) यदपामोषधीनां परिंशमारिशामहे. वातापे पीव इद्भव.. (८) हे शरीर! हम जौ आदि वनस्पतियों को पर्याप्त मात्रा में खाते हैं, इसलिए तुम मोटे बनो. ebook converter DEMO Watermarks*

(८) यत्ते सोम गवाशिरो यवाशिरो भजामहे. वातापे पीव इद्भव.. (९) हे सोमरूप अन्न! हम तुम्हारे यव एवं गोदुग्ध से बने पदार्थों को भक्षण करते हैं. हे शरीर! तुम मोटे बनो. (९) करम्भ ओषधे भव पीवो वृक्क उदारथिः. वातापे पीव इद्भव.. (१०) हे सत्तू के बने हुए गोले! तुम मोटापा लाने वाले एवं रोगनाशक बनो. हे शरीर! तुम मोटे बनो. (१०) तं त्वा वयं पितो वचोभिर्गावो न हव्या सुषूदिम. देवेभ्यस्त्वा सधमादमस्मभ्यं त्वा सधमादम्.. (११) हे पितः! गायों से जिस प्रकार हव्यरूप दूध ग्रहण करते हैं, उसी प्रकार हम स्तुतियां बोलकर तुमसे रस ग्रहण करते हैं. तुम समस्त देवों के साथ-साथ हमें भी आनंद देते हो. (११) सूक्त—१८८ देवता—आप्रिय (अग्नि) समिद्धो अद्य राजसि देवो देवैः सहस्रजित्. दूतो हव्या कवीर्वह.. (१) हे अग्नि! तुम ऋत्विजों द्वारा भली प्रकार उदीप्त होकर सुशोभित हो. हे सहस्रजित्! तुम कवि और दूत हो तुम हमारे हव्य को ले आओ. (१) तनूनपादृतं यते मध्वा यज्ञः समज्यते. दधत्सहस्रिणीरिषः.. (२) हे पूज्य तनूनपात् अग्नि! हजारों प्रकार के अन्न धारण करते हुए यजमान के कल्याण के लिए मधुर आज्य द्रव्यों से मिलते हैं. (२) आजुह्वानो न ईड्यो देवाँ आ वक्षि यज्ञियान्. अग्ने सहस्रसा असि.. (३) हे ईड्य अग्नि! हम तुम्हें बुलाते हैं. तुम यज्ञ के योग्य देवों को यहां लाओ. तुम हजारों प्रकार का अन्न देते हो. (३) प्राचीनं बर्हिरोजसा सहस्रवीरमस्तृणन्. यत्रादित्या विराजथ.. (४) हजारों वीरों वाले एवं पूर्व की ओर मुंह किए हुए अग्निरूपी कुश पर आदित्य बैठते हैं. ऋत्विज् उसे मंत्रों द्वारा फैलाते हैं. (४) ebook converter DEMO Watermarks*

विराट् सम्राड्विभ्वीः पृथ्वीर्बह्वीश्च भूयसीश्च याः. दुरो घृतान्यक्षरन्.. (५) यज्ञशाला में विराट्, सम्राट्, विप्र, प्रभु, बहु और भूयान् अग्नि घृतरूप जल गिराते हैं. (५) सुरुक्मे हि सुपेशसाधि श्रिया विराजतः. उषासावेह सीदताम्.. (६) सुंदर आभरण वाले एवं शोभनरूपसंपन्न अग्निरूपी रात और दिन अत्यंत शोभित होते हुए यहां बैठें. (६) प्रथमा हि सुवाचसा होतारा दैव्या कवी. यज्ञं नो यक्षतामिमम्.. (७) अग्नि देव अति श्रेष्ठ और प्रिय वचन होता एवं दिव्य कवि इन दो रूपों में हमारे यज्ञ में उपस्थित हों. (७) भारतीळे सरस्वति या वः सर्वा उपब्रुवे. ता नश्चोदयत श्रिये.. (८) हे भारती, सरस्वती और इला! तुम सब अग्नि के रूप हो. मैं तुम्हारा आह्वान करता हूं. तुम मुझे संपत्तिशाली बनने की प्रेरणा दो. (८) त्वष्टा रूपाणि हि प्रभुः पशून्विश्वान्समानजे. तेषां नः स्फातिमा यज.. (९) त्वष्टा रूपनिर्माण में समर्थ हैं. वे समस्त पशुओं को रूप देते हैं. वे हमारे पशुओं की वृद्धि करें. (९) उप त्मन्या वनस्पते पाथो देवेभ्यः सृज. अग्निहव्यानि सिष्वदत्. (१०) हे वनस्पति! तुम अपने आप देवों के लिए पशुरूप अन्न उत्पन्न करो. इस प्रकार अग्नि सभी हव्यों को स्वादिष्ट बनावेंगे. (१०) पुरोगा अग्निर्देवानां गायत्रेण समज्यते. स्वाहाकृतीषु रोचते.. (११) देवों के अग्रगामी अग्नि गायत्री छंद द्वारा जाने जाते हैं. स्वाहा शब्द बोलने पर वे जल उठते हैं. (११) सूक्त—१८९ देवता—अग्नि अग्ने नय सुपथा राये अस्मान्विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्. युयोध्य१ स्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नमउक्तिं विधेम.. (१) हे द्योतमान अग्नि! तुम सभी प्रकार के ज्ञानों को जानते हो, इसलिए हमें धन की ओर ebook converter DEMO Watermarks*

ले जाने वाले उत्तम मार्ग पर ले जाओ. कुटिलता उत्पन्न करने वाला पाप हमसे दूर करो. हम तुम्हें बार-बार नमस्कार कहते हैं. (१) अग्ने त्वं पारया नव्यो अस्मान्त्स्वस्तिभिरति दुर्गाणि विश्वा. पूश्च पृथ्वी बहुला न उर्वी भवा तोकाय तनयाय शं यो:.. (२) हे अति नवीन अग्नि! तुम अतिपूजित यज्ञादि साधनों का सहारा लेकर हमें दुर्गम पापों के पार पहुंचाओ. हमारी नगरी और धरती अत्यंत विस्तृत हो. हमारी संतान को तुम सुख दो. (२) अग्ने त्वमस्मद्युयोध्यमीवा अनग्नित्रा अभ्यमन्त कृष्टी:. पुनरस्मभ्यं सुविताय देव क्षां विश्वेभिरमृतेभिर्यजत्र.. (३) हे अग्नि! तुम समस्त रोगों के साथ-साथ अग्निहोत्र न करने वाले लोगों को भी हमसे दूर कर दो. हे प्रकाशमान एवं यज्ञ के योग्य अग्नि! तुम अन्य समस्त देवों के साथ आकर हमें यज्ञ में उत्तम फल दो. (३) पाहि नो अग्ने पायुभिरजस्रैरुत प्रिये सदन आ शुशुक्वान्. मा ते भयं जरितारं यविष्ठ नूनं विदन्मापरं सहस्व:.. (४) हे अग्नि! सदैव आश्रय देकर हमारा पालन करो एवं अपने प्रिय यज्ञस्थल में सब ओर से प्रकाशित बनो. हे अतिशय एवं शक्तिशाली अग्नि! तुम्हारे स्तोता मुझको आज या इसके बाद कभी भी भय न लगे. (४) मा नो अग्नेऽव सृजो अघायाविष्यवे रिपवे दुच्छुनायै. मा दत्वते दशत मादते नो मा रीषते सहसावन्परा दा:.. (५) हे अग्नि! हमें हिंसक, भूखे और दुःखदाता शत्रु के अधीन मत होने दो. हमें दांत वाले कटखने सर्पादि, बिना दांत के, सींग वाले पशुओं एवं हिंसक राक्षसों को भी मत सौंपो. (५) वि घ त्वावां ऋतजात यंसद्गृणानो अग्ने तन्वे३ वरूथम्. विश्वाद्विरिक्षोरुत वा निनित्सोरभिहुतामसि हि देव विष्पट्.. (६) हे यज्ञ से उत्पन्न एवं वरणीय अग्नि देव! जो लोग शरीर की पुष्टि के लिए तुम्हारी स्तुति करते हैं, उन्हें तुम हिंसक, चोर आदि एवं निंदक लोगों से बचाते हो. तुम अपने सामने कुटिल आचरण करने वाले के बाधक बनो. (६) त्वं ताँ मन उभायान्वि विद्वांन्वेषि प्रपित्वे मनुषो यजत्र. अभिपित्वे मनवे शास्यो भूर्म्मर्मृजेन्य उशिग्निभर्नाक:.. (७) ebook converter DEMO Watermarks*

हे यज्ञ के योग्य अग्नि! तुम यज्ञ करने वाले एवं न करने वाले दोनों को जानते हुए यज्ञकर्त्ताओं की ही कामना करो. हे आक्रमणकारी अग्नि! यज्ञ की अभिलाषा करने वाले यजमान को जिस प्रकार ऋत्विज् शिक्षा देते हैं, उसी प्रकार तुम यजमान की शिक्षा के पात्र बनो. (७) अवोचाम निवचनान्यस्मिन्मानस्य सूनुः सहसाने अग्नौ. वयं सहस्रमृषिभिः सनेम विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम्.. (८) मंत्रों के पुत्र और शत्रुओं के नाशक अग्नि को लक्ष्य करके ये सब स्तोत्र बनाए गए हैं. हम इंद्रियों से परे रहने वाले अर्थ के प्रकाशक इन मंत्रों से हजारों प्रकार के धन के अतिरिक्त अन्न, बल और दीर्घ आयु प्राप्त करें. (८) सूक्त—१९० देवता—बृहस्पति अनर्वाणं वृषभं मन्द्रजिह्वं बृहस्पतिं वर्धया नव्यमर्कैः. गाथान्यः सुरुचो यस्य देवा आशृण्वन्ति नवमानस्य मर्ताः.. (१) हे होता! न त्यागने वाले, फलदायक, मधुरभाषी एवं स्तुति के योग्य बृहस्पति को मंत्रों द्वारा बढ़ाओ. शोभन दीप्ति एवं स्तुति किए जाते हुए बृहस्पति को गाथा नामक मंत्रों का पाठ करने वाले मनुष्य और देव स्तुतियां सुनाते हैं. (१) तमृत्विया उप वाचः सचन्ते सर्गो न यो देवयतामसर्जि. बृहस्पतिः सह्यञ्जो वरांसि विभ्वाभवत्सम्ऋते मातरिश्वा.. (२) वर्षा ऋतु संबंधी स्तुतियां जल की सृष्टि करने वाले एवं देवभक्त यजमानों को फल देने वाले बृहस्पति के समीप जाती हैं. वे आकाश रूपी व्यापी मातरिश्वा के समान सभी उत्तम फलों को उत्पन्न करके यज्ञ के निमित्त प्रकट करते हैं. (२) उपस्तुतिं नमस उद्यतिं च श्लोकं यंसत्सवितैव प्र बाहू. अस्य क्रत्वाहन्यो३ यो अस्ति मृगो न भीमो अरक्षसस्तुविष्मान्.. (३) जिस प्रकार सूर्य अपनी किरणों से प्रकाश देता है, उसी प्रकार बृहस्पति यजमानों के समीप जाकर उनकी स्तुतियां, अन्नदान एवं स्तुतिमंत्रों को स्वीकार करते हैं. विरोधहीन इन बृहस्पति की शक्ति से दिन के सूर्य, भयानक सिंह आदि के समान शक्तिशाली बनकर घूमते हैं. (३) अस्य श्लोको दिवीयते पृथिव्यामत्यो न यंसद्यक्षभृद्विचेताः. मृगाणां न हेतयो यन्ति चेमा बृहस्पतेरहिमायाँ अभि द्यून्.. (४) ebook converter DEMO Watermarks*

बृहस्पति की कीर्ति धरती और आकाश में फैली है. वे आदित्य के समान हव्य धारण करते हुए प्राणियों में बुद्धि संचार के साथ-साथ उन्हें फल भी देते हैं. बृहस्पति के आयुध मायावियों की ओर शिकारी लोगों के आयुधों के समान तेजी से चलते हैं. (४) ये त्वा देवोस्रिकं मन्यमानाः पापा भद्रमुपजीवन्ति पज्राः. न दूह्ये३ अनु ददासि वामं बृहस्पते चयस इत्पियारुम्.. (५) हे बृहस्पतिदेव! तुम कल्याणकारक हो. जो पापी लोग तुम्हें बूढ़ा बैल समझकर तुम्हारे समीप जाते हैं, उन्हें मनचाहा उत्तम धन मत देना. तुम सोमयाग करने वाले पर अवश्य कृपा करना. (५) सुप्रैतुः सूयवसो न पन्था दुर्नियन्तुः परिप्रीतो न मित्रः. अनर्वाणो अभि ये चक्षते नोऽपीवृता अपोर्णुवन्तो अस्थुः.. (६) हे बृहस्पति! तुम शोभन मार्ग वाले एवं उत्तम धन से युक्त यजमान के लिए मार्ग के समान सरल एवं दुष्टों के नियंत्रण करने वाले राजा के प्रसन्न मित्र बनो. जो विरोधी हमारी निंदा करते हैं और सुरक्षित रहते हैं, उन्हें रक्षाहीन करो. (६) सं यं स्तुभोऽवनयो न यन्ति समुद्रं न स्रवतो रोधचक्राः. स विद्वाँ उभयं चष्टे अन्तर्बृहस्पतिस्तर आपश्च गृध्रः.. (७) जिस प्रकार सभी मनुष्य राजाओं एवं किनारों को तोड़ने वाली नदियां सागर के पास जाती हैं, उसी प्रकार स्तुतियां बृहस्पति को प्राप्त होती हैं. वे सब जानते हैं और आकाशचारी पक्षी के रूप में जल और तट दोनों को देखते हैं तथा वर्षा करने के इच्छुक होकर दोनों को उत्पन्न करते हैं. (७) एवा महस्तुविजातस्तुविष्मान्बृहस्पतिर्वृषभो धायि देवः. स नः स्तुतो वीरवद्धात्तु गोमद्विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम्.. (८) महान्, बहुतों के उपकार के लिए उत्तम, बलवान्, जलवर्षक एवं दीप्तिमान् बृहस्पति की स्तुति इसी रूप में की जाती है. वे हमारी स्तुति सुनकर हमें विविध फल दें और हम अन्न, बल तथा दीर्घ आयु प्राप्त करें. (८) सूक्त—१९१ देवता—जल आदि कङ्कतो न कङ्कतोऽथो सतीनकङ्कतः. द्वाविति प्लुषी इति न्य१दृष्टा अलिप्सत.. (१) अल्पविष, महाविष, जलचारी अरूपविष, दो प्रकार के जलचर एवं थलचर प्राणी,

दाहक एवं अदृश्य प्राणी मुझे घेरे हैं. (१) अदृष्टान्हन्त्यायत्यथो हन्ति परायती. अथो अबघ्नती हन्त्यथो पिनष्टि पिंषती.. (२) विषधर जीवों से काटे हुए के पास आकर ओषधि विष का प्रभाव नष्ट करती है एवं दूर जाती हुई भी नष्ट करती है. उसे जब उखाड़ते हैं एवं पीसते हैं, तब भी वह विष का प्रभाव नष्ट करती है. (२) शरासः कुशरासो दर्भासः सैर्या उत. मौञ्जा अदृष्टा बैरिणाः सर्वे साकं न्यलिप्तत.. (३) शर, कुश, दर्भ, सैर्य, मुंज एवं वीरण नामक घासों में छिपे हुए विषधर मुझसे एक साथ लिपट जाते हैं. (३) नि गावो गोष्ठे असदन्नि मृगासो अविक्षत. नि केतवो जनानां न्य१दृष्टा अलिप्तत.. (४) जब गाएं गोशाला में बैठती हैं, हरिण निवासस्थान में बैठते हैं एवं मनुष्य निद्रा के कारण ज्ञानशून्य होते हैं, उस समय अदृष्ट विषधर आकर मुझसे लिपट जाते हैं. (४) एत उ त्ये प्रत्यदृश्रन्प्रदोषं तस्करा इव. अदृष्टा विश्वदृष्टाः प्रतिबुद्धा अभूतन.. (५) वे चोरों के समान रात में देखे जाते हैं. वे किसी को दिखाई नहीं देते, पर सारे संसार को देखते रहते हैं. सब लोग उनसे सावधान रहें. (५) द्यौर्वः पिता पृथिवी माता सोमो भ्रातादितिः स्वसा. अदृष्टा विश्वदृष्टास्तिष्ठतेलयता सु कम्.. (६) हे सर्पो! आकाश तुम्हारा पिता, धरती माता, सोम भ्राता और अदिति तुम्हारी बहिन है. तुम्हें कोई नहीं देख पाता, पर तुम सबको देखते हो. तुम अपने स्थान में रहो एवं सुखपूर्वक गमन करो. (६) ये अंस्या ये अङ्ग्याः सूचीका ये प्रकङ्कताः. अदृष्टाः किं चनेह वः सर्वे साकं नि जस्यत.. (७) जो जंतु स्कंध वाले, अंग वाले, सूची वाले एवं अत्यंत विषधारी हैं, ऐसे अदृष्ट विषधरों का यहां कोई काम नहीं है. तुम सब यहां से एक साथ चले जाओ. (७) उत्पुरस्तात्सूर्य एति विश्वदृष्टो अदृष्टहा. अदृष्टान्सर्वाञ्जम्भयन्त्सर्वाश्च यातुधान्यः.. (८) ebook converter DEMO Watermarks*

सारे संसार को देखने वाले एवं अदृष्ट विषधरों को नष्ट करने वाले सूर्य पूर्व दिशा में निकलते हैं. वे सभी अदृष्ट विषधारियों एवं राक्षसों को भयभीत करके भगा देते हैं. (८) उदपप्तदसौ सूर्यः पुरु विश्वानि जूर्वन्. आदित्यः पर्वतेभ्यो विश्वदृष्टो अदृष्टहा.. (९) सारे संसार को देखने वाले एवं अदृष्ट विषधारियों को नष्ट करने वाले सूर्य विषैले जंतुओं को अत्यंत दुर्बल बनाते हुए उदयगिरि से निकलते हैं. (९) सूर्ये विषमा सजामि दृति सुरावतो गृहे. सो चिन्नु न मराति नो वयं मरामारे अस्य योजनं हरिष्ठा मधु त्वा मधुला चकार.. (१०) सुरा बनाने वाला जिस प्रकार चमड़े के पात्र में शराब डालता है, उसी प्रकार मैं विष सूर्य मंडल की ओर फेंकता हूं. जिस प्रकार सूर्य नहीं मरते, उसी प्रकार हम भी न मरें. घोड़ों द्वारा लाए गए सूर्य दूरवर्ती विष को नष्ट कर देते हैं. हे विष! सूर्य की मधुविद्या तुम्हें अमृत बना देती है. (१०) इयत्तिका शकुन्तिका सका जघास ते विषम्. सो चिन्नु न मराति नो वयं मरामारे अस्य योजनं हरिष्ठा मधु त्वा मधुला चकार.. (११) छोटी सी चिड़िया ने तुम्हारा विष खा लिया और नहीं मरी. उसी प्रकार हम भी नहीं मरेंगे. हे विष! घोड़ों द्वारा गमन करने वाले सूर्य दूर से ही विष को नष्ट कर देते हैं. उनकी मधुविद्या तुम्हें अमृत बना देती है. (११) त्रिः सप्त विष्पुलिङ्गका विषस्य पुष्यमक्षन्. ताश्चिन्नु न मरन्ति नो वयं मरामारे अस्य योजनं हरिष्ठा मधु त्वा मधुला चकार.. (१२) अग्नि की सातों जिह्वाओं में सफेद, लाल और काले इस प्रकार मिलकर इक्कीस वर्ण पक्षी के रूप में विष का नाश करते हैं. जब वे नहीं मरते तो हम भी नहीं मरेंगे. अपने घोड़ों द्वारा गमनशील सूर्य दूर रखे विष का नाश करते हैं. हे विष! सूर्य की मधुविद्या तुझे अमृत बना देती है. (१२) नवानां नवतीनां विषस्य रोपुषीणाम्. सर्वासामग्रभं नामारे अस्य योजनं हरिष्ठा मधु त्वा मधुला चकार.. (१३) निन्यानवे नदियां विष नष्ट करने वाली हैं. मैं सबका नाम पुकारता हूं. घोड़ों द्वारा चलने वाले सूर्य दूर रखे विष को भी नष्ट कर देते हैं. हे विष! मधु-विद्या तुझे अमृत बना देगी. (१३) त्रिः सप्त मयूर्यः सप्त स्वसारो अग्रुवः. तास्ते विषं वि जभ्रिर उदकं कुम्भिनीरिव.. (१४)

हे शरीर! जिस प्रकार नारियां घड़ों में जल भरकर ले जाती हैं, उसी प्रकार इक्कीस मयूरियां एवं सात नदियां तुम्हारा विष दूर करें. (१४) इयत्तकः कुषुम्भकस्तकं भिनद्म्यश्मना. ततो विषं प्र वावृते पराचीरनु संवतः.. (१५) हे शरीर! छोटा सा नकुल यदि तुम्हारा विष समाप्त नहीं करेगा तो मैं उसे पत्थर से मार डालूंगा. इस प्रकार विष मेरे शरीर से निकलकर दूर दिशाओं में चला जाए. (१५) कुषुम्भकस्तदब्रवीद्गिरेः प्रवर्तमानकः. वृश्चिकस्यारसं विषम़रसं वृश्चिक ते विषम्.. (१६) पर्वत से आने वाले नकुल ने कहा—“बिच्छू का विष बेकार है.” हे बिच्छू! तुम्हारा विष प्रभावहीन है. (१६)

सूक्त—१ देवता—अग्नि

द्वितीय मंडल सूक्त—१ देवता—अग्नि त्वमग्ने द्युभिस्त्वमाशुशुक्षणिस्त्वमद्भ्यस्त्वमश्मनस्परि. त्वं वनेभ्यस्त्वमोषधीभ्यस्त्वं नृणां नृपते जायसे शुचिः.. (१) हे मनुष्यों के पालक एवं पवित्र अग्नि! तुम यज्ञ के दिन जल, पाषाण, वन एवं ओषधियों से दीप्तिशाली रूप में उत्पन्न हो जाओ. (१) तवाग्ने होत्रं तव पोत्रमृत्वियं तव नेष्ट्रं त्वमग्निदृतायतः. तव प्रशास्त्रं त्वमध्वरीयसि ब्रह्मा चासि गृहपतिश्च नो दमे.. (२) हे अग्नि! यज्ञ के होता, पोता, ऋत्विज् और नेष्टा जो कर्म करते हैं, वह तुम्हारा है. तुम अग्नीध्र हो. यज्ञ की इच्छा करने पर तुम प्रशास्ता का काम भी करने लगते हो. तुम्हीं अध्वर्यु एवं ब्रह्मा हो. मेरे इस यज्ञगृह में तुम्हीं गृहपति हो. (२) त्वमग्न इन्द्रो वृषभः सतामसि त्वं विष्णुरुरुगायो नमस्यः. त्वं ब्रह्मा रयिविद्ब्रह्मणस्पते त्वं विधर्तः सचसे पुरन्ध्या.. (३) हे अग्नि! सज्जनों की मनोकामना पूर्ण करने के कारण तुम इंद्र हो. तुम्हीं बहुत से भक्तों द्वारा स्तुत एवं नमस्कार करने योग्य विष्णु हो. तुम मंत्रों के पालक एवं धनों के ज्ञाता ब्रह्मा हो. तुम विविध पदार्थों का निर्माण करते एवं सबकी बुद्धियों में निवास करते हो. (३) त्वमग्ने राजा वरुणो धृतव्रतस्त्वं मित्रो भवसि दस्म ईड्यः. त्वमर्यमा सत्पतिर्यस्य सम्भुजं त्वमंशो विदथे देव भाजयुः.. (४) हे अग्नि! तुम व्रतधारी राजा वरुण एवं स्तुतियोग्य शत्रुनाशक मित्र हो. तुम्हीं सज्जनों के रक्षक एवं व्यापक दान वाले अर्यमा तथा अंश अर्थात् सूर्य हो. तुम सभी का यज्ञ सफल बनाओ. (४) त्वमग्ने त्वष्टा विधते सुवीर्यं तव ग्नावो मित्रमहः सजात्यम्. त्वमाशुहेमा ररिषे स्वश्व्यं त्वं नरां शर्धो असि पुरूवसुः.. (५) ebook converter DEMO Watermarks*