भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 486, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 486

ले जाने वाले उत्तम मार्ग पर ले जाओ. कुटिलता उत्पन्न करने वाला पाप हमसे दूर करो. हम तुम्हें बार-बार नमस्कार कहते हैं. (१) अग्ने त्वं पारया नव्यो अस्मान्त्स्वस्तिभिरति दुर्गाणि विश्वा. पूश्च पृथ्वी बहुला न उर्वी भवा तोकाय तनयाय शं यो:.. (२) हे अति नवीन अग्नि! तुम अतिपूजित यज्ञादि साधनों का सहारा लेकर हमें दुर्गम पापों के पार पहुंचाओ. हमारी नगरी और धरती अत्यंत विस्तृत हो. हमारी संतान को तुम सुख दो. (२) अग्ने त्वमस्मद्युयोध्यमीवा अनग्नित्रा अभ्यमन्त कृष्टी:. पुनरस्मभ्यं सुविताय देव क्षां विश्वेभिरमृतेभिर्यजत्र.. (३) हे अग्नि! तुम समस्त रोगों के साथ-साथ अग्निहोत्र न करने वाले लोगों को भी हमसे दूर कर दो. हे प्रकाशमान एवं यज्ञ के योग्य अग्नि! तुम अन्य समस्त देवों के साथ आकर हमें यज्ञ में उत्तम फल दो. (३) पाहि नो अग्ने पायुभिरजस्रैरुत प्रिये सदन आ शुशुक्वान्. मा ते भयं जरितारं यविष्ठ नूनं विदन्मापरं सहस्व:.. (४) हे अग्नि! सदैव आश्रय देकर हमारा पालन करो एवं अपने प्रिय यज्ञस्थल में सब ओर से प्रकाशित बनो. हे अतिशय एवं शक्तिशाली अग्नि! तुम्हारे स्तोता मुझको आज या इसके बाद कभी भी भय न लगे. (४) मा नो अग्नेऽव सृजो अघायाविष्यवे रिपवे दुच्छुनायै. मा दत्वते दशत मादते नो मा रीषते सहसावन्परा दा:.. (५) हे अग्नि! हमें हिंसक, भूखे और दुःखदाता शत्रु के अधीन मत होने दो. हमें दांत वाले कटखने सर्पादि, बिना दांत के, सींग वाले पशुओं एवं हिंसक राक्षसों को भी मत सौंपो. (५) वि घ त्वावां ऋतजात यंसद्गृणानो अग्ने तन्वे३ वरूथम्. विश्वाद्विरिक्षोरुत वा निनित्सोरभिहुतामसि हि देव विष्पट्.. (६) हे यज्ञ से उत्पन्न एवं वरणीय अग्नि देव! जो लोग शरीर की पुष्टि के लिए तुम्हारी स्तुति करते हैं, उन्हें तुम हिंसक, चोर आदि एवं निंदक लोगों से बचाते हो. तुम अपने सामने कुटिल आचरण करने वाले के बाधक बनो. (६) त्वं ताँ मन उभायान्वि विद्वांन्वेषि प्रपित्वे मनुषो यजत्र. अभिपित्वे मनवे शास्यो भूर्म्मर्मृजेन्य उशिग्निभर्नाक:.. (७) ebook converter DEMO Watermarks*