ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 488, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंबृहस्पति की कीर्ति धरती और आकाश में फैली है. वे आदित्य के समान हव्य धारण करते हुए प्राणियों में बुद्धि संचार के साथ-साथ उन्हें फल भी देते हैं. बृहस्पति के आयुध मायावियों की ओर शिकारी लोगों के आयुधों के समान तेजी से चलते हैं. (४) ये त्वा देवोस्रिकं मन्यमानाः पापा भद्रमुपजीवन्ति पज्राः. न दूह्ये३ अनु ददासि वामं बृहस्पते चयस इत्पियारुम्.. (५) हे बृहस्पतिदेव! तुम कल्याणकारक हो. जो पापी लोग तुम्हें बूढ़ा बैल समझकर तुम्हारे समीप जाते हैं, उन्हें मनचाहा उत्तम धन मत देना. तुम सोमयाग करने वाले पर अवश्य कृपा करना. (५) सुप्रैतुः सूयवसो न पन्था दुर्नियन्तुः परिप्रीतो न मित्रः. अनर्वाणो अभि ये चक्षते नोऽपीवृता अपोर्णुवन्तो अस्थुः.. (६) हे बृहस्पति! तुम शोभन मार्ग वाले एवं उत्तम धन से युक्त यजमान के लिए मार्ग के समान सरल एवं दुष्टों के नियंत्रण करने वाले राजा के प्रसन्न मित्र बनो. जो विरोधी हमारी निंदा करते हैं और सुरक्षित रहते हैं, उन्हें रक्षाहीन करो. (६) सं यं स्तुभोऽवनयो न यन्ति समुद्रं न स्रवतो रोधचक्राः. स विद्वाँ उभयं चष्टे अन्तर्बृहस्पतिस्तर आपश्च गृध्रः.. (७) जिस प्रकार सभी मनुष्य राजाओं एवं किनारों को तोड़ने वाली नदियां सागर के पास जाती हैं, उसी प्रकार स्तुतियां बृहस्पति को प्राप्त होती हैं. वे सब जानते हैं और आकाशचारी पक्षी के रूप में जल और तट दोनों को देखते हैं तथा वर्षा करने के इच्छुक होकर दोनों को उत्पन्न करते हैं. (७) एवा महस्तुविजातस्तुविष्मान्बृहस्पतिर्वृषभो धायि देवः. स नः स्तुतो वीरवद्धात्तु गोमद्विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम्.. (८) महान्, बहुतों के उपकार के लिए उत्तम, बलवान्, जलवर्षक एवं दीप्तिमान् बृहस्पति की स्तुति इसी रूप में की जाती है. वे हमारी स्तुति सुनकर हमें विविध फल दें और हम अन्न, बल तथा दीर्घ आयु प्राप्त करें. (८) सूक्त—१९१ देवता—जल आदि कङ्कतो न कङ्कतोऽथो सतीनकङ्कतः. द्वाविति प्लुषी इति न्य१दृष्टा अलिप्सत.. (१) अल्पविष, महाविष, जलचारी अरूपविष, दो प्रकार के जलचर एवं थलचर प्राणी,