ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सूक्त—३७ देवता—विश्वेदेव
हे मरुतो! हमारी ये स्तुतियां तुम्हारे सामने जावें. ये हमारे रक्षक एवं गर्भपालक विष्णु के पास जावें. वे स्तोता को संतान एवं अन्न दें. तुम अपने कल्याणसाधनों से हमारी सदा रक्षा करो. (९) सूक्त—३७ देवता—विश्वेदेव आ वो वाहिष्ठो वहतु स्तवध्यै रथो वाजा ऋभुक्षणो अमृक्तः. अभि त्रिपृष्ठैः सवनेषु सोमैर्मदे सुशिप्रा महभिः पृणध्वम्.. (१) हे विस्तीर्ण तेज के आधाररूप ऋभुआे! ढोने में अधिक समर्थ, प्रशंसा के योग्य एवं अबाधित रथ तुम्हें वहन करे. हे सुंदर ठोड़ी वाले ऋभुआे! तुम हमारे यज्ञ में आनंद के लिए दूध, दही एवं सत्तू से मिला महान् सोम पीकर अपना पेट भरो. (१) यूयं ह रत्नं मघवत्सु धत्थ स्वर्द्दश ऋभुक्षणो अमृक्तम्. सं यज्ञेषु स्वधावन्तः पिबध्वं वि नो राधांसि मतिभिर्द्यध्वम्.. (२) हे स्वर्गदर्शी ऋभुआे! हम हव्यरूप अन्न वालों को नाशरहित रत्न दो. इसके पश्चात् तुम शक्तिशाली बनकर सोमपान करो. तुम अपनी कृपा से हमें धन दो. (२) उवोचिथ हि मघवन्देष्वां महो अर्भस्य वसुनो विभागे. उभा ते पूर्णा वसुना गभस्ती न सूनृता नि यमते वसव्या.. (३) हे धनवान् इंद्र! तुम महान् एवं अल्प धन के विभाग के समय धन का सेवन करते हो. तुम्हारे दोनों हाथ धन से पूर्ण हैं. तुम्हारी वाणी भुजाओं को नहीं रोकती. (३) त्वमिन्द्र स्वयशा ऋभुक्षा वाजो न साधुरस्तमेष्युक्वा. वयं नु ते दाश्वांसः स्याम ब्रह्म कृण्वन्तो हरिवो वसिष्ठाः.. (४) हे असाधारण यशस्वी, ऋभुओं के स्वामी एवं यज्ञसाधक इंद्र! तुम अन्न के समान स्तोता के घर जाओ. हे हरि नामक घोड़ों के स्वामी इंद्र! हम वसिष्ठपुत्र तुम्हें हव्य देते हुए तुम्हारी स्तुति करें. (४) सनितासि प्रवतो दाशुषे चिद्याभिर्विवेषो हर्यश्व धीभिः. ववन्मा नु ते युज्याभिरूती कदा न इन्द्र राय आ दशस्येः.. (५) हे हरि नामक घोड़ों के स्वामी एवं हमारी स्तुतियों से व्याप्त इंद्र! तुम हव्यदाता यजमान को पर्याप्त धन देते हो. हे इंद्र! तुम हमें धन कब दोगे? आज हम तुम्हारे योग्य रक्षण से युक्त हों. (५) वासयसीव वेधसस्त्वं नः कदा न इन्द्र वचसो बुबोधः.
अस्तं तात्या धिया रयिं सुवीरं पृक्षो नो अर्वा न्युहीत् वाजी.. (६) हे इंद्र! तुम हमारी स्तुतियों को कब समझोगे? हम स्तोताओं को तुम इसी समय अपने स्थान में आश्रय दो. तुम्हारा शक्तिशाली घोड़ा हमारी स्तुति के कारण संतानसहित अन्न हमारे घर लावे. (६) अभि यं देवी निर्ऋतिश्चिदीशे नक्षन्त इन्द्रं शरदः सुपृक्षः. उप त्रिबन्धुर्जरदष्टिमेत्यस्ववेशं यं कृणवन्त मर्ताः.. (७) देवी निर्ऋति स्वामी बनाने के लिए इंद्र को व्याप्त करती है. शोभन अन्न वाले वर्ष इंद्र को व्याप्त करते हैं. मरणशील स्तोता इंद्र को अपने घर में बैठाता है. तीनों लोकों को धारण करने वाले इंद्र अन्न को पचाने वाला बल देते हैं. (७) आ नो राधांसि सवितः स्तवध्या आ रायो यन्तु पर्वतस्य रातौ. सदा नो दिव्यः पायुः सिषक्तु यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (८) हे सविता! स्तुतियोग्य धन तुम्हारे पास से हमारे समीप आवे. मेघ द्वारा धन देने पर धन हमें प्राप्त हो. दिव्य एवं रक्षक इंद्र हमारी सदा रक्षा करें. तुम कल्याणसाधनों द्वारा सदा हमारी रक्षा करो. (८) सूक्त—३८ देवता—सविता उदु ष्य देवः सविता ययाम हिरण्ययीममतिं यामशिश्रेत्. नूनं भगो हव्यो मानुषेभिर्वि यो रत्ना पुरूवसुर्दधाति.. (१) सविता जिस स्वर्णमय रूप का आश्रय लेते हैं, उसीको उत्पन्न करते हैं। सूर्य निश्चय ही मनुष्यों द्वारा स्तुतियोग्य हैं. विविध संपत्तियों वाले सविता स्तोताओं को रमणीय धन देते हैं. (१) उदु तिष्ठ सवितः श्रुध्य१स्य हिरण्यपाणे प्रभृतावृतस्य. व्यु१र्वी पृथ्वीममतिं सृजान आ नृभ्यो मर्तभोजनं सुवानः.. (२) हे सविता! तुम उदय करो. हे सोने के हाथों वाले सविता! तुम हमारी अभिलाषा पूर्ण करने के लिए हमारा स्तोत्र सुनो. तुम विस्तृत एवं असीमित प्रभा उत्पन्न करते हो एवं स्तोताओं को मानवभोग योग्य धन देते हो. (२) अपि ष्टुतः सविता देवो अस्तु यमा चिद्विश्वे वसवो गृणन्ति. स नः स्तोमान्नमस्य१श्नो धाद्विश्वेभिः पातु पायुभिर्नि सूरीन्.. (३) हम सविता देव की स्तुति करें. सब देव जिनकी स्तुति करते हैं, वे ही नमस्कारयोग्य ebook converter DEMO Watermarks*
सविता हमारे स्तोत्रों एवं अन्नों को धारण करें तथा समस्त रक्षासाधनों द्वारा स्तोताओं की रक्षा करें. (३) अभि यं देव्यदितिर्गृणाति सवं देवस्य सवितुर्जषाणा. अभि सम्राजो वरुणो गृणन्त्यभि मित्रासो अर्यमा सजोषाः.. (४) सविता देव की आज्ञा का पालन करती हुई अदिति देवी उनकी स्तुति करती हैं. भली प्रकार सुशोभित वरुण आदि उनकी स्तुति करते हैं. मित्र एवं अर्यमा समान प्रेम द्वारा उनकी स्तुति करते हैं. (४) अभि ये मिथो वनुषः सपन्ते रातिं दिवो रातिषाचः पृथिव्याः. अहिर्बुध्न्य उत नः शृणोतु वरूत्र्येकधेनुभिर्नि पातु.. (५) दान करने वाले एवं सेवानिपुण यजमान परस्पर संगत होकर स्वर्ग एवं धरती के मित्र सविता की सेवा करते हैं. अहिर्बुध्न्य हमारा स्तोत्र सुनें. सरस्वती प्रमुख धेनुओं द्वारा हमारा भली-भांति पालन करें. (५) अनु तन्नो जास्पतिर्मंसीष्ट रत्नं देवस्य सवितुरियानः. भगमुग्रोऽवसे जोहवीति भगमनुग्रो अध याति रत्नम्.. (६) प्रजापालक सविता देव हमारी याचना सुनकर अपना प्रसिद्ध धन हमें दें. उग्र स्तोता हमारी रक्षा के लिए भग नामक देव को बार-बार बुलाता है. असमर्थ स्तोता भग से रत्न मांगता है. (६) शं नो भवन्तु वाजिनो हवेषु देवताता मितद्रवः स्वर्काः. जम्भयन्तोऽहिं वृकं रक्षांसि सनेम्यस्मद्युयवन्नमीवाः.. (७) यज्ञ के स्तोत्रों के समय सीमित गति एवं शोभन अन्न वाले वाजी नामक देव हमें सुख देने वाले हों. वे हननकर्त्ता एवं चोर राक्षसों को नष्ट करते हुए पुराने रोगों को हमसे पृथक् करें. (७) वाजेवाजेऽवत वाजिनो नो धनेषु विप्रा अमृता ऋतज्ञाः. अस्य मध्वः पिबत मादयध्वं तृप्ता यात पथिभिर्देवयानैः.. (८) हे बुद्धिमान्, मरणरहित एवं सत्य को जानने वाले वाजी नामक देवो! तुम धन के कारण होने वाले प्रत्येक युद्ध में हमारी रक्षा करो. तुम इस सोम को पीकर प्रमुदित बनो एवं देवयान मार्गों द्वारा जाओ. (८) सूक्त—३९ देवता—विश्वेदेव ebook converter DEMO Watermarks*
ऊर्ध्वो अग्निः सुमतिं वस्वो अश्रेत्प्रतीची जूर्णिर्देवतातिमेति. भेजाते अद्री रथ्येव पन्थामृतं होता न इषितो यजाति.. (१) ऊपर की ओर गति करने वाले अग्नि मुझ स्तोता की शोभनस्तुति को सुनें. सब लोगों को बूढ़ा बनाने वाली एवं पूर्व की ओर मुंह करने वाली उषा यज्ञ में जाती है. श्रद्धायुक्त यजमान एवं उसकी पत्नी रथस्वामियों के समान यज्ञमार्ग पर आते हैं. हमारे द्वारा भेजा हुआ स्तोता यज्ञ करता है. (१) प्र वावृजे सुप्रया बर्हिरेषामा विशपतीव बीरिट इयाते. विशामक्तोरुषसः पूर्वहूतौ वायुः पूषा स्वस्तये नियुत्वान्.. (२) इन यजमानों का शोभन अन्न से युक्त कुश प्राप्त होता है. इस समय हमारी प्रजाओं के पालक एवं घोड़ियों के स्वामी वायु एवं पूषा प्रजाओं के कल्याण के लिए रात्रिसंबंधी उषा की पहली पुकार सुनकर अंतरिक्ष में आते हैं. (२) जम्या अत्र वसवो रन्त देवा उरावन्तरिक्षे मर्जयन्त शुभ्राः. अर्वाक् पथ उरुज्रयः कृणुध्वं श्रोता दूतस्य जग्मुषो नो अस्य.. (३) वसुगण इस यज्ञ में धरती पर रमण करें. विस्तृत अंतरिक्ष में स्थित एवं दीप्तिशाली मरुतों की सेवा होती है. हे तेज चलने वाले वसुओ एवं मरुतो! तुम अपना मार्ग हमारे सामने करो. अपने समीप गए हुए हमारे इस दूत की पुकार सुनो. (३) ते हि यज्ञेषु यज्ञियास ऊमाः सधस्थं विश्वे अभि सन्ति देवाः. ताँ अध्वर उशतो यक्ष्यग्ने श्रुष्टी भगं नासत्या पुरन्धिम्.. (४) वे प्रसिद्ध, यज्ञपात्र एवं रक्षक विश्वेदेव यज्ञों में एक साथ ही आते हैं. हे अग्नि! हमारे यज्ञ में हमारी अभिलाषा करने वाले देवों का यज्ञ करो तथा भग, अश्विनीकुमारों एवं इंद्र का शीघ्र यजन करो. (४) आग्ने गिरो दिव आ पृथिव्या मित्रं वह वरुणमिन्द्रमग्निम्. आर्यमणमदितिं विष्णुमेषां सरस्वती मरुतो मादयन्ताम्.. (५) हे अग्नि! तुम स्तुतियोग्य मित्र, वरुण, इंद्र, अग्नि, अर्यमा, अदिति एवं विष्णु को स्वर्ग एवं धरती से हमारे यज्ञ में बुलाओ. सरस्वती एवं मरुद्गण हम यजमानों से प्रसन्न हों. (५) ररे हव्यं मतिभिर्यज्ञियानां नक्षत्कामं मर्त्यानामसिन्वन्. धाता रयिमविदस्यं सदासां सक्षीमहि युज्येभिर्नु देवैः.. (६) हम यज्ञपात्र देवों के लिए अपनी स्तुतियों के साथ हव्य देते हैं. अग्नि हमारी कामनाओं का विरोध न करते हुए हमारे यज्ञ में फैलें. हे देवो! तुम उपेक्षा न करने एवं सदा उपभोग करने ebook converter DEMO Watermarks*
योग्य धन हमें दो. हम आज अपने सहायक देवों से मिलेंगे. (६) नू रोदसी अभिष्टुते वसिष्ठैर्ऋतावानो वरुणो मित्रो अग्निः. यच्छन्तु चन्द्रा उपमं नो अर्कं यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (७) वसिष्ठगोत्रीय ऋषियों ने आज धरती एवं आकाश की भलीप्रकार स्तुति की है. उन्होंने यज्ञ वाले वरुण, मित्र एवं अग्नि की भी स्तुति की है. प्रमुदित करने वाले देव हमें प्रजा के योग्य एवं सबसे अच्छा अन्न दें एवं कल्याणसाधनों द्वारा हमारी सदा रक्षा करें. (७) सूक्त—४० देवता—विश्वेदेव ओ श्रुष्टिर्विदथ्या३ समेतु प्रति स्तोमं दधीमहि तुराणाम्. यदद्य देवः सविता सुवाति स्यामास्य रत्निनो विभागे.. (१) हे देवो! तुम्हारे मन द्वारा संपादित होने वाला सुख हमें प्राप्त हो. हम तेज चलने वाले देवों के लिए स्तोत्र बनाते हैं. रत्नों के स्वामी सविता आज जो धन हमारे पास भेजेंगे, हम उसी धन के भागी होंगे. (१) मित्रस्तन्नो वरुणो रोदसी च द्युभक्तमिन्द्रो अर्यमा ददातु. दिदेष्टु देव्यदिति रेक्णो वायुश्च यन्नियुवैते भगश्च.. (२) मित्र एवं वरुण, द्यावा-पृथिवी, इंद्र एवं अर्यमा हमें वही स्तोताओं द्वारा प्रशंसित धन दें. अदिति देवी हमें धन दें. वायु एवं भग हमारे लिए उसी धन की योजना करें. (२) सेदुग्रो अस्तु मरुतः स शुष्मी यं मर्त्यं पृषदश्वा अवाथ. उतेमग्निः सरस्वती जुनन्ति न तस्य रायः पर्येतास्ति.. (३) हे हरिणरूप वाहनसाधनों वाले मरुतो! तुम जिस मनुष्य की रक्षा करते हो, वह उग्र एवं बलवान् हो. अग्नि, सरस्वती आदि देवगण जिस यजमान को यज्ञ की प्रेरणा देते हैं, उसके धन का कोई बाधक नहीं है. (३) अयं हि नेता वरुण ऋतस्य मित्रो राजानो अर्यमापो धुः. सुहवा देव्यदितिरनर्वा ते नो अंहो अति पर्षन्नरिष्टान्.. (४) यज्ञ को प्राप्त करने वाले ये शक्तिशाली वरुण, मित्र एवं अर्यमा देव हमारे यज्ञकर्म को धारण करते हैं. किसी के द्वारा न रुक सकने वाली अदिति देवी हमारी पुकार सुने. ये देव हमें बाधा पहुंचाए बिना हमारे पापों को नष्ट करें. (४) अस्य देवस्य मीळुषो वया विष्णोरेषस्य प्रभृथे हविर्भिः. विदे हि रुद्रो रुद्रियं महित्वं यासिष्टं वर्तिरश्विनाविरावत्.. (५) ebook converter DEMO Watermarks*
अन्य देव यज्ञ में हव्यों द्वारा प्राप्त करने योग्य एवं अभिलाषापूरक विष्णु के अंशरूप हैं. रुद्र हमें अपना सुख एवं महत्त्व देते हैं. हे अश्विनीकुमारो! तुम हमारे हव्य वाले घर में आओ. (५) मात्र पूषन्नघृण इरस्यो वरूत्री यद्रातिषाचश्च रासन्. मयोभुवो नो अर्वन्तो नि पान्तु वृष्टिं परिज्मा वातो ददातु.. (६) हे दीप्तिशाली पूषा! सबकी वरणीय सरस्वती एवं दानकुशल देवपत्नियां इस यज्ञ में हमें जो धन दें, उसका विघात मत करना. सुख देने वाले एवं गतिशील देव हमारी रक्षा करें एवं सब ओर जाने वाले वायु हमें वर्षारूपी जल दें. (६) नू रोदसी अभिष्टुते वसिष्ठैर्ऋतावानो वरुणो मित्रो अग्निः. यच्छन्तु चन्द्रा उपमं नो अर्कं यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (७) वसिष्ठगोत्रीय ऋषियों ने आज धरती एवं आकाश की भली प्रकार स्तुति की है. उन्होंने यज्ञ वाले वरुण, मित्र एवं अग्नि की भी स्तुति की है. प्रमुदित करने वाले देव हमें पूजा के योग्य एवं सबसे अच्छा अन्न दें एवं कल्याणसाधनों द्वारा हमारी सदा रक्षा करें. (७) सूक्त—४१ देवता—इंद्रादि प्रातरग्निं प्रातरिन्द्रं हवामहे प्रातर्मित्रावरुणा प्रातरश्विना. प्रातर्भगं पूषणं ब्रह्मणस्पतिं प्रातः सोममुत रुद्रं हुवेम.. (१) हम स्तोता अग्नि, इंद्र, मित्र, वरुण एवं अश्विनीकुमारों को प्रातःकाल बुलाते हैं. हम प्रातःकाल भग, पूषा, ब्रह्मणस्पति, सोम एवं रुद्र का आह्वान करते हैं. (१) प्रातर्जितं भगमुग्रं हुवेम वयं पुत्रमदितेर्यो विधर्ता. आध्रश्चिद्यं मन्यमानस्तुरश्चिद्राजा चिद्यं भगं भक्षीत्याह.. (२) जो विश्व के धारक, जयशील, उग्र एवं अदितिपुत्र हैं, हम प्रातःकाल उन्हीं भगदेव को बुलाते हैं. दरिद्र स्तोता एवं धनसंपन्न राजा दोनों ही भगदेव की स्तुति करते हुए कहते हैं —“हमें भोग के योग्य धन दो.” (२) भग प्रणेतर्भग सत्यराधो भगेमां धियमुदवा ददन्नः. भग प्र णो जनय गोभिरश्वैर्भग प्र नृभिर्नृवन्तः स्याम.. (३) हे भग! तुम उत्तम नेता एवं सत्यधन हो. हमें अभिलषित धन देकर हमारी स्तुति सफल करो. हे भग! हमें गायों एवं घोड़ों द्वारा उन्नत बनाओ. हे भग! हम पुत्रादि द्वारा मनुष्यों वाले हों. (३) ebook converter DEMO Watermarks*
उतेदानीं भगवन्तः स्यामोत प्रपित्व उत मध्ये अह्नाम्. उतोदिता मघवन्सूर्यस्य वयं देवानां सुमतौ स्याम.. (४) हे भगदेव! हम इस समय एवं दिन का मध्य प्राप्त होने पर धनी बनें. हे धनस्वामी भग! हम सूर्योदय के समय देवों की कृपा प्राप्त करें. (४) भग एव भगवाँ अस्तु देवास्तेन वयं भगवन्तः स्याम. तं त्वा भग सर्व इज्जोहवीति स नो भग पुरएता भवेह.. (५) हे देवो! भग ही धनवान् हों. उसी धन से हम भी धनवान् हों. हे भग! सब लोग तुम्हें बार-बार बुलाते हैं. इस यज्ञ में तुम हमारे अनुगामी बनो. (५) समध्वरायोपसो नमन्त दधिक्रावेव शुचये पदाय. अर्वाचीनं वसुविदं भगं नो रथमिवाश्वा वाजिन आ वहन्तु.. (६) घोड़ा जिस प्रकार चलने योग्य मार्ग पर जाता है, उसी प्रकार उषा देवी हमारे यज्ञ में आवें. तेज चलने वाले घोड़े जैसे रथ को लाते हैं, उसी प्रकार उषा भग को हमारे सामने लावें. (६) अश्वावतीर्गोमतीर्न उषासो वीरवतीः सदमुच्छन्तु भद्राः. घृतं दुहाना विश्वतः प्रपीता यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (७) भद्रा, अश्वों, गायों एवं पुत्रादि जन से युक्त जल बरसाती हुई तथा सभी गुणों वाली उषा हमारा रात का अंधकार मिटावें. हे देवो! तुम कल्याणसाधनों द्वारा हमारी सदा रक्षा करो. (७) सूक्त—४२ देवता—विश्वेदेव प्र ब्रह्माणो अङ्गिरसो नक्षन्त प्र क्रन्दनुर्नभन्यस्य वेतु. प्र धेनव उदप्रुतो नवन्त युज्यतामद्री अध्वरस्य पेशः.. (१) अंगिरा नाम के ऋषि सब जगह व्याप्त हों. पर्जन्य हमारे स्तोत्र की विशेषरूप से अभिलाषा करें. नदियां जल सींचती हुई प्रवाहित हों. यजमान एवं उसकी पत्नी यज्ञ का रूप बनावें. (१) सुगस्ते अग्ने सनवित्तो अध्वा युक्ष्वा सुते हरितो रोहितश्च. ये वा सद्मन्नरुषा वीरवाहो हुवे देवानां जनिमानि सत्त:.. (२) हे अग्नि! चिरकाल से प्राप्त तुम्हारा मार्ग सुगम हो. तुम्हारे काले और लाल रंग के जो घोड़े तुम्हें यज्ञशाला में ले जाते हुए शोभा पाते हैं, उन्हें तुम रथ में जोड़ो. मैं यज्ञशाला में बैठा हुआ देवों को बुलाता हूं. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
समु वो यज्ञं महयन्नमोभिः प्र होता मन्द्रो रिरिच उपाके. यजस्व सु पूर्वणीक देवाना यज्ञियामरमतिं ववृत्याः.. (३) हे देवो! नमस्कार करते हुए ये स्तोता तुम्हारे यज्ञ की भली प्रकार पूजा करते हैं. हमारे पास बैठा हुआ एवं स्तुतिशील होता दूसरे होताओं से श्रेष्ठ है. हे यजमान! तुम देवों का यज्ञ करो. हे अधिक तेज वाले अग्नि! तुम यज्ञयोग्य भूमि को परिवर्तित करो. (३) यदा वीरस्य रेवतो दुरोणे स्योनशीरतिथिराचिकेतत्. सुप्रीतो अग्निः सुधितो दम आ स विशे दाति वार्यमियत्यै.. (४) सबके अतिथि अग्नि जब वीर एवं धनी यजमान को घर में सुखपूर्वक सोए हुए जान पड़ते हैं तथा यज्ञशाला में भली प्रकार रखे हुए अग्नि प्रसन्न होते हैं, उस समय वे अपने समीप वाले लोगों को धन देते हैं. (४) इमं नो अग्ने अध्वरं जुषस्व मरुत्स्विन्द्रे यशसं कृधी नः. आ नक्ता बर्हिः सदतामुषासोशान्ता मित्रावरुणा यजेह.. (५) हे अग्नि! हमारे इस यज्ञ को स्वीकार करो. हमें इंद्र एवं मरुद्गण के सामने यशस्वी बनाओ, रात में एवं उषाकाल में कुशों पर बैठो तथा यज्ञ के अभिलाषी मित्र व वरुण की इस यज्ञ में पूजा करो. (५) एवाग्निं सहस्यं वसिष्ठो रायस्कामो विश्वप्स्न्यस्य स्तौत्. इषं रयिं पप्रथद्वाजमस्मे यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (६) धन की अभिलाषा वाले वसिष्ठ ने इसी प्रकार शक्तिपुत्र अग्नि की स्तुति धनलाभ के लिए की थी. अग्नि हमारे अन्न, धन और बल की वृद्धि करें. हे देवो! तुम कल्याणसाधनों द्वारा हमारी रक्षा करो. (६) सूक्त—४३ देवता—विश्वेदेव प्र वो यज्ञेषु देवयन्तो अर्चन्द्यावा नमोभिः पृथिवी इषध्यै. येषां ब्रह्माण्यसमानि विप्रा विष्वग्वियन्ति वनिनो न शाखाः.. (१) हे देवो! जिन मेधावियों के स्तोत्र वृक्ष की शाखाओं के समान सब ओर विशेष रूप से जाते हैं, वे ही देवाभिलाषी स्तोता यज्ञों में अपनी स्तुतियों द्वारा सभी देवों की अर्चना करते हैं. वे ही देवों को प्राप्त करने के लिए द्यावा-पृथिवी की अर्चना करते हैं. (१) प्र यज्ञ एतु हेत्वो न सप्तिरुद्यच्छध्वं समनसो घृताचीः. स्तृणीत बर्हिरध्वराय साधूर्ध्वा शोचींषि देवयून्यस्थुः.. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
हमारा यज्ञ शीघ्रगामी अश्व के समान देवों के पास जावे. हे ऋत्विजो! तुम एकमत होकर स्रुच को उठाओ एवं यज्ञ के निमित्त कुशों को भली-भांति बिछाओ. हे अग्नि! तुम्हारी देवाभिलाषिणी लपटें ऊपर की ओर उठें. (२) आ पुत्रासो न मातरं विभृत्राः सानौ देवासो बर्हिषः सदन्तु. आ विश्वाची विदथ्यामनक्त्वग्ने मा नो देवतात म्ध्रस्कः.. (३) विशेष रूप से पालनीय पुत्र जिस प्रकार माता की गोद में बैठता है, उसी प्रकार देवगण कुश बिछी हुई वेदी के ऊंचे स्थान पर बैठें. हे अग्नि! जुहू तुम्हारी यज्ञ के योग्य ज्वाला को भली प्रकार सींचे. तुम युद्ध में हमारे शत्रुओं की सहायता मत करना. (३) ते सीषपन्त जोषमा यजत्रा ऋतस्य धाराः सुदुघा दुहानाः. ज्येष्ठं वो अद्य मह आ वसूनामा गन्तन समनसो यति ष.. (४) यज्ञ के पात्र इंद्रादि देव जल की सुख से दुहने योग्य धाराओं को बरसाते हुए हमारी सेवा को पर्याप्त रूप में स्वीकार करें. हे देवो! आज तुम सब धनों में पूज्य अपना धन लाओ तथा स्वयं भी समान रूप से प्रसन्न होकर आओ. (४) एवा नो अग्ने विश्वा दशस्य त्वया वयं सहसावन्नासक्राः. राया युजा सधमादो अरिष्टा यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (५) हे अग्नि! तुम इसी प्रकार हमें प्रजाओं के मध्य धन दो. हे शक्तिशाली अग्नि! हम तुम्हारे द्वारा त्यागे न जावें तथा नित्ययुक्त धन के साथ प्रसन्न एवं अपराजित हों. हे देवो! तुम कल्याणसाधनों द्वारा हमारी रक्षा करो. (५) सूक्त—४४ देवता—दधिक्रा दधिक्रां वः प्रथममश्विनोषसमग्निं समिद्धं भगमूतये हुवे. इन्द्रं विष्णुं पूषणं ब्रह्मणस्पतिमादित्यान्द्यावापृथिवी अपः स्वः.. (१) हे स्तोताओ! तुम्हारी रक्षा के लिए सबसे पहले मैं दधिक्रा देव को बुलाता हूं. इसके बाद अश्विनीकुमारों, उषा, प्रज्वलित अग्नि और भग नामक देव को बुलाता हूं. मैं इंद्र, विष्णु, पूषा, ब्रह्मणस्पति, आदित्यों, द्यावा-पृथिवी, जलों एवं सूर्य को बुलाता हूं. (१) दधिक्रामु नमसा बोधयन्त उदीराणा यज्ञमुपप्रयन्तः. इळां देवीं बर्हिषि सादयन्तोऽश्विना विप्रा सुहवा हुवेम.. (२) हम स्तोत्रों द्वारा दधिक्रा देव को जगाते एवं प्रेरित करते हुए यज्ञ के समीप जाते हैं, कुशों पर इडा देवी को स्थापित करते हैं एवं शोभन आह्वान वाले उन मेधावी अश्विनीकुमारों ebook converter DEMO Watermarks*
को बुलाते हैं. (२) दधिक्रावाणं बुबुधानो अग्निमुप ब्रुव उषसं सूर्यं गाम्. ब्रध्नं मँश्चतोर्वरुणस्य बभ्रुं ते विश्वास्मद् दुरिता यावयन्तु.. (३) दधिक्रा देव को जगाता हुआ मैं अग्नि, उषा, सूर्य एवं भूमि की स्तुति करता हूं. मैं अभिमानियों को नष्ट करने वाले वरुण के महान् एवं पीले रंग के घोड़े की स्तुति करता हूं. वे हमसे सभी पाप दूर करें. (३) दधिक्रावा प्रथमो वाज्यर्वाग्रे रथानां भवति प्रजानन्. संविदान उषसा सूर्येणादित्येभिर्वसुभिरङ्गिरोभिः.. (४) सभी अश्वों में प्रमुख, शीघ्रगामी एवं गतिशील दधिक्रा जानने योग्य बातों को भली प्रकार जानकर उषा, सूर्य, आदित्यों, वसुओं और अंगिराओं के साथ सहमत होकर बैठते हैं. (४) आ नो दधिक्राः पथ्यामनक्त्वृतस्य पन्थामन्वेतवा उ. शृणोतु नो दैव्यं शर्धो अग्निः शृण्वन्तु विश्वे महिषा अमूराः.. (५) दधिक्रा देव यज्ञमार्ग पर अनुगमन करने के इच्छुक हम लोगों के मार्ग को सींचें. अग्नि हमारे दैवी बल एवं स्तोत्र को सुनें. मूढ़तारहित एवं महान् विश्वेदेव मेरी स्तुति सुनें. (५) सूक्त—४५ देवता—सविता आ देवो यातु सविता सुरत्नोऽन्तरिक्षप्रा वहमानो अश्वैः. हस्ते दधानो नर्या पुरूणि निवेशयञ्च प्रसुवञ्च भूम.. (१) शोभनरत्नों से युक्त, अपने तेज से अंतरिक्ष को पूर्ण करने वाले एवं अपने घोड़ों द्वारा ढोए जाते हुए सविता देव अनेक मानवहितकारी धनों को हाथ में धारण करते हैं. वे प्राणियों को स्थापित करते हैं एवं कर्म में लगाते हैं. वे यहां आवें. (१) उदस्य बाहू शिथिरा बृहन्ता हिरण्यया दिवो अन्ताँ अनष्टाम्. नूनं सो अस्य महिमा पनिष्ट सूरश्चिदस्मा अनु दादपस्याम्.. (२) दान के निमित्त फैलाई हुई, विशाल एवं सोने की भुजाओं को सविता देव अंतरिक्ष में व्याप्त करें. हम सविता की उसी महिमा की आज प्रशंसा कर रहे हैं. सूर्य भी सविता को कर्म की इच्छा दें. (२) स घा नो देवः सविता सहावा साविषद्ध्वसुपतिर्वसूनि. विश्रयमाणो अमतिमुरूचीं मर्तभोजनमध रासते नः.. (३) ebook converter DEMO Watermarks*
तेजस्वी व धनों के पालक सविता देव हमारे लिए सब ओर से धनों को प्रेरित करते हैं. वे विस्तीर्ण गति वाले रूप को धारण करते हुए इस समय हमें मानवों के भोग में आने वाला धन दें. (३) इमा गिरः सवितारं सुजिह्वं पूर्णगभस्तिमूळते सुपाणिम्. चित्रं वयो बृहदस्मे दधातु यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (४) ये वाणियां शोभनजिह्वा वाले, संपूर्ण धनयुक्त एवं शोभनपाणि वाले सविता की स्तुति करती हैं. वे हमें विचित्र एवं महान् धन दें. हे देवो! तुम कल्याणसाधनों द्वारा हमारा सदा पालन करो. (४) सूक्त—४६ देवता—रुद्र इमा रुद्राय स्थिरधन्वने गिरः क्षिप्रेषवे देवाय स्वधान्वे. अषाळहाय सहमानाय वेधसे तिग्मायुधाय भरता शृणोतु नः.. (१) हे स्तोताओ! तुम दृढ़ धनुष वाले, शीघ्रगामी बाणों वाले, अन्नयुक्त अपराजित, सबको जीतने वाले, बनाने वाले तथा तीक्ष्ण आयुधों के स्वामी रुद्र की स्तुति करो. वे हमारी स्तुति सुनें. (१) स हि क्षयेण क्षम्यस्य जन्मनः साम्राज्येन दिव्यस्य चेतति. अवन्नवन्तीरुप नो दुरश्चरानमीवो रुद्र जासु नो भव.. (२) रुद्र को स्वर्ग एवं पृथ्वी पर रहने वाले ऐश्वर्य द्वारा जाना जा सकता है. हे रुद्र! हमारी प्रजाएं तुम्हारी स्तुतियां करती हैं. तुम उनकी रक्षा करते हुए हमारे घर आओ एवं उसे रोगहीन बनाओ. (२) या ते दिद्युदवसृष्टा दिवस्परि क्षमया चरिति परि सा वृणक्तु नः. सहस्त्रं ते स्वपिवात भेषजा मा नस्तोकेषु तनयेषु रीरिषः.. (३) हे रुद्र! अंतरिक्ष से छोड़ी गई बिजली जो धरती पर घूमती है, वह हमें त्याग दे. हे स्वपिवात रुद्र! तुम्हारी हजारों ओषधियां हमें मिलें. तुम हमारे पुत्र-पौत्रों की हत्या मत करना. (३) मा नो वधी रुद्र मा परा दा मा ते भूम प्रसितौ हीळितस्य. आ नो भज बर्हिषि जीवशंसे यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (४) हे रुद्र! तुम हमें मत मारना एवं हमारा त्याग मत करना. हम तुम्हारे क्रोध के बंधन में न रहें. तुम प्राणियों द्वारा प्रशंसित यज्ञ का हमें भागी बनाओ. हे देवो! तुम कल्याणसाधनों द्वारा ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त—४७ देवता—जल
हमारी रक्षा करो. (४) सूक्त—४७ देवता—जल आपो यं वः प्रथमं देवयन्त इन्द्रपानमूर्निमकृण्वतेळः. तं वो वयं शुचिमरिप्रमद्य घृतप्रुषं मधुमन्तं वनेम.. (१) हे जलरूप देवो! देवाभिलाषी अध्वर्युओं ने तुम्हारी सहायता से इंद्र के पीने के योग्य, धरती से उत्पन्न जो सोमरस पहले तैयार किया था, इस समय हम भी तुम्हारे उसी शुद्ध, पापरहित, वर्षारूपी जल से सींचने योग्य एवं मधुर सोमरस का सेवन करेंगे. (१) तमूर्मिमापो मधुमत्तं वोऽपां नपादवत्वाशुहेमा. यस्मिन्निन्द्रो वसुभिर्मादयाते तमश्याम देवयन्तो वो अद्य.. (२) हे अप देवो! तुम्हारे उस मधुर सोम नामक रस की शीघ्रगति वाले अपांनपात् अर्थात् अग्नि रक्षा करें. वसुओं के साथ इंद्र जिस में प्रसन्न होते हैं, हम आज देवों की कामना करते हुए उसी का सेवन करेंगे. (२) शतपवित्राः स्वधया मदन्तीर्देवीर्देवानामति यन्ति पाथः. ता इन्द्रस्य न मिनन्ति व्रतानि सिन्धुभ्यो हव्यं घृतवज्जुहोत.. (३) सैकड़ों पवित्र रूपों वाले एवं अपने अन्न के द्वारा मनुष्यों को प्रसन्न करते हुए जल देव इंद्रादि देवों के भी स्थान में प्रवेश करते हैं. वे इंद्र के यज्ञकर्मों का विनाश नहीं करते हैं. हे अध्वर्युजनो! सिंधु के लिए घी से मिले हव्य का हवन करो. (३) याः सूर्यो रश्मिभिराततान याभ्य इन्द्रो अरदद् गातुमूर्मिम्. ते सिन्धवो वारिवो धातना नो यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (४) हे सिंधुरूप जलो! सूर्य अपनी किरणों द्वारा जिनका विस्तार करते हैं एवं जिनके लिए इंद्र ने गमनयोग्य मार्ग का उद्घाटन किया है, तुम वे ही हो. तुम हमारे लिए धन धारण करो. हे देवो! तुम कल्याणसाधनों द्वारा हमारी सदा रक्षा करो. (४) सूक्त—४८ देवता—ऋभु ऋभुक्षणो वाजा मादयध्वमस्मे नरो मघवानः सुतस्य. आ वोऽर्वाचः क्रतवो न यातां विभ्वो रथं नर्यं वर्तयन्तु.. (१) हे नेता एवं धनस्वामी ऋभुओ! तुम हमारा सोमरस पीकर मतवाले बनो. अब तुम जाओ. तुम्हारे कार्यकर्त्ता एवं समर्थ अश्व तुम्हारे मानवहितकारी रथ को हमारी ओर मोड़ें. (१) ebook converter DEMO Watermarks*
ऋभुऋभुभिरभि वः स्याम विभ्वो विभुभिः शवसा शवांसि. वाजो अस्माँ अवतु वाजसाताविन्द्रेण युजा तरुषेम वृत्रम्.. (२) हे ऋभुओ! हम तुम्हारी सहायता से विस्तृत एवं धनवान् बनें. हम तुम्हारी शक्ति से शत्रुओं को पराजित करें. युद्ध में वाज हमारी रक्षा करें. हम इंद्र को पाकर शत्रुओं से पार पा लेंगे. (२) ते चिद्धि पूर्वीर्भि सन्ति शासा विश्वाँ अर्य उपरताति वन्वन्. इन्द्रो विभ्वाँ ऋभुक्षा वाजो अर्यः शत्रोर्मिंथत्या कृणवन्वि नृम्णम्.. (३) इंद्र एवं ऋभु हमारे शत्रुओं की अनेक सेनाओं को अपनी आज्ञा से मार डालते हैं. वे युद्ध में समस्त शत्रुओं का हनन करते हैं. शत्रुनाशक इंद्र, ऋभुक्षा एवं वाज शत्रु के बल को समाप्त करेंगे. (३) नू देवासो वरिवः कर्तना नो भूत नो विश्वेऽवसे सजोषाः. समस्मे इषं वसवो ददीरन् यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (४) दीप्तिशाली ऋभुओ! हमें आज धन दो. तुम सब समानरूप से प्रसन्न होकर हमारे रक्षक बनो. प्रसिद्ध ऋभु हमें अन्न दें. हे देवो! तुम अपने कल्याणसाधनों द्वारा हमारी सदा रक्षा करो. (४) सूक्त—४९ देवता—जल समुद्रज्येष्ठाः सलिलस्य मध्यात्पुनाना यन्त्यनिविशमानाः. इन्द्रो या वज्री वृषभो रराद ता आपो देवीरिह मामवन्तु.. (१) समुद्र जिन में बड़ा है, ऐसे जल सबको शुद्ध करते हैं, सदा गतिशील हैं एवं अंतरिक्ष के मध्य से जाते हैं. वज्रधारी एवं अभिलाषापूरक इंद्र ने जिन्हें रुका होने पर स्वच्छंद किया था, वे जल देवता इस स्थान में हमारी रक्षा करें. (१) या आपो दिव्या उत वा स्रवन्ति खनित्रिमा उत वाप याः स्वयञ्जाः. समुद्रार्था याः शुचयः पावकास्ता आपो देवीरिह मामवन्तु.. (२) जो जल अंतरिक्ष से उत्पन्न होते हैं, नदी के रूप में बहते हैं, जो खोद कर निकाले जाते हैं अथवा जो अपने आप उत्पन्न होकर सागर की ओर गति करते हैं, जो दीप्तियुक्त एवं पवित्र करने वाले हैं, वे देवीरूप जल यहां हमारी रक्षा करें. (२) यासां राजा वरुणो याति मध्ये सत्यानृते अवपश्यञ्जनानाम्. मधुश्चुतः शुचयो याः पावकास्ता आपो देवीरिह मामवन्तु.. (३) ebook converter DEMO Watermarks*
जिन जलों के राजा वरुण अपनी जलरूपी प्रजाओं में सत्य एवं मिथ्या को जानते हुए मध्यम लोक में जाते हैं, वे मधुरस बरसाने वाली, दीप्तियुक्त एवं पवित्र करने वाली जलरूपी देवियां यहां हमारी सदा रक्षा करें. (३) यासु राजा वरुणो यासु सोमो विश्वे देवा यासूर्जं मदन्ति. वैश्वानरो यास्वग्निः प्रविष्टस्ता देवीरिह मामवन्तु.. (४) जिन में राजा वरुण एवं सोम रहते हैं, समस्त देव जिन में अन्न पाकर प्रमुदित होते हैं एवं वैश्वानर अग्नि जिन में प्रविष्ट होते हैं, वे ही जलरूपी देवियां यहां हमारी रक्षा करें. (४) सूक्त—५० देवता—मित्र आदि आ मां मित्रावरुणेह रक्षतं कुलाययद् विश्वयन्मा न आ गन्. अजकावं दुर्द्दशीकं तिरो दिधे मा मां पद्येन रपसा विदत्सरुः.. (१) हे मित्र एवं वरुण! इस लोक में हमारी रक्षा करो. स्थान बनाने वाला एवं विशेषरूप से बढ़ने वाला विष हमारी ओर न आवे. अज का दुर्द्दशीक नामक विष समाप्त हो. सांप हमारे पैर की ध्वनि न पहचान सके. (१) यद्विजामन्यपरुषि वन्दनं भुवदष्ठीवन्तौ परि कुल्फौ च देहत्. अग्निष्टच्छोचन्नप बाधतामितो मा मां पद्येन रपसा विदत्सरुः.. (२) हे दीप्तिशाली अग्नि! पेड़ों की डालियों में अनेक रूप का बंदन नामक जो विष होता है एवं जो घुटने एवं टखने को फुला देता है, हमारे लोगों से उस विष को दूर करो. छिपकर आने वाला सांप हमें पगध्वनि से न पहचान सके. (२) यच्छल्मलौ भवति यन्नदीषु यदोषधीभ्यः परि जायते विषम्. विश्वे देवा निरितस्तत्सुवन्तु मा मां पद्येन रपसा विदत्सरुः.. (३) जो विष शाल्मली नामक वृक्ष में होता है एवं जो विष नदियों एवं ओषधियों में जन्म लेता है, विश्वेदेव उस विष को हमसे दूर करें. छिपकर आने वाला सांप हमारी पगध्वनि न पहचान सके. (३) याः प्रवतो निवत उद्धत उदन्वतीरनुदकाश्च याः. ता अस्मभ्यं पयसा पिन्वमानाः शिवा देवीरशिपदा भवन्तु सर्वा नद्यो अशिमिदा भवन्तु.. (४) ऊंचे देशों में, नीचे देशों में, शक्तिशाली देशों में, जल वाले देशों में एवं बिना पानी वाले देशों में बहती हुई जो नदियां हमें जल से भिगोती हैं, वे कल्याणकारिणी नदीरूपी देवियां ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त—५१ देवता—आदित्य
हमारे शिपद नामक रोग को नष्ट करें एवं अहिंसक बनें. (४) सूक्त—५१ देवता—आदित्य आदित्यानामवसा नूतनेन सक्षीमहि शर्मणा शन्तमेन. अनागास्त्वे अदितित्वे तुरास इमं यज्ञं दधतु श्रोषमाणाः.. (१) हम आदित्यों के नवीन रक्षासाधनों द्वारा कल्याणकारी एवं अतिशय शांतिदायक घर प्राप्त करें. शीघ्रता करने वाले आदित्य हमारी इस स्तुति को सुनकर यजमान को अपराध रति एवं दरिद्रताहीन बनावें. (१) आदित्यासो अदितिर्मादयन्तां मित्रो अर्यमा वरुणो रजिष्ठाः. अस्माकं सन्तु भुवनस्य गोपाः पिबन्तु सोममवसे नो अद्य.. (२) आदित्य, अदिति, अत्यंत सरल स्वभाव वाले मित्र, वरुण एवं अर्यमा प्रमुदित हों. संसार के रक्षक देवगण हमारे ही रक्षक हों. वे आज हमारी रक्षा के लिए सोमरस पिएं. (२) आदित्या विश्वे मरुतश्च विश्वे देवाश्च विश्व ऋभवश्च विश्वे. इन्द्रो अग्निरश्विना तुष्टुवाना यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (३) हमने सब आदित्यों (१२), सब मरुतों (४९), सब देवों (३३३३), सब ऋभुओं (३), इंद्र, अग्नि एवं अश्विनीकुमारों की स्तुति की. हे देवो! तुम अपने कल्याणसाधनों द्वारा हमारी रक्षा करो. (३) सूक्त—५२ देवता—आदित्य आदित्यासो अदितयः स्याम पूर्देवत्रा वसवो मर्त्यत्रा. सनेम मित्रावरुणा सनन्तो भवेम द्यावापृथिवी भवन्तः.. (१) हे आदित्यो! हम अखंडनीय हों. हे वसु नामक रक्षक देवो! तुम मनुष्यों के पालक बनो. हे मित्रावरुण! तुम्हारी सेवा करते हुए हम धन को भोगें. हे द्यावा-पृथिवी! तुम्हारी कृपा से हम विभूतिसंपन्न हों. (१) मित्रस्तन्नो वरुणो मामहन्त शर्म तोकाय तनयाय गोपाः. मा वो भुजेमान्यजातमेनो मा तत्कर्म वसवो यच्चयध्वै.. (२) मित्र एवं वरुण हमें प्रसिद्ध सुख दें एवं हमारे पुत्र-पौत्रों की रक्षा करें. दूसरे के किए हुए अपराध का फल हम न भोगें. हे वसुओ! हम वह कर्म न करें, जिसके कारण तुम नाश कर देते हो. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त—५३ देवता—द्यावा-पृथिवी
तुरण्यवोऽङ्गिरसो नक्षन्त रत्नं देवस्य सवितुरियानाः. पिता च तन्नो महान् यजत्रो विश्वे देवाः समनसो जुषन्त.. (३) शीघ्रता करने वाले अंगिराओं ने सविता देव से याचना करके उनका जो रमणीय धन प्राप्त किया था, वसिष्ठ के पिता महान् यज्ञशील वरुण एवं अन्य समस्त देव समान रूप से प्रसन्न होकर वही धन हमें दें. (३) सूक्त—५३ देवता—द्यावा-पृथिवी प्र द्यावा यज्ञैः पृथिवी नमोभिः सबाध ईळे बृहती यजत्रे. ते चिद्धि पूर्वे कवयो गृणन्तः पुरो मही दधिरे देवपुत्रे.. (१) मैं ऋत्विजों सहित उसी यज्ञयोग्य एवं विस्तृत द्यावा-पृथिवी की स्तुति यज्ञों एवं नमस्कारों के साथ करता हूं, जो विशाल एवं देवों को जन्म देने वाली हैं एवं प्राचीन कवियों ने स्तुति करते हुए जिन्हें सबसे आगे रखा था. (१) प्र पूर्वजे पितरा नव्यसीभिर्गीर्भिः कृणुध्वं सदने ऋतस्य. आ नो द्यावापृथिवी दैव्येन जनेन यातं महि वां वरूथम्.. (२) हे स्तोताओ! तुम अपनी नवीन स्तुतियों द्वारा पूर्व-उत्पन्न, माता-पितारूप एवं यज्ञ के स्थान द्यावा-पृथिवी को सबसे आगे स्थापित करो. हे द्यावा-पृथिवी! तुम अपना महान् एवं उत्तम धन देने के लिए देवों के साथ हमारे समीप आओ. (२) उतो हि वां रत्नधेयानि सन्ति पुरूणि द्यावापृथिवी सुदासे. अस्मे धत्तं यदसद्स्कृधोयु यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (३) हे द्यावा-पृथिवी! शोभनहव्यदाता यजमान को देने के लिए तुम्हारे पास अधिक उत्तम धन है. तुम नष्ट होने वाला धन हमें दो. हे देवो! तुम कल्याणसाधनों द्वारा हमारी सदा रक्षा करो. (३) सूक्त—५४ देवता—वास्तोष्पति वास्तोष्पते प्रति जानीह्यस्मान्त्स्वावेशो अनमीवो भवा नः. यत्त्वेमहे प्रति तन्नो जुषस्व शं नो भव द्विपदे शं चतुष्पदे.. (१) हे वास्तोष्पति! हमें जगाओ तथा हमारे घर को शोभन एवं रोगरहित बनाओ. हम तुमसे जो धन मांगते हैं, वह हमें दो. तुम हमारे मनुष्यों एवं पशुओं के लिए कल्याणकारी बनो. (१) वास्तोष्पते प्रतरणो न एधि गयस्फानो गोभिरश्वेभिरिन्दो. ebook converter DEMO Watermarks*
अजरासस्ते सख्ये स्याम पितेव पुत्रान्प्रति नो जुषस्व.. (२) हे वास्तोष्पति! तुम हमारे धन को बढ़ाओ एवं उसका विस्तार करो. हे सोम के समान प्रसन्न करने वाले देव! हम तुम्हारे मित्र बनकर घोड़ों एवं गायों के स्वामी तथा जरारहित हों. जिस प्रकार पिता पुत्र की रक्षा करता है, उसी प्रकार तुम हमारी रक्षा करो. (२) वास्तोष्पते शग्मया संसदा ते सक्षीमहि रण्वया गातुमत्या. पाहि क्षेम उत योगे वरं नो यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (३) हे वास्तोष्पति! हम तुम्हारे सुखकारक, सुंदर एवं संपत्तियुक्त स्थान से संगत हों. तुम हमारे प्राप्त एवं अप्राप्त धन की रक्षा करो. हे देवो! तुम अपने कल्याणसाधनों द्वारा हमारी सदा रक्षा करो. (३) सूक्त—५५ देवता—वास्तोष्पति आदि अमीवहा वास्तोष्पते विश्वा रूपाण्याविशन्. सखा सुशेव एधि नः.. (१) हे रोगनाशक वास्तोष्पति! तुम समस्त रूपों में प्रवेश करते हुए हमारे सखा एवं सुखदायक बनकर बढ़ो. (१) यदर्जुन सारमेय दतः पिशङ्ग यच्छसे. वीव भ्राजन्त ऋष्टय उप स्रक्वेषु बप्सतो नि षु स्वप.. (२) हे श्वेत एवं पीले रंग के कुत्ते! जब भूंकते समय तुम दांत निकालते हो, तब आयुधों के समान चमकते हुए तुम्हारे दांत होंठों में बहुत अच्छे लगते हैं. इस समय तुम भली प्रकार सोओ. (२) स्तेनं राय सारमेय तस्करं वा पुनःसर. स्तोतॄनिन्द्रस्य रायसि किमस्मान्दुच्छुनायसे नि षु स्वप.. (३) हे एक स्थान में बार-बार आने वाले सारमेय! तुम चोरों और लुटेरों के पास जाओ. इंद्र के स्तोता हम लोगों के पास क्यों आते हो? हमें कष्ट क्यों देते हो? तुम सुखपूर्वक सोओ. (३) त्वं सूकरस्य दर्दृहि तव दर्दर्तु सूकरः. स्तोतॄनिन्द्रस्य रायसि किमस्मान्दुच्छुनायसे नि षु स्वप.. (४) तुम सूअर को विदीर्ण करो एवं सूअर तुम्हें विदीर्ण करे. इंद्र के स्तोता हम लोगों के पास क्यों आते हो? हमें कष्ट क्यों देते हो? तुम सुखपूर्वक सोओ. (४) सस्तु माता सस्तु पिता सस्तु श्वा सस्तु विश्पतिः. ebook converter DEMO Watermarks*
ससन्तु सर्वे ज्ञातयः सस्त्वयमभितो जनः.. (५) हे सारमेय! तुम्हारी माता सोवें, तुम्हारे पिता सोवें, तुम स्वयं सोओ, घर का मालिक सोवे, सब बांधव सोवें एवं चारों ओर से सब लोग सोवें. (५) य आस्ते यश्च चरति यश्च पश्यति नो जनः. तेषां सं हन्मो अक्षाणि यथेदं हर्म्यं तथा.. (६) जो हमारे प्रदेश में ठहरता है, चलता है अथवा हमें देखता है, हम उसकी आंखें फोड़ देते हैं. वह घर के समान शांत व निश्चल हो जाता है. (६) सहस्रशृङ्गो वृषभो यः समुद्रादुदाचरत्. तेना सहस्येना वयं नि जनान्त्स्वापयामसि.. (७) हजार किरणों वाले जो कामवर्षक सूर्य समुद्र से उदय होते हैं, उनकी सहायता से हम सब लोगों को सुला देंगे. (७) प्रोष्ठेशया वह्येशया नारीर्यास्तल्पशीवरीः. स्त्रियो याः पुण्यगन्धास्ताः सर्वाः स्वापयामसि.. (८) जो स्त्रियां आंगन में सोने वाली, सवारी पर सोने वाली, चारपाई पर सोने वाली एवं गंध वाली हैं, उन सबको हम सुला देंगे. (८) सूक्त—५६ देवता—मरुद् क ईं व्यक्ता नरः सनीळा रुद्रस्य मर्या अधा स्वश्वाः.. (१) ये कांतियुक्त नेता, एक घर में रहने वाले, महादेव के पुत्र, मानवहितकारी एवं शोभन अश्वों वाले मरुद्गण कौन हैं. (१) नकिह्रैषां जनूंषि वेद ते अङ्ग विद्रे मिथो जनित्रम्.. (२) इनके जन्मों को कोई नहीं जानता, अपने जन्म की बात वे मरुत् ही आपस में जानते हैं. (२) अभि स्वपूभिर्मिथो वपन्त वातस्वनसः श्येना अस्पृध्रन्.. (३) मरुत् अपने संचरणों के द्वारा आपस में मिलते हैं. ये हवा के समान तेज उड़ने वाले बाजों के समान आपस में स्पर्धा करते हैं. (३) एतानि धीरो निण्या चिकेत पृश्रिर्यदूधो मही जभार.. (४) ebook converter DEMO Watermarks*
धीर व्यक्ति इन सर्वांगश्वेत मरुतों को जानते हैं. पृश्नि ने इन्हें अंतरिक्ष में धारण किया था. (४) सा विट् सुवीरा मरुद्भिरस्तु सनात्सहन्ती पुष्यन्ती नृम्णम्.. (५) वह प्रजा मरुतों के कारण चिरकाल से शत्रुओं को हराती हुई धन को पुष्ट करने वाली एवं शोभनपुत्रों वाली हो. (५) यामं येषाः शुभा शोभिष्ठाः श्रिया सम्मिश्रा ओजोभिरुग्राः.. (६) मरुत् जाने योग्य स्थानों को सबसे अधिक जाते हैं, अलंकारों से बहुत अधिक सुशोभित हैं, शोभायुक्त एवं ओजों से उग्र हैं. (६) उग्रं व ओजः स्थिरा शवांस्यधा मरुद्भिर्गणस्तुविष्मान्.. (७) हे मरुतो! तुम्हारा तेज उग्र और बल स्थित हो. तुम बुद्धि वाले बनो. (७) शुभ्रो वः शुष्मः क्रुध्मी मनांसि धुनिर्मुनिरिव शर्धस्य धृष्णोः.. (८) हे मरुतो! तुम्हारा बल सब ओर शोभा वाला एवं तुम्हारे मन क्रोधपूर्ण हैं. शत्रु पराभवकारी एवं शक्तिशाली मरुद्गण का वेग स्तोता के समान अनेक प्रकार का शब्द करता है. (८) सनेम्यस्मद्युयोत दिद्युं मा वो दुर्मतिरिह प्रणङ्नः.. (९) हे मरुतो! पुराने आयुध हमारे पास से अलग करो. तुम्हारी क्रूरमति हमें व्याप्त न करे. (९) प्रिया वो नाम हुवे तुराणामा यत्तृपन्मरुतो वावशानाः.. (१०) हे शीघ्रता करने वाले मरुतो! तुम्हारे प्यारे नाम हम पुकारते हैं. अभिलाषापूरक मरुद्गण इससे तृप्त होते हैं. (१०) स्वायुधास इष्मिणः सुनिष्का उत स्वयं तन्व१ः शुम्भमानाः.. (११) शोभन आयुधों वाले, गतिशील एवं सुंदर अलंकारों वाले मरुद्गण अपने शरीरों को सजाते हैं. (११) शुची वो हव्या मरुतः शुचीनां शुचिं हिनोम्यध्वरं शुचिभ्यः. ऋतेन सत्यमृतसाप आयञ्छुचिजन्मानः शुचयः पावकाः.. (१२) हे मरुतो! तुम शुद्धों के लिए शुद्ध हव्य हो. तुम शुद्धों के लिए मैं शुद्ध यज्ञ करता हूं. ebook converter DEMO Watermarks*
जल को छूने वाले मरुत् सत्य को प्राप्त करते हैं. शुद्ध जल वाले एवं शुद्ध मरुद्गण दूसरों को भी शुद्ध करते हैं. (१२) अंसेष्वा मरुतः खादयो वो वक्षःसु रुक्मा उपशिश्रियाणाः. वि विद्युतो न वृष्टिभी रुचाना अनु स्वधामायुधैर्ऋच्छमानाः.. (१३) हे मरुतो! तुम्हारे कंधों पर खादि नामक अलंकार तथा सीनों पर उत्तम हार विराजमान हैं. जैसे वर्षा करने वाले मेघों के साथ बिजली शोभा देती है, उसी प्रकार जल प्रदान के समय तुम भी अपने आयुधों से सुशोभित होते हो. (१३) प्र बुध्न्या व ईरते महांसि प्र नामानि प्रयज्यवस्तिरध्वम्. सहस्त्रियं दम्यं भागमेतं गृहमेधीयं मरुतो जुषध्वम्.. (१४) हे मरुतो! अंतरिक्ष में उत्पन्न होने वाले तुम्हारे तेज विशेषरूप से गति करते हैं. हे विशेष यज्ञपात्र मरुतो! तुम जलों को बढ़ाओ. हे मरुतो! गृहस्वामियों द्वारा दिए गए घर में उत्पन्न एवं हजार संख्या वाले यज्ञ का एक भाग सेवन करो. (१४) यदि स्तुतस्य मरुतो अधीथेत्था विप्रस्य वाजिनो हवीमन्. मक्षू रायः सुवीर्यस्य दात नू चिद्यमन्य आदभद्रावा.. (१५) हे मरुतो! तुम अन्नयुक्त मेधावी स्तोता के हव्यसहित स्तोत्र को जानते हो. इसलिए उस शोभनपुत्र वाले को शीघ्र धन दो. शत्रु उस धन को नष्ट न करें. (१५) अत्यासो न ये मरुतः स्वञ्चो यक्षदृशो न शुभयन्त मर्याः. ते हर्म्येष्ठाः शिशवो न शुभ्रा वत्सासो न प्रक्रीळिनः पयोधाम.. (१६) जो मरुद्गण सतत गतिशील घोड़े के समान शोभनगति वाले, उत्सव देखने वाले, मनुष्यों के समान शोभाशाली एवं घर में रहने वाले बच्चों के समान शोभित हैं, वे खेलते हुए बालकों के समान एवं जल धारणकर्त्ता हैं. (१६) दशस्यन्तो नो मरुतो मृळन्तु वरिवस्यन्तो रोदसी सुमेके. आरे गोहा नृहा वधो वो अस्तु सुम्नेभिरस्मे वसवो नमध्वम्.. (१७) संपत्तियां देते हुए एवं अपनी महिमा से सुंदर द्यावा-पृथिवी को पूर्ण करते हुए मरुद्गण हमें सुखी करें. हे मरुतो! तुम्हारा मानवनाशक एवं गोनाशक आयुध हमसे दूर रहे. हे वासदाता मरुतो! तुम सुखों के साथ हमारे सामने आओ. (१७) आ वो होता जोहवीति सत्त: सत्राचीं रातिं मरुतो गृणानः. य ईवतो वृष्णो अस्ति गोपाः सो अद्वयावी हवते व उक्थैः.. (१८) ebook converter DEMO Watermarks*