ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1095, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंतुरण्यवोऽङ्गिरसो नक्षन्त रत्नं देवस्य सवितुरियानाः. पिता च तन्नो महान् यजत्रो विश्वे देवाः समनसो जुषन्त.. (३) शीघ्रता करने वाले अंगिराओं ने सविता देव से याचना करके उनका जो रमणीय धन प्राप्त किया था, वसिष्ठ के पिता महान् यज्ञशील वरुण एवं अन्य समस्त देव समान रूप से प्रसन्न होकर वही धन हमें दें. (३) सूक्त—५३ देवता—द्यावा-पृथिवी प्र द्यावा यज्ञैः पृथिवी नमोभिः सबाध ईळे बृहती यजत्रे. ते चिद्धि पूर्वे कवयो गृणन्तः पुरो मही दधिरे देवपुत्रे.. (१) मैं ऋत्विजों सहित उसी यज्ञयोग्य एवं विस्तृत द्यावा-पृथिवी की स्तुति यज्ञों एवं नमस्कारों के साथ करता हूं, जो विशाल एवं देवों को जन्म देने वाली हैं एवं प्राचीन कवियों ने स्तुति करते हुए जिन्हें सबसे आगे रखा था. (१) प्र पूर्वजे पितरा नव्यसीभिर्गीर्भिः कृणुध्वं सदने ऋतस्य. आ नो द्यावापृथिवी दैव्येन जनेन यातं महि वां वरूथम्.. (२) हे स्तोताओ! तुम अपनी नवीन स्तुतियों द्वारा पूर्व-उत्पन्न, माता-पितारूप एवं यज्ञ के स्थान द्यावा-पृथिवी को सबसे आगे स्थापित करो. हे द्यावा-पृथिवी! तुम अपना महान् एवं उत्तम धन देने के लिए देवों के साथ हमारे समीप आओ. (२) उतो हि वां रत्नधेयानि सन्ति पुरूणि द्यावापृथिवी सुदासे. अस्मे धत्तं यदसद्स्कृधोयु यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (३) हे द्यावा-पृथिवी! शोभनहव्यदाता यजमान को देने के लिए तुम्हारे पास अधिक उत्तम धन है. तुम नष्ट होने वाला धन हमें दो. हे देवो! तुम कल्याणसाधनों द्वारा हमारी सदा रक्षा करो. (३) सूक्त—५४ देवता—वास्तोष्पति वास्तोष्पते प्रति जानीह्यस्मान्त्स्वावेशो अनमीवो भवा नः. यत्त्वेमहे प्रति तन्नो जुषस्व शं नो भव द्विपदे शं चतुष्पदे.. (१) हे वास्तोष्पति! हमें जगाओ तथा हमारे घर को शोभन एवं रोगरहित बनाओ. हम तुमसे जो धन मांगते हैं, वह हमें दो. तुम हमारे मनुष्यों एवं पशुओं के लिए कल्याणकारी बनो. (१) वास्तोष्पते प्रतरणो न एधि गयस्फानो गोभिरश्वेभिरिन्दो. ebook converter DEMO Watermarks*